दिल्ली विधानसभा भी खत्म कर सकती है भाजपा!

चरण सिंह राजपूत
भाजपा के गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दिल्ली के तीनों नगर निगमों को मिलाकर एक करने का विधेयक ऐसे ही पेश नहीं किया है। दिल्ली नगर निगमों के एकीकरण के पीछे भाजपा की बड़ी रणनीति छिपी हुई है। दरअसल भाजपा ने आम आदमी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री को घेरने के लिए एक खतरनाक चक्रव्यहू की रचना कर दी है। जहां केंद्र सरकार दिल्ली में आम आदमी को घेरने की रणनीति बना रहंी है वहीं पंजाब में भी उसे घेरने की व्यवस्था भी भाजपा ने कर दी है। केंद्र शासित क्षेत्र प्रशासन चंडीगढ़ के कर्मचारियों की सेव शर्तं गृहमंत्री अमित शाह ने केंद्रीय सिविल सेवाओं के अनुरूप करने का ऐलान ऐसे नहीं किया है।
चंडीगढ़ के 60 फीसद राजस्व से पंजाब को वंचित रखने की बनाई रणनीति : दरअसल केंद्र सरकार चंडीगढ़ को पूरी तरह से अपने अधीन कर पंजाब सरकार को मिलने वाले 60 फीसद राजस्व से वंचित कर मान सरकार को बड़ा झटका देना चाहती है। केंद्र सरकार की दिल्ली में भी रणनीति बन रही है कि तीनों नगर निगमों को मिलाकर एक कर उसे हर स्तर पर अपने ही अधीन रखा जाए। नगर निगमों के लिए राज्य सरकार को पैसा देने के बजाय अपने स्तर से नगर निगम को दिया जाए। दरअसल तीनों नगर निगमों में वेतन और पेंशन को लेकर होने वाले आंदोलनों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार यह खेल करना चाहती है। केंद्र सरकार ने केजरीवाल को फेल करने के लिए दिल्ली सफाई कर्मचारियों को स्थाई करने की भी रणनीति बनाने की बात सामने आ रही है। ऐसा करके वह सफाई कर्मचारियों की सहानुभूति बटोर कर केजरीवाल का एक बड़ा वोटबैंक छीनना चाहती है।
केरजीवाल के दिल्ली मॉडल को फेल करने की रणनीति : केजरीवाल के दिल्ली मॉडल के बलबूते भाजपा को चुनौती देने वाले केजरीवाल को चारों ओर से घेरने की रणनीति भाजपा ने बनाई है। जैसे दिल्ली में कभी एक नगर निगम होने का हवाला देकर तीनों नगर निगमों को एक करने जा रही है। ऐसे ही किसी समय दिल्ली में विधानसभा न होने का हवाला देकर दिल्ली विधानसभा को भी खत्म करने की रणनीति भाजपा बना रही है। भले ही आज की तारीख में इस बात को गंभीरता से न लिया जाए पर तीनों नगर निगमों के एक होते ही भाजपा दिल्ली विधानसभा को खत्म करने का विधेयक पेश कर सकती है। इसके पीछे दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, सभी केंद्रीय मंत्रियों के साथ ही सांसदों के अलावा दूतावास होने का तर्क देकर केंद्र सरकार सभी कुछ अपने अधीन रहे का तर्क दे सकती है। अमित शाह ने लोकसभा में ऐसे ही केजरीवाल को टारगेट नहीं बनाया है। दरअसल दिल्ली विधानसभा का गठन पहली बार 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत किया गया था। वह बात दूसरी है कि 1 अक्टूबर 1956 को इसका उन्मूलन कर दिया गया। बाद में सितम्बर 1966 में विधानसभा की जगह 56 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्यों वाली एक मेट्रोपोलिटन काउंसिल ने ली। यह भी जमीनी हकीकत है कि दिल्ली के शासन इस परिषद की भूमिका केवल एक सलाहकार के रूप में  थी और परिषद के पास क़ानून बनाने की कोई शक्ति नहीं थी।
वर्ष 1991 में 69वें संविधान संशोधन अधिनियम के पश्चात् एनसीआर अधिनियम, 1991 ने केंद्र-शासित दिल्ली को औपचारिक रूप से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की पहचान दी और विधान सभा एवं मंत्री-परिषद से संबंधित संवैधानिक प्रावधान निर्धारित किये।
1993 में पहली विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी से मदन लाल खुराना साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज मुख्यमंत्री रहे तो 1998 में दूसरी विधानसभा में कांग्रेस से शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनी। 2003 में तीसरी विधानसभा में फिर से कांग्रेस से शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं। 2008 में चौथी विधानसभा में कांग्रेस से शीला दीक्षित तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। 2013 में पांचवी विधानसभा में अन्ना आंदोलन के बल पर बनी आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। 2015 में छठी विधानसभा में आम आदमी पार्टी से फिर अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। 2020 में सातवीं विधानसभा में आम आदमी पार्टी से हैट्रिक बनाई।

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