भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान सेनानी, सिखों के सर्वमान्य नेता और पंजाब के “ग्रैंड ओल्ड मैन” (Grand Old Man of Punjab) थे। वे अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, अदम्य साहस और देशप्रेम के लिए जाने जाते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सिखों का “अघोषित बादशाह” और देश का “लौह पुरुष” कहा था।
बाबा खड़क सिंह जन्म 6 जून 1867 को सियालकोट (अब पाकिस्तान में) के एक अमीर और कुलीन परिवार में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर सरदार हरि सिंह एक बड़े उद्योगपति और ठेकेदार थे। वे लाहौर स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक (1889) करने वाले पहले बैच के छात्रों में से एक थे। इसके बाद वे वकालत की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद गए, लेकिन पिता के निधन के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।
बाबा खड़क सिंह का नाम ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध को सफलतापूर्वक आजमाने के लिए इतिहास में दर्ज है। 1921 मे जब ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) के तोशाखाना (खजाने) की चाबियां अपने कब्जे में ले लीं, तो बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व में सिखों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया। झुकते हुए अंग्रेजों को आखिरकार चाबियां बाबा खड़क सिंह को सौंपनी पड़ीं। इस ऐतिहासिक जीत पर महात्मा गांधी ने उन्हें टेलीग्राम भेजकर बधाई दी थी और लिखा था: “भारत की आजादी की पहली निर्णायक लड़ाई जीत ली गई है।” वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) के सह-संस्थापक और इसके पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने। इसके अलावा वे सेंट्रल सिख लीग और पंजाब प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
उन्होंने अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष जेल में बिताए। डेरा गाजी खान जेल में बंद रहने के दौरान जब ब्रिटिश सरकार ने कैदियों पर पगड़ी पहनने की पाबंदी लगाई, तो उन्होंने विरोध में अपने सारे कपड़े त्याग दिए और साढ़े पांच साल तक सिर्फ कछैरा (सिखों का धार्मिक अंतर्वस्त्र) पहनकर कड़ाके की ठंड और गर्मी का सामना किया।
वे देश के विभाजन के सख्त खिलाफ थे। आजादी के बाद वे राजनीति से दूर होकर नई दिल्ली में रहने लगे, जहाँ 1963 में 96 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
वर्ष 1988 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक विशेष डाक टिकट जारी किया था। नई दिल्ली में कनॉट प्लेस के पास स्थित प्रसिद्ध सड़क का नाम उनके सम्मान में बाबा खड़क सिंह मार्ग रखा गया है।








