बसपा की महारैली: मायावती की घोषणाएं, निशाने और सेल्फगोल

 बसपा की महारैली: मायावती की घोषणाएं, निशाने और सेल्फगोल

लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की महारैली ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी। कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित यह रैली नौ साल बाद मायावती का पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन था, जिसमें लाखों समर्थक जुटे। पार्टी ने पांच लाख की भीड़ का दावा किया, जबकि अनुमान दो लाख के आसपास था। नीले रंग में रंगे समर्थकों के बीच मायावती ने लंबा भाषण दिया, जो 2027 के विधानसभा चुनावों की रणनीति, उत्तराधिकार और विपक्षी दलों पर हमलों से भरा था। लेकिन भाषण में कुछ ऐसी बातें भी थीं, जो पार्टी के लिए ‘सेल्फगोल’ साबित हुईं। आइए, विस्तार से समझें।
मायावती की प्रमुख घोषणाएं
मायावती ने रैली को बसपा के पुनरुत्थान का प्रतीक बताते हुए कई ठोस घोषणाएं कीं, जो पार्टी को मजबूत करने और वोटबैंक को एकजुट करने पर केंद्रित थीं:

अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान: बसपा 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी, कोई गठबंधन नहीं। उन्होंने कहा कि 1993 और बाद के गठबंधनों से केवल 67 सीटें मिलीं, जबकि 2007 में अकेले लड़कर 200 से ज्यादा सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। गठबंधन सरकारें कभी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं।
पूर्ण बहुमत सरकार का वादा: बसपा की सरकार बनने पर दलितों-पिछड़ों के खिलाफ सभी कानून बदल दिए जाएंगे। ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ वाली सरकार बनेगी, जिसमें रोजी-रोटी के लिए पलायन न हो। संविधान की रक्षा का वादा किया, कहा कि बसपा ही बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान को बचा सकती है।
उत्तराधिकारी का लॉन्च: भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का भविष्य बताया। भाषण से पहले आकाश ने मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने का आह्वान किया। मायावती ने कहा कि जैसे कांशीराम के बाद उन्होंने उनका साथ दिया, वैसे ही आकाश के साथ खड़े हों। आकाश दिल्ली में पार्टी का लेखा-जोखा संभाल रहे हैं।
जातीय समीकरण साधना: एडवोकेट सतीश चंद्र मिश्र के बेटे कपिल मिश्र और उमाशंकर सिंह को अगली पंक्ति में लॉन्च किया, ताकि ब्राह्मण वोटरों को संदेश जाए। कार्यकर्ताओं से बूथ स्तर पर छोटी सभाएं कर 2007 सरकार की उपलब्धियां बताने को कहा।
संगठन मजबूत करने का आह्वान: ‘लड़ूंगी, अकेले लड़ूंगी, लड़ना और जीतना है’ का नारा दिया। कार्यकर्ताओं से पारंपरिक वोटरों को मोबलाइज करने और नए वोटरों को जोड़ने को कहा।

ये घोषणाएं बसपा की ‘साइलेंट एक्टिविज्म’ रणनीति का हिस्सा लगीं, जो पिछले महीनों से चली आ रही थीं।
मायावती के निशाने
मायावती का भाषण आलोचना से सराबोर था। उन्होंने सपा और कांग्रेस को सबसे तीखा निशाना बनाया, जबकि भाजपा पर अपेक्षाकृत कम मुखर रहीं। मुख्य हमले ऐसे थे:

सपा (अखिलेश यादव) पर: ‘दोगला’ और ‘दोहरा चरित्र’ वाला बताया। सत्ता में रहते PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) याद नहीं आता, विपक्ष में याद आ जाता। कांशीराम स्मारकों का पैसा दबा लिया, शहरों के नाम बदले (जैसे कांशीराम नगर), योजनाएं बंद कीं। अंबेडकर से दलित नायकों का अपमान किया। PDA फॉर्मूला को बसपा के वोटबैंक में सेंध बताया, जो 2024 लोकसभा चुनावों में नुकसान का कारण बना।
कांग्रेस पर: ‘हवा-हवाई’ और ‘नाटकबाज’ कहा। संविधान की किताब हाथ में लेकर नाटक कर रहे, इमर्जेंसी लगाकर अपमान किया। घोषणा-पत्रों के आधे से ज्यादा वादे अधूरे। पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया।
भाजपा/केंद्र सरकार पर: मुफ्त अनाज वितरण को लोगों को ‘गुलाम और लाचार’ बनाने की साजिश बताया। ईवीएम में धांधली से बसपा को चुनाव जीतने से रोका। धर्म के नाम पर लड़वाना, दलित आदर्शों का अपमान। कश्मीर के पहलगाम हमले पर सुरक्षा लापरवाही की आलोचना। विदेशी टैरिफ नीति पर सजग रहने की सलाह। गुंडों-माफियाओं को बढ़ावा देने का आरोप।
सभी जातिवादी दलों पर: सपा-कांग्रेस-भाजपा सबको संकीर्ण सोच वाला बताया। सत्ता से बाहर होने पर बहुजन नायकों को याद करते, सत्ता में भूल जाते। छोटे संगठनों से वोट कटवाने की साजिश। आजम खान से मुलाकात की अफवाहों को झूठा बताया।

मायावती की मुख्य लड़ाई सपा-कांग्रेस से लगी, क्योंकि उनका फॉर्मूला बसपा की जमीन खिसका रहा है।
सेल्फगोल: योगी तारीफ ने मचाई हड़बड़ी
रैली का सबसे बड़ा ‘सेल्फगोल’ मायावती की शुरुआती तारीफ थी, जो विपक्ष के लिए अमृत बन गई। भाषण की शुरुआत में ही उन्होंने योगी सरकार की सराहना की कि सपा ने कांशीराम स्मारकों का पैसा दबा लिया था, लेकिन योगी ने बसपा के अनुरोध पर पार्क टिकटों का पैसा मरम्मत पर खर्च किया। यह बात, जो शायद अंत में आभार के रूप में कहनी थी, शुरू में आ गई और पूरा भाषण ‘योगी सरकार की तारीफ’ के रूप में प्रचारित हो गया।

इससे पुराने आरोप (मायावती पर भाजपा से गठजोड़) को बल मिला, भले बेबुनियाद हों।
पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक मुस्लिम वोटरों के लिए यह तारीफ गले न उतरेगी, जो अल्पसंख्यकों को दूर करने वाला संदेश बनेगा। रैली में अल्पसंख्यकों को मजबूत संदेश देने का मौका चूक गईं।
राजनीतिक विश्लेषक इसे बड़ा नुकसान मानते हैं, क्योंकि चुनाव डेढ़ साल दूर हैं, लेकिन डैमेज हो चुका। बसपा सफाई दे सकती है, पर समय महत्वपूर्ण है।

कुल मिलाकर, रैली ने बसपा को पुनर्जीवित करने की कोशिश दिखाई, लेकिन सेल्फगोल ने संदेश को कमजोर कर दिया। मायावती की हुंकार ताकत की कम, चुनौतियों के डर की ज्यादा लगी। 2027 चुनावों में यह रैली कितना असर दिखाएगी, समय बताएगा।

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