Chandrasekhar’s Socialism : जेपी के करीब ले आई थी चंद्रशेखर की सत्ताविरोधी राजनीति

Chandrasekhar’s Socialism : ईमरजेंसी के खिलाफ कांग्रेस में बागी चेहरा बने थे युवा तुर्क

Chandrasekhar’s Socialism : आज की तारीख में राजनीतिक दलों में गुलामी का आलम यह है कि हाईकमान जो निर्देश जारी कर दे कार्यकर्ता सिर झुकाकर उसे मान लेते हैं। भले ही वह निर्णय जनहित के खिलाफ हो। सत्ता में बैठे नेता तो बस यह समझ लेते हैं कि अब जो कुछ उनकी पार्टी कर रही है वह सब ठीक है। हां सत्ता के लिए जरूर पार्टी में बगावत हो जाती है। जनहित के मामले में कोई नेता पार्टी नेतृत्व का विरोध करने को तैयार नहीं। यह Chandrasekhar’s Socialism ही था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ऐसे नेता हुए हैं जो सत्ताविरोधी रानजीति के पक्षधर थे। अपनी इस सोच को उन्होंने करके भी दिखाया। कांग्रेस में रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों का जमकर विरोध किया।

Chandrasekhar's Socialism, Supporter of Change of Power, Young Turk was the Identity, Close to Acharya Narendra Dev

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हालांकि  चंद्रशेखर की व्यक्तिगत स्वार्थों से हटकर वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन की उन्हें लोकनायक जयप्रकाश नारायण और उनके आदर्शवादी जीवन के करीब ले आई थी। चंद्रशेखर Supporter of Change of Power. चंद्रशेखर की वजह से इंदिरा गांधी के खिलाफ कांग्रेस के भीतर गहरा असंतोष पनपा था। कांग्रेस में बगावत का खामियाजा उन्हें जेल में जाकर में भुगतना पड़ा। दरअसल 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किये जाने के समय आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। चंद्रशेखर की गिरफ्तारी उस समय हुई जिस समय वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष निकायों, केंद्रीय चुनाव समिति तथा कार्य समिति के सदस्य थे। वह चंद्रशेखर का Supporter of Change of power ही था कि वह गिरफ्तार हुए थे। चंद्रशेखर सत्तारूढ़ पार्टी के उन सदस्यों में से थे, जिन्हें आपातकाल के दौरान गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।

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सत्ता के लोभी नेताओं को चंद्रशेखर की राजनीति से सीख लेनी चाहिए। चंद्रशेखर हमेशा सत्ता की राजनीति का विरोध करते थे एवं लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रति प्रतिद्धता की राजनीति को महत्व देते थे। आपात काल के दौरान जेल में बिताये समय में उन्होंने हिन्दी में एक डायरी लिखी जो बाद में मेरी जेल डायरी के नाम से प्रकाशित हुई। सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता उनके लेखन का एक प्रसिद्ध संकलन है। चंद्रशेखर की Young Turk was the Identity थी, जिन्होंने दृढ़ता, साहस एवं ईमानदारी के साथ जन समस्याओं को उठाते हुए सत्ता के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। उनके जनसमस्याओं को उठाने का जज्बा इस कदर था कि वह जिंदगी भर कमजोर की लड़ाई लड़ते रहे। उनमें नेतृत्व के साथ ही पत्रकारिता का जज्बा भी गजब का था।

चंद्रशेखर १९६९ में दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका यंग इंडियन के संस्थापक और संपादक थे। इस पत्रिका का संपादकीय अपने समय के विशिष्ट एवं बेहतरीन संपादनों में से एक हुआ करता था। आपातकाल (मार्च 1977 से जून १९७५) के दौरान यंग इंडियन को भी बंद कर दिया गया था। फरवरी 1989 में इसका पुनज् नियमित रूप से प्रकाशन शुरू हुआ। चंद्रशेखर इसके संपादकीय सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे।

Young Turk was the Identity : यह जज्बा चंद्रशेखर में ही था कि 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक दक्षिण के कन्याकुमारी से नई दिल्ली में राजघाट तक लगभग 4260 किलोमीटर की दूरी तय कर उन्होंने पदयात्रा की थी। उनके इस पदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना था। चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित इब्राहिमपत्ती गांव के एक किसान परिवार में हुआ था। वह 1977 से 1988 तक जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे। उनके अध्यक्ष रहते हुए ही जनता पार्टी ने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ते हुए न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को गद्दी से उतारा था बल्कि प्रचंड बहुमत से सरकार भी बनाई थी।

चंद्रशेखर अपने छात्र जीवन से ही राजनीति की ओर आकर्षित होने लगे थे। वह एक क्रांतिकारी जोश एवं गर्म स्वभाव वाले आदर्शवादी नेता के रूप में जाने जाते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद वह समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गये थे। चंद्रशेखर Close to Acharya Narendra Dev. वे बलिया में जिला प्रजा समाजवादी पार्टी के सचिव चुने गये एक साल के भीतर वे उत्त प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के संयुक्त सचिव बने। 1955-56 में वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के महासचिव बने। 1962 में वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गये। वह जनवरी 1965 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गये। 1967 में उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का महासचिव चुना गया।

संसद के सदस्य के रूप में उन्होंने दलितों के हित के लिए कार्य करना शुर किया एवं समाज में तेजी से बदलाव लाने के लिए नीतियां निर्धारित करने पर जोर दिया। Socialist Movement में जब उन्होंने समाज में उच्च वर्ग के गलत तरीके से बढ़ रहे एकाधिकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई तो सत्ता पर आसीन लोगों के साथ उनके मतभेद हो गये। चंद्रशेखर ने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण करने के मकसद से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा समेत देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी ताकि वे देश के पिछड़े इलाकों में लोगों को शिक्षित करने एवं जमीनी स्तर पर कार्य कर सकें। Socialist Movement के चलते 1984  से 1989 तक की संक्षिप्त अवधि को छोड़कर 1962 से वह संसद के सदस्य रहे। 1989 में उन्होंने अपने गृह क्षेत्र बलिया और बिहार के महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा एवं दोनों ही चुनाव जीते। बाद में उन्होंने महाराजगंज की सीट छोड दी।

Chandrasekhar’s Socialism 

आज की तारीख में भले ही पत्रकार राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में पार्टी कार्यकर्ता के रूप में शामिल न हो सकें पर देश में राजनीति और पत्रकारिता एक दूसरे के पूरक रहे हैं। देश के अधिकतर बड़े नेता पत्रकार और लेखक रहे हैं। आजादी की लड़ाई में तो नेता दिन में आजादी की लड़ाई लड़ते थे और रात में अखबार निकालते थे। चाहे पंडित जवाहर लाल नेहरू हों, फिरोज गांधी हों, अटल बिहारी वाजपेयी हों, चौधरी चरण सिंह रहे हैं या फिर चंद्रशेखर ये सभी नेता एक नेता के साथ ही बड़े पत्रकार और लेखक भी रहे हैं। देश के सबसे बड़े पत्रकार के रूप में जाने जाने जाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी भी कांग्रेस से जुड़े रहे। देश में चंद्रशेखर ऐसा नेता रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी समझौता नहीं किया और कहा कि वह जब भी बनेंगे प्रधानमंत्री बनेंगे और बने। प्रधानमंत्री पद से नीचे का कोई पद उन्हें गवारा नहीं था। चंद्रशेखर एक क्रांतिकारी नेता के साथ ही एक पत्रकार और लेखक भी थे।

 

 

 

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