Matter of Faith : और अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही विवाद तो दिल्ली में कुतुबमीनार विवाद गहराने के बने आसार!

Matter of Faith : ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले में मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज होने और हिन्दू पक्ष की सुनवाई को जारी रखने से हिन्दू संगठनों में देखा जा रहा जबर्दस्त उत्साह

चरण सिंह राजपूत

जो लोग यह समझ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण मामला निपटा देने के बाद देश में मंदिर और मस्जिद की राजनीति खत्म हो गई है वह समझ लें कि देश से मंदिर-मस्जिद की राजनीति न खत्म हुई है और न ही उसके खत्म होने के कहीं से कोई आसार लग रहे हैं। हां इसका स्वरूप बदल रहा है। मंदिर-मस्जिद की राजनीति पर आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत के हिन्दुओं को हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने से बचने की बात का भी कोई असर नहीं पड़ा है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद अब मथुरा में कृष्णजन्मभूमि, शाही मस्जिद विवाद तो दिल्ली में कुतुबमीनार विवाद जोर पकड़ रहा है। वाराणसी में जिला अदालत के ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले की पौषणीयता पर सवाल उठाने वाली याचिका खारिज होने और अधिकार की मांग वाली याचिका पर सुनवाई जारी रखने के बाद तो हिन्दू पक्ष में जबर्दस्त उत्साह है।

\दरअसल ज्ञानवापी में हिन्दुओं के पक्ष में बन रहे माहौल के बाद अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही मस्जिद विवाद के गहराने की पूरी संभावना बन गई है। यह विवाद मथुरा की 13.37 एकड़ जमीन को लेकर है। इसमें से 10.9 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान और 2.5 एक जमीन ईदगााह मस्जिद के पास है। याचिकाकर्ता मनीष यादव ने पूरी जमीन देने और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की है। याचिकाकर्ता ने विवादित स्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराने की भी मांग की है। यह मामला निचली अदालत में लंबित है। इसे देखते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया था। दरअसल हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब चार महीने में जिला अदालत को इस याचिका पर फैसला देना है। मथुरा की कोर्ट में श्री कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद मामले में अब तक 11 याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं।

याचिकाकर्ता की मांग है कि मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में मुगल शासक औरंगजेब के कार्यकाल में बनी शाही ईदगााह मस्जिद को वहां से हटाया जाए, श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से दायर याचिका में13.37 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक की मांग की गई है। कृष्ण भक्तों ने कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही प्रबंध समिति के बीच 1968 में हुए समझौते को अवैध बताया है। इनकी मांग है कि समझौते को निरस्त किया जाए और मस्जिद को हटाकर पूरी जमीन मंदिर ट्रस्ट को सौंपी जाए। समझौते को भगवान कृष्ण व उनके भक्तों की इच्छा के विपरीत बताया गया है।
दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1935 में 13.37 एकड़ की विवादित जमीन बनारस के राजा कृष्ण दास का अलाट कर दी थी। श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने 1951 में यह जमीन अधिग्रहीत कर ली थी। इस ट्रस्ट को 1958 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह कमेटी से रजिस्टर्ड कराया गया था। साल 1968 में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगााह कमेटी के बीच हुए समझौते में इस 13.37 एकड़ जमीन का स्वामित्व ट्रस्ट को मिला और ईदगााह मस्जिद का मैनेजमेंट ईदगााह कमेटी को दे दिया गया।
उधर ईदगाह मस्जिद के पक्ष का दावा है कि जो लोग मस्जिद को मंदिर का हिस्सा मान रहे हंै वह तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। उसका दावा है कि इतिहास में कोई भी ऐसा तथ्य नहीं है जो यह बताता हो कि मस्जिद का निर्माण मंदिर का तोड़कर किया गया था या श्री कृष्ण का जन्म उस जगह पर हुआ था जहां पर मौजूदा ईदगाह है। ईदगाह पक्ष इस मामले में दी प्लेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट 1991 का हवाला देता है। इस कानून के मुताबिक इस एक्ट में कहा गया है कि देश में 1947 से पहले धार्मिक स्थलों को लेकर जो स्थिति थी उस उसी बरकरार रखी जाएगी। उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इस एक्ट में राज जन्मभूमि विवाद को अपवाद बताया गया था।
ऐसा माना जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब आलमगीर ने 1669 में श्रीकृष्ण मंदिर को तोड़वा दिया था और ईदगााह का निर्माण कराया था। हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्मस्थान कंस कारागार उसी ढांचे के नीचे स्थित है। वहां पर पहले केशवराय मंदिर हुआ करता था।
वैसे भी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष दिनेश शर्मा ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान के निकट स्थित एक और मस्जिद को ठाकुर केशवदेव की 13.37 एकड़ जमीन में स्थित बताया है। अदालत में दावा किया गया है कि यह मस्जिद अतिक्रमण है। दरअसल शाही मस्जिद ईदगाह के विवाद के बाद एक और नया मामला सामने आया है। अदालत में दावा किया गया है कि यह मस्जिद अवैध अतिक्रमण है। हाल ही में इस पर नया निर्माण भी किया गया है जो कि गलत है। अदालत से इसे हटाने की मांग की है। महासभा के कोषाध्यक्ष ने सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में प्रस्तुत किये गय वाद में कहा है कि औरंगजेब ने श्रीकृष्ण जन्मभिूम मंदिर को तोड़ा और शाही ईदगाह को अतिक्रमण के रूप में खड़ा किया है। उसके बाद आरंगजेब के वंशजों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पूर्वी सीमा पर कथित मीना मस्जिद बना डाली जो कि गलत है तथा इस जमीन से हटाया जाए।
उधर दिल्ली कुतुबमीनार परिसर में भी पूजा की इजाजत का मामला जोर पकड़ रहा है। दिल्ली साकेत कोर्ट में यह मामला चल रहा है। इस मामले में सुनवाई अर्जी में एक व्यक्ति ने आगरा से लेकर मेरठ तक की हुई जमीन का अपनी पुश्तैनी विरासत बताया है और इस लिहाज से कुतुब मीनार पर भी अपना अधिकार बताया है। दरअसल कुतुब मीनार परिसर में रखी मूर्तियों की पूजा करने की मांग को लेकर दिल्ली साकेत कोर्ट में दायर याचिका पर महेंद्र ध्वज प्रसाद सिंह ने कहा कि उन्हें इस मामले में पार्टी बनाया जाए। उनका दावा है कि कुतुब मीनार जिस जमीन पर बनी है वह उनके परिवार की है। इसलिए कुतुब मीनार के आसपास की जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास नहीं है, वहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इन याचिकाओं का विरोध कर रहा है।
दरअसल कुतुब मीनार देश की प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। कुतुब मीनार भारत का सबसे ऊंचा पत्थरों का स्तंभ है। कुतुब मीनार इसके आसपास स्थित कई अन्य स्मारकों से घिरा हुआ है और इस पूरे परिसर को कुतुब मीनार परिसर कहते हैं। साउथ दिल्ली की महरौली में स्थित कुतुब मीनार की ऊंचाई करीब 238 फीट है। वहीं इसमें 379 सीढि़यां हैं। स्तंभ की ऊंचाई का डायमीटर 9 फीट है तो वहीं उसका बेस 46.9 फीट डायमीण का है। इस निर्माण साल 1991 से साल 1220 के दौरान कराया गया। साल 1993 में कुतुुब मीनार को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा मिला।

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