भाजपा के लिए खतरे की घंटी है हिमाचल उप चुनावों के परिणाम 

सी.एस. राजपूत  
प चुनावों में भाजपा को जनता की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा है। बेरोजगारी और महंगाई को अनदेखा करना भाजपा के लिए परेशानी पैदा करने वाला कदम है। किसान आंदोलन को कुचलने की रणनीति ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। भाजपा की हर समस्या को हिन्दू मुस्लिम के मुद्दे में उलझाने की रणनीति भारी पड़ रही है। जमीनी मुद्दे को भावनात्मक मुद्दों से ढकने की जो भाजपा ने नीति अपनाई हुई है उससे अब जनता ऊबने लगी है। हिमाचल प्रदेश के उप चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद एक लोकसभा सीट मंडी और तीन विधानसभा क्षेत्रों फतेहपुर, अर्की और जुबल-कोटखाई के उपचुनावों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलना सरकार और पार्टी की नीतियों  को कठघरे में खड़ा कर रही है। दरअसल अगले साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह उप चुनाव का इन विधानसभा चुनावों पर भी असर डालेगा।  भाजपा को सबसे अधिक चिंता उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब  के विधानसभा चुनाव की  चिंता सता रही है। विशेषकर उत्तर प्रदेश की। जगजाहिर है कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में पिछले सात वर्षों से एनडीए की सरकार है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी भाजपा की सरकार है।  खास बात यह है कि मध्य प्रदेश में मंडी लोकसभा क्षेत्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का गृह जिला है। जुबल-कोटखाई सीट पर तो भाजपा प्रत्याशी नीलम सेराइक अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं, उन्हें महज 2,644 वोट मिले। उन्हें सेराइक को पार्टी के बागी के हाथों हार झेलनी पड़ी, जिनके पिता पहले इस सीट से विधायक हुआ करते थे। फतेहपुर और अर्की सीटें पहले से कांग्रेस के पास थी, पार्टी उसको बरकरार रखने में सफल रही।

हालांकि कुछ नतीजे सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में भी आये हैं। असम में भाजपा और उसके सहयोगी दल को सभी सीटों पर सफलता मिली है। मध्य प्रदेश में खंडवा लोकसभा सीट सत्तारूढ़ भाजपा ने बरकरार रखी और कांग्रेस से जोबट (सुरक्षित) और पृथ्वीपुर विधानसभा सीटें छीन ली।

दरअसल भाजपा का महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर गंभीरता न बरतना नुकसान पहुंचा रहा है। जाति धर्म का माहौल बनाकर  भाजपा  हर समस्या को दबाने का प्रयास कर रही है। नए कृषि कानूनों के विरोध में देश में चल रहे किसान आंदोलन को केंद्र सरकार जिस तरह से अनदेखा कर उसे दबाने में लगी है, उसका असर लोगों पर गलत पड़ रहा है। गत दिनों जिस तरह से देश में किसानों और भाजपा नेताओं के बीच चला उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता है।  जब कोई हथकंडा उनके काम न आया तो भाजपा नेता कानून हाथ में लेकर खुद किसानों के आंदोलन को कुचलने के लिए सड़कों पर आ गये और केंद्र सरकार चुप्पी साधे रही।
लोगों के नाराजगी को अनदेखा करना भाजपा को भारी पड़ रहा है। आने वाले पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। लखीमपुर खीरी कांड का असर उप चुनाव पर भी देखने को पड़ा है। यह अपने आप में प्रश्न कि 9 महीने से आंदोलित किसानों की बात आखिर क्यों ? मोदी सरकार क्यों नहीं सुन रही है ? क्या सत्ता सौंपने का मतलब मनमानी करने का अधिकार होता है ? क्या सत्ता में बैठने के बाद जनता की राय और सहमति का कोई मतलब नहीं होता है।
दरअसल भाजपा ने सत्ता कब्जाने के चक्कर में अडानी और अंबानी जैसे पूंजीपतियों का इतना एहसान ले लिया है कि जनता का गला घोंटने में भी इन्हें कोई उरेज नहीं। यह पूंजपीतियों का ही दबाव है कि ये लोग किसी भी सूरत में नये कृषि कानून लागू करने में लगे हैं।  भाजपा सत्ता में क्या आ गई कि उसे अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज में आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही नजर आने लगे।  सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए आंदोलन को कुचलने के  बाद भाजपा का आचरण ऐसा हो गया कि भाजपा नेता सत्ता में रहते हुए भी कानून हाथ में लिये घूमने लगे।  उत्तर प्रदेश में लखीमपुर कांड सामने है। केंद्र का गृह राज्य मंत्री देश में कानून व्यवस्था लागू कराने के लिए अहम व्यक्ति माना जाता है। जब वही व्यक्ति कानून हाथ में ले। किसानों को सुधर जाओ नहीं तो सुधार दिये जाओगे कहने लगे। तो उसके इस व्यवहार का असर उसके आसपास तो पड़ेगा ही। हो गया लखीमपुर कांड। एक प्रदेश का मुख्यमंत्री ‘अपने घरों से हजार लोगों के साथ लठ लेकर निकलें और किसानों को सबक सिखाओÓ कहने लगे।

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