संत रैदास की सामाजिक–धार्मिक दृष्टि पर बौद्ध प्रभाव: एक आलोचनात्मक अध्ययन

 एस आर दारापुरी 

यह लेख संत रैदास (15वीं–16वीं शताब्दी) की सामाजिक–धार्मिक दृष्टि का विश्लेषण बौद्ध दर्शन के संदर्भ में करता है। यद्यपि संत रैदास की औपचारिक बौद्ध पहचान के कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तथापि उनकी शिक्षाओं में निहित जाति-विरोध, मानव समानता, श्रम की गरिमा तथा ‘बेगमपुरा’ की सामाजिक कल्पना बौद्ध नैतिकता और सामाजिक दर्शन से गहरा साम्य रखती है। यह अध्ययन तर्क देता है कि संत रैदास को एक ऐसे भक्ति संत के रूप में समझा जाना चाहिए जिनकी सामाजिक चेतना श्रमण–बौद्ध परंपरा की ऐतिहासिक स्मृति से अनुप्राणित है। यह लेख बौद्ध–ब्राह्मणवादी संघर्ष की दीर्घ परंपरा में संत रैदास के विचारों को स्थान देता है और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विमर्शात्मक ढाँचे में उनका पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है।

 

1. भूमिका (Introduction)

 

भारतीय सामाजिक इतिहास में संत रैदास का स्थान केवल एक भक्ति संत के रूप में नहीं, बल्कि एक जाति-विरोधी सामाजिक चिंतक के रूप में भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भक्ति आंदोलन को प्रायः आध्यात्मिक सुधार आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु दलित–बहुजन दृष्टिकोण से देखने पर यह आंदोलन ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना के विरुद्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति भी था।

यह प्रश्न कि क्या संत रैदास की शिक्षाओं पर बौद्ध प्रभाव था, केवल धार्मिक इतिहास का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और ऐतिहासिक निरंतरता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

 

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बौद्ध धर्म और भक्ति आंदोलन

 

गुप्तोत्तर काल के बाद भारत में बौद्ध धर्म का संस्थागत पतन अवश्य हुआ, किंतु उसका नैतिक और सामाजिक प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। बौद्ध धर्म की मूल विशेषताएँ— जाति-व्यवस्था का निषेध, कर्मकांड-विरोध, नैतिक आचरण पर बल एवं श्रम और समानता की प्रतिष्ठा —लोक परंपराओं, श्रमण संस्कृति और निम्नवर्गीय समुदायों के सामाजिक आचरण में जीवित रहीं।

भक्ति आंदोलन के अनेक संत—कबीर, रैदास, नामदेव—इसी सांस्कृतिक स्मृति के वाहक माने जा सकते हैं।

 

3. संत रैदास का सामाजिक दृष्टिकोण

 

संत रैदास का जन्म चर्मकार समुदाय में हुआ, जो ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में ‘अछूत’ माना जाता था। उनकी वाणी में निम्नलिखित तत्व प्रमुख हैं:

जाति-आधारित श्रेष्ठता का निषेध, श्रम की गरिमा और आत्मसम्मान, मानव समानता का नैतिक आधार तथा कर्मकांड और पवित्रता-अशुद्धता की आलोचना।

संत रैदास का धर्म व्यक्ति के आचरण और सामाजिक संबंधों से निर्मित होता है, न कि जन्म या शास्त्रों से।

 

4. ‘बेगमपुरा’: बौद्ध सामाजिक कल्पना से साम्य

 

संत रैदास की सर्वाधिक चर्चित अवधारणा ‘बेगमपुरा’ है—एक ऐसा नगर जहाँ: कोई दुख नहीं, कोई कर नहीं, कोई भय नहीं, कोई जाति नहीं तथा कोई ऊँच-नीच नहीं।

यह कल्पना कई स्तरों पर बौद्ध चिंतन से मेल खाती है:

4.1 बुद्ध का संघ (Sangha)

बुद्ध का संघ जन्म-आधारित भेदभाव से मुक्त था और समानता पर आधारित था।

4.2 अशोक का धम्म

अशोक का धम्म नैतिक शासन, करुणा और सामाजिक कल्याण पर केंद्रित था।

4.3 आंबेडकर का नवयान

डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित नवयान बौद्ध धर्म भी इसी धरती पर न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना करता है।

इस प्रकार, बेगमपुरा एक आध्यात्मिक स्वर्ग नहीं, बल्कि एक सामाजिक–नैतिक आदर्श राज्य है, जो बौद्ध परंपरा की केंद्रीय विशेषता है।

. ब्राह्मणवाद की आलोचना: बौद्ध परंपरा की निरंतरता

संत रैदास की आलोचना प्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मणवाद के विरुद्ध है:

वे शुद्धता–अशुद्धता की अवधारणा को अस्वीकार करते हैं, पुरोहिती (ब्राह्मणवादी) वर्चस्व को चुनौती देते हैं तथा धर्म को नैतिकता और समानता से जोड़ते हैं।

यह वही दृष्टि है जिसे डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धम्म की सामाजिक क्रांति कहा है।

6. अंतर और सीमाएँ

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि:

संत रैदास ईश्वर-भक्ति की जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह बौद्ध दर्शन नास्तिक और अनीश्वरवादी है तथा संत रैदास ने कोई दार्शनिक तंत्र नहीं गढ़ा।

अतः बौद्ध प्रभाव को धार्मिक नहीं, सामाजिक–नैतिक प्रभाव के रूप में समझा जाना चाहिए।

7. आंबेडकरवादी पुनर्पाठ

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भले ही संत रैदास पर प्रत्यक्ष लेखन न किया हो, किंतु उनके विचार-ढाँचे में रैदास को बौद्ध–श्रमण परंपरा की निरंतर कड़ी, ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के आलोचक तथा दलित मुक्ति चेतना के ऐतिहासिक अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

यह लेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि संत रैदास बौद्ध नहीं थे, किंतु उनकी सामाजिक दृष्टि बौद्ध नैतिकता और सामाजिक दर्शन से गहराई से प्रभावित थी।
उनकी जाति-विरोधी चेतना, मानव समानता पर बल और बेगमपुरा की समाज-कल्पना बौद्ध धम्म की ऐतिहासिक विरासत का विस्तार प्रतीत होती है।

इस प्रकार, संत रैदास को भारतीय इतिहास में भक्ति और बौद्ध सामाजिक चेतना के सेतु के रूप में समझा जाना चाहिए।

 

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