रोज़गार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाओ
केन्द्र सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम की जगह विकसित भारत- रोज़गार एवं आजीविका मिशन की गारंटी- ग्रामीण अधिनियम लेकर आई है। सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) इसका विरोध करती है क्योंकिः
1.मनरेगा, जो परे देश में लागू था, में मजदूर के काम मांगने पर काम दिए जाने का प्रावधान था। जबकि नए अधिनियम के अंतर्गत सरकार तय करेगी कि कहां पर, कितना और किस तरह का काम, कितने मजदूरों को दिया जाए। मजदूर का अधिकार खत्म कर पहल सरकार ने अपने हाथ में ले ली है।
2.मनरेगा में केन्द्र सरकार और राज्य सरकार का बजट में हिस्सा 90ः10 के अनुपात में था जबकि नए अधिनियम में यह अनुपात 60ः40 होगा। गरीब राज्यों में कम बजट के कारण काम अपने आप कम मिलेगा और मजदूर पलायन करने को मजबूर होगा।
3.खेती के समय नए अधिनियम के तहत 60 दिनों काम बंद रहेगा। इसकी वजह से बड़े किसान व जमींदार मजदूरों का मनमाना शोषण कर पाएंगे क्योंकि मजदूर के पास सरकार द्वारा दिए जा सकने वाले काम का विकल्प नहीं रहेगा।
सोशिलस्ट पार्टी (इण्डिया) मांग करती है कि नए अधिनियम को वापस लेकर निम्न प्रावधानों के साथ मनरेगा को वापस लाया जाएः
1,काम की गारंटी के दिन 200 तक बढ़ाए जाएं और इसे न्यूनतम माना जाए। अधिकतम पूरे साल का काम दिए जाए।
2,मजदूरी की दर रु. 600 प्रति दिन की जाए।
3,किसान के निजी खेत पर भी जो काम मजदूर करते हैं उनका मजदूरी का भुगतान मनरेगा के तहत कराया जाए ताकि किसान के ऊपर बढ़ी मजदूरी का बोझ न आए।
4,यदि ग्रामीण इलाके में कोई अपनी आजीविका के लिए कुछ करना चाहता है और उसमें मजदूर लगते हैं तो इन मजदूरों की मजदूरी भी मनरेगा से दी जाए।
5,मनरेगा में भ्रष्टाचार पर पूरी तरह रोक लगाई जाए और बकाया मजदूरी का भुगतान तय समय के अंदर किया जाए। ठेकेदारों और मशीनों पर प्रतिबंध के प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाए।
मनरेगा जैसा अधिनियम सभी जगहों के पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए भी लाया जाए और 200 दिनों के काम की गारंटी उसमें भी दी जाए। सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) रोज़गार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग करती है।
संदीप पाण्डेय, प्रधान महासचिव, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया)
अनिल मिश्र, अध्यक्ष, सोशलिस्ट किसान सभा








