भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39 और समकालीन राजनीतिक अर्थव्यवस्था: संवैधानिक समाजवाद बनाम असमानता की वास्तविकता

एस आर दारापुरी 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39 सामाजिक-आर्थिक न्याय की एक बुनियादी दृष्टि प्रस्तुत करता है, जिसमें संसाधनों के समान वितरण, धन के संकेन्द्रण की रोकथाम तथा नागरिकों के लिए पर्याप्त आजीविका की गारंटी जैसे लक्ष्य शामिल हैं। यह शोध-पत्र इस प्रश्न की पड़ताल करता है कि समकालीन भारत में यह संवैधानिक दृष्टि किस हद तक साकार हुई है। हाल के असमानता संबंधी आंकड़ों, श्रम संरचना, और नीतिगत परिवर्तनों के विश्लेषण के आधार पर यह तर्क दिया गया है कि आर्थिक विकास के बावजूद भारत में धन का संकेन्द्रण बढ़ा है, श्रम असुरक्षा कायम है और संसाधनों तक पहुँच में असमानता गहरी हुई है। उदारीकरण के बाद राज्य की भूमिका में आए परिवर्तन ने इस विचलन को और तीव्र किया है। निष्कर्षतः, अनुच्छेद 39 आज मुख्यतः एक मानक (normative) आदर्श बनकर रह गया है।

 

प्रस्तावना

 

भारतीय संविधान केवल राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की भी परिकल्पना करता है। इस दृष्टि का सबसे स्पष्ट प्रतिफलन राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) में मिलता है, विशेषकर अनुच्छेद 39 में।

अनुच्छेद 39 राज्य को यह निर्देश देता है कि:

सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों
भौतिक संसाधनों का वितरण “सामान्य भलाई” के लिए किया जाए
धन और उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण रोका जाए
यह प्रावधान स्पष्ट रूप से एक पुनर्वितरणवादी (redistributive) और सामाजिक न्याय-उन्मुख राज्य की परिकल्पना करता है।

संविधान निर्माता B. R. Ambedkar ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि यदि सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित नहीं की गई, तो राजनीतिक लोकतंत्र टिकाऊ नहीं रहेगा।¹

इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है:
क्या समकालीन भारत अनुच्छेद 39 की इस दृष्टि के अनुरूप विकसित हुआ है, या उससे विचलित हुआ है?

 

अनुच्छेद 39 का वैचारिक और संवैधानिक संदर्भ

 

अनुच्छेद 39 भारतीय संविधान के उस व्यापक ढाँचे का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य समाज का पुनर्गठन करना है। इसके प्रमुख तत्व हैं:

आजीविका का अधिकार, संसाधनों का समान वितरण, आर्थिक शक्ति के संकेन्द्रण की रोकथाम एवं श्रमिकों का संरक्षण

यह दृष्टि उदारवादी पूंजीवाद से अलग है और कल्याणकारी राज्य तथा समाजवादी विचारधारा के अधिक निकट है।

डॉ. आंबेडकर के States and Minorities (1947) दस्तावेज़ में राज्य द्वारा प्रमुख उद्योगों और कृषि के नियंत्रण की स्पष्ट वकालत मिलती है।² इससे स्पष्ट होता है कि अनुच्छेद 39 केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक नीति-निर्देशक खाका था।

3. वैचारिक आधार: समाजवाद, फैबियन प्रभाव और आंबेडकरवादी दृष्टि

अनुच्छेद 39 के पीछे कई वैचारिक स्रोत कार्यरत थे:

 

समाजवादी प्रभाव

धन के संकेन्द्रण का विरोध और संसाधनों के सामाजिक उपयोग की अवधारणा समाजवादी चिंतन से मेल खाती है।

 

फैबियन समाजवाद

 

Jawaharlal Nehru सहित कई नेताओं पर फैबियन समाजवाद का प्रभाव था, जो क्रमिक सुधार और लोकतांत्रिक माध्यमों से समानता स्थापित करने की वकालत करता था।

(iii) आंबेडकरवादी दृष्टिकोण

आंबेडकर ने न तो शुद्ध पूंजीवाद को स्वीकार किया और न ही हिंसात्मक मार्क्सवाद को। उनका दृष्टिकोण था:

संवैधानिक तरीकों से समाजवाद, सामाजिक न्याय और जाति उन्मूलन एवं आर्थिक लोकतंत्र

इस प्रकार अनुच्छेद 39 एक संश्लेषण (synthesis) है—समाजवाद, उदारवाद और आंबेडकरवाद का।

 

उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का रूपांतरण

1

991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को मूल रूप से बदल दिया:

राज्य का नियंत्रण कम हुआ, निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी तथा वैश्विक पूंजी के साथ एकीकरण हुआ

इन नीतियों ने उच्च आर्थिक विकास को संभव बनाया, परंतु इसके वितरणात्मक परिणाम असमान रहे।³

5. धन का संकेन्द्रण: आंकड़ों का विश्लेषण

हाल के अध्ययनों से स्पष्ट है कि भारत में असमानता तेजी से बढ़ी है:

शीर्ष 1% के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% है⁴
निचले 50% के पास मात्र 3% संपत्ति है⁵
कोविड-19 के दौरान:

अरबपतियों की संपत्ति में तेज वृद्धि हुई
गरीबों की स्थिति और खराब हुई
यह प्रवृत्ति अनुच्छेद 39(c) के सीधे विपरीत है।

6. श्रम क्षेत्र की वास्तविकता: असंगठितकरण और असुरक्षा

भारत में:

लगभग 80–85% श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं⁶
उन्हें सामाजिक सुरक्षा, स्थायी रोजगार और न्यूनतम वेतन का अभाव है
गीग अर्थव्यवस्था ने इस असुरक्षा को और बढ़ाया है।

यह स्थिति अनुच्छेद 39(a) और (e) के उद्देश्यों को अधूरा छोड़ती है।

 

संसाधनों तक असमान पहुँच

 

(i) भूमि असमानता: भूमि स्वामित्व अत्यंत असमान है⁷

(ii) आदिवासी विस्थापन: खनन और विकास परियोजनाओं के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है⁸

(iii) कॉर्पोरेट नियंत्रण: प्राकृतिक संसाधनों पर कॉर्पोरेट नियंत्रण बढ़ा है

इससे “सामान्य भलाई” का सिद्धांत कमजोर हुआ है।

 

गरीबी बनाम असमानता का विरोधाभास

 

हालांकि गरीबी में कमी आई है, परंतु:

असमानता बढ़ी है और विकास के लाभ असमान रूप से वितरित हुए हैं

यह “असमान विकास” (unequal growth) की स्थिति है।

 

राज्य की बदलती भूमिका

 

पहले: कल्याणकारी और पुनर्वितरणवादी

अब: बाज़ार-सुविधादाता तथा लक्षित कल्याण योजनाएँ (DBT आदि)

इससे संरचनात्मक असमानता कम नहीं होती।

10. संवैधानिक नैतिकता और लोकतंत्र का संकट

आंबेडकर ने कहा था कि: “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं होगा, जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो।”¹

आज की असमानता इस चेतावनी को सही साबित करती है।

11. न्यायपालिका और अनुच्छेद 39

हालांकि अनुच्छेद 39 न्यायालय में बाध्यकारी नहीं है, फिर भी:

न्यायालयों ने इसे मौलिक अधिकारों की व्याख्या में शामिल किया
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में DPSPs के महत्व को स्वीकार किया⁹
12. जाति और आर्थिक असमानता

भारत में असमानता केवल वर्गीय नहीं, बल्कि जातिगत भी है:

दलित और आदिवासी अधिक गरीब हैं
भूमि और संसाधनों तक उनकी पहुँच कम है
इससे आंबेडकर का विश्लेषण और प्रासंगिक हो जाता है।

13. निष्कर्ष

समकालीन भारत में अनुच्छेद 39 की स्थिति का मूल्यांकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि:

संवैधानिक आदर्श और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर है
धन का संकेन्द्रण बढ़ा है
श्रम और संसाधनों में असमानता कायम है
अतः भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को इस प्रकार समझा जा सकता है:

“संवैधानिक रूप से समाजवादी, लेकिन व्यवहार में असमानतापूर्ण।”

  • Related Posts

    भारत की नई शासन-व्यवस्था की संरचना

    सुहास पल्शिकर  —भारत का मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य एक…

    Continue reading
    दलित राजनीति को डॉ. बी. आर. अम्बेडकर से सीख  नया क्रांतिकारी एजेंडा अपनाना होगा

    एस आर दारापुरी   स्वतंत्र भारत में दलित राजनीति…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    के अन्नामलाई के BJP छोड़ने पर संजय सिंह का बड़ा बयान, ‘सभी को लगता है कि वो विजय की तरह…’

    • By TN15
    • June 5, 2026
    के अन्नामलाई के BJP छोड़ने पर संजय सिंह का बड़ा बयान, ‘सभी को लगता है कि वो विजय की तरह…’

    US-Pakistan Relations: ‘मजबूत पाकिस्तान अमेरिका के लिए…’, ट्रंप की दूत नताली ने क्या कहा, चौड़ी हो गई शहबाज शरीफ की छाती

    • By TN15
    • June 5, 2026
    US-Pakistan Relations: ‘मजबूत पाकिस्तान अमेरिका के लिए…’, ट्रंप की दूत नताली ने क्या कहा, चौड़ी हो गई शहबाज शरीफ की छाती

    BJP से इस्तीफे के बाद के अन्नामलाई ने किया नई पार्टी बनाने का ऐलान, बोले – ‘मेरे मन में PM मोदी के लिए…’

    • By TN15
    • June 5, 2026
    BJP से इस्तीफे के बाद के अन्नामलाई ने किया नई पार्टी बनाने का ऐलान, बोले – ‘मेरे मन में PM मोदी के लिए…’

    नेटफ्लिक्स पर आते ही छा गई ये कॉमेडी-थ्रिलर फिल्म, ‘कारा’ जैसी बड़ी फिल्मों को पछाड़ नंबर 1 पर जमाया कब्जा

    • By TN15
    • June 5, 2026
    नेटफ्लिक्स पर आते ही छा गई ये कॉमेडी-थ्रिलर फिल्म, ‘कारा’ जैसी बड़ी फिल्मों को पछाड़ नंबर 1 पर जमाया कब्जा

    Khan Sir News: खान सर कभी भी हो सकते हैं गिरफ्तार? पटना के कदमकुआं थाने में FIR दर्ज

    • By TN15
    • June 5, 2026
    Khan Sir News: खान सर कभी भी हो सकते हैं गिरफ्तार? पटना के कदमकुआं थाने में FIR दर्ज

    फिर चर्चा में आई ‘मैं ठाकुर हूं’ बोलने वाली बैंक कर्मचारी आस्था सिंह, छेड़छाड़ का लगाया है आरोप

    • By TN15
    • June 5, 2026
    फिर चर्चा में आई ‘मैं ठाकुर हूं’ बोलने वाली बैंक कर्मचारी आस्था सिंह, छेड़छाड़ का लगाया है आरोप