और युवा तुर्क के हाथों से फिसल गया सत्ता का पत्ता…

धन अर्जन की चाह ने कुंद कर दी गुर्जर राजनीति के चमकते सितारे की चमक

हम क्षेत्र के एक ऐसे राजनीतिक चेहरे की चर्चा करेंगे जो कभी राजनीति के आसमान में किसी सितारे की मानिंद चमका था लेकिन उसकी धन अर्जित करने की चाह ने राजनीति के इस गुर्जर बिरादरी से ताल्लुक़ रखने वाले सितारे की चमक को कुंद कर दिया। जी हां हम बात कर रहे हैं छात्र राजनीति से निकल कर मोदीनगर क्षेत्र की राजनीति पर छा जाने का जज्बा और जुनून रखने वाले गुर्जर राजनीति के एक ऐसे युवा तुर्क की जिसके राजनीति के गलियारों में बढ़ते मजबूत, दमदार और वजनदार कदम पैसे की चकाचौंध में डगमगा गए, जिसके चलते इस नौजवान के हाथों में आया सत्ता के हुक्म का इक्का जोकर में तब्दील हो गया। यहाँ जिक्र छात्र राजनीति से उपजे राजीव दीवड़ा का है,उस राजीव दीवड़ा का जिसे क्षेत्र के सभी आम और ख़ास लोग पिंकल गुर्जर के नाम से जानते और पहचानते हैं।
पिंकल गुर्जर की एंट्री बतौर छात्र 2003 में एमएम कॉलेज से हुई थी,अपने कॉलेज के शुरुआती दिनों में पिंकल गुर्जर ने खेलों में हाथ आजमाते हुए डिस्कस थ्रो वेटलिफ्टिंग,पावर लिफ्टिंग और बॉडीबिल्डिंग में यूनिवर्सिटी स्तर पर हिस्सेदारी करते हुए सिल्वर मेडल हासिल किए, इसके बाद 2004 में समाजवादी सरकार द्वारा छात्र संघ चुनाव कराए जाने की घोषणा की गई जिसमें पिंकल गुर्जर ने महासचिव पद के लिए पर्चा दाखिल किया और छात्र-छात्राओं के बीच अपने व्यक्तित्व की स्वीकार्यता के बलबूते महासचिव पद पर जीत दर्ज की। पिंकल गुर्जर ने कॉलेज की राजनीति से शुरू हुए अपने इस राजनीति के सफर को आगे बढ़ाते हुए 2006 में राजस्थान से शुरू हुए गुर्जर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया,पिंकल गुर्जर की आंदोलनों और छात्र राजनीति में सक्रियता और पकड़ को देखते हुए अखिलेश यादव ने पिंकल गुर्जर को समाजवादी पार्टी के मोदीनगर नगर अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। समाजवादी पार्टी के नगर अध्यक्ष पद पर मनोनीत होने के बाद पिंकल गुर्जर की नजदीकियां अखिलेश यादव से लगातार बड़ी और इस पायदान तक जा पहुंची के जब भी अखिलेश यादव को मोदीनगर होते हुए किसी जिले में जाना होता था तो वे खुद पिंकल गुर्जर के कार्यालय पर अपनी गाड़ी रूकवाते और पिंकल गुर्जर को अपने साथ गाड़ी में बैठाकर गंतव्य की ओर रवाना होते थे। अखिलेश यादव से उनकी नजदीकियां इस और साफ तौर पर इशारा करती नजर आने लगी थी कि पिंकल गुर्जर का बतौर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में भविष्य उज्जवल है। उस वक्त तक गुर्जर राजनीति में युवा चेहरे के तौर पर जो एकमात्र नाम मोदीनगर से लखनऊ के राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बना हुआ था वह निसंदेह पिंकल गुर्जर का ही था उस वक्त न तो प्रशांत गुर्जर ही लाइमलाइट में नजर आते थे और न ही सरधना से हलिया विधायक अतुल प्रधान।
जब पिंकल गुर्जर युवा और गुर्जर नेता के तौर पर राजनीति में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहे थे उसी दौरान ग़ाज़ियाबाद जिले की राजनीति में एक अन्य गुर्जर चेहरे प्रशांत चौधरी का पदार्पण हुआ। धन बल में मजबूत प्रशांत चौधरी ने मोदीनगर के तमाम गुर्जर युवाओं को आकर्षित किया जो राजनीति में तो लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे थे लेकिन आर्थिक स्थिति से उतने मजबूत नहीं थे जितने की प्रशांत चौधरी। लिहाजा क्षेत्र के ज्यादातर युवा चेहरे प्रशांत चौधरी के पैसे की चमक दमक के जेरे साया अपने राजनीतिक भविष्य को दरकिनार कर उनके साथ हो लिए। प्रशांत चौधरी क्योंकि हाथी पर सवार होकर राजनीति के रण में उतरे थे इसलिए पिंकल गुर्जर ने साइकिल से किनारा कर अपने आर्थिक हितों के मध्य नजर हाथी की सवारी करना ही अपने भविष्य के लिए बेहतर समझा। क्षेत्र के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों की माने तो पिंकल गुर्जर से ये ही एक बड़ी चूक हो गई और उनका अर्श की तरफ अग्रसर राजनीतिक कैरियर फर्श पर आ गिरा।

प्रशांत चौधरी की छत्रछाया में पिंकल गुर्जर ने खुद को आर्थिक रूप से मजबूत किया इसमें तो कोई दो राय नहीं है किंतु प्रशांत चौधरी की छाया में पिंकल गुर्जर अपने राजनीतिक कैरियर के पौधे को सूखने से नहीं बचा सके और उनकी राजनीति का पौधा पेड़ बनने से वंचित रह गया। हालांकि पिंकल गुर्जर आज भी राजनीति के मंच पर सक्रिय नजर आते हैं किंतु उनकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ प्रशांत चौधरी के आसपास और प्रशांत चौधरी तक ही सिमट कर रह गई है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मोदीनगर क्षेत्र को एक युवा नेतृत्व से वंचित होकर चुकाना पड़ा है इसमें कोई संदेह नहीं है। लिहाज़ा राजनीति के अपने संभावित उज्जवल भविष्य को दरकिनार कर आर्थिक लाभ की चाह के चलते इस ऊर्जावान युवा तुर्क के हाथों से सत्ता का पत्ता ऐसे फिसल गया जैसे मुट्ठी से रेत। दरअसल राजनीति के रास्ते का यह नियम और कायदा है कि आपको मंजिल तक पहुंचाने के लिए निश्चित रूप से एकला चलो वाली कहावत को अमल में लाते हुए अपने आसपास अपने समर्थक और व्यवस्थाएं जुटानी बेहद जरूरी होता है। अगर आप अपने राजनीतिक गुरु की छाया में ही राजनीति के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे तो आपका गुरु तो मंजिल के करीब पहुंच जाएगा लेकिन आपकी राजनीति की मंजिल के बीच में हमेशा आपका गुरु ही आपसे आगे खड़ा नजर आएगा। ऐसे सैकड़ो उदाहरण है जब राजनीति में कुछ कर गुजरने की ललक और जज्बा लेकर चले लोगों ने अपने राजनीतिक गुरु से राजनीति का ककहरा पढ़ने के बाद अपनी लग राह चुनी और वे मंजिल तक पहुंच गए।

 

 

 

 

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