डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति की आलोचना और नीत्शे की उसकी व्याख्या

एस आर दारापुरी 
मनुस्मृति, जिसे “मनु के धर्मशास्त्र” के नाम से भी जाना जाता है, पारंपरिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था से संबंधित सबसे प्रभावशाली ग्रंथों में से एक है। सदियों से इसे सामाजिक संगठन, कर्तव्यों और नैतिक आचरण के मार्गदर्शक ग्रंथ के रूप में देखा जाता रहा है। किंतु भारतीय इतिहास में यह सबसे विवादास्पद ग्रंथों में भी गिनी जाती है, क्योंकि इसे जाति-आधारित पदानुक्रम और सामाजिक असमानता को वैधता प्रदान करने वाला ग्रंथ माना गया है। आधुनिक काल में जिन दो प्रमुख विचारकों ने मनुस्मृति की व्याख्या की, उनमें डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर और जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे प्रमुख हैं। जहाँ नीत्शे ने इस ग्रंथ की सामाजिक पदानुक्रम और व्यवस्था के समर्थन के लिए प्रशंसा की, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने इसे उत्पीड़न और अन्याय का स्रोत बताते हुए इसकी तीखी आलोचना की। उनकी परस्पर विरोधी व्याख्याएँ समाज, नैतिकता और मानवीय गरिमा के बारे में दो भिन्न दृष्टिकोणों को उजागर करती हैं।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर मनुस्मृति को भारत में जाति व्यवस्था की वैचारिक नींवों में से एक मानते थे। उनके अनुसार इस ग्रंथ ने जन्म के आधार पर व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति निर्धारित करके असमानता को संस्थागत रूप प्रदान किया। इसने समाज को कठोर श्रेणियों में विभाजित किया और निम्न जातियों में रखे गए लोगों के लिए सामाजिक गतिशीलता के रास्ते बंद कर दिए। अम्बेडकर का तर्क था कि मनुस्मृति ने न केवल शूद्रों और तथाकथित “अस्पृश्यों” के विरुद्ध भेदभाव को उचित ठहराया, बल्कि महिलाओं पर भी अनेक प्रतिबंध लगाए और उन्हें समान अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं से वंचित किया।

अम्बेडकर के लिए जाति केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि “क्रमबद्ध असमानता” (Graded Inequality) की ऐसी प्रणाली थी जो बंधुत्व और मानवीय एकता को नष्ट कर देती है। उनका मानना था कि मनुस्मृति ने इस दमनकारी व्यवस्था को धार्मिक वैधता प्रदान की और इस प्रकार वह एक लोकतांत्रिक तथा समतामूलक समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन गई। इसी कारण 1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान उन्होंने मनुस्मृति की प्रतियां सार्वजनिक रूप से जलाकर जाति-आधारित उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध अपने प्रतिरोध का प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया।

अम्बेडकर की आलोचना का आधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत थे। उनका मानना था कि कोई भी समाज तब तक वास्तविक अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं हो सकता जब तक वह जन्म-आधारित सामाजिक पदानुक्रम को स्वीकार करता है। उनके दृष्टिकोण में मनुस्मृति में निहित मूल्य आधुनिक लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय के साथ मूलतः असंगत थे। इसलिए उन्होंने जाति-व्यवस्था के उन्मूलन और समाज के पुनर्निर्माण का आह्वान किया, जो समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित हो।

इसके विपरीत, फ्रेडरिक नीत्शे ने मनुस्मृति को बिल्कुल भिन्न बौद्धिक दृष्टिकोण से देखा। उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में नीत्शे ईसाई धर्म और आधुनिक समतावाद के प्रखर आलोचक थे। उनका विश्वास था कि समाज तब फलता-फूलता है जब वह व्यक्तियों की क्षमता, शक्ति और उत्कृष्टता में मौजूद अंतर को स्वीकार करता है। इसी कारण वे मनुस्मृति के उन पहलुओं से प्रभावित हुए जो सामाजिक पदानुक्रम, श्रेणीबद्धता और भिन्नता का समर्थन करते प्रतीत होते थे।

नीत्शे ने मनुस्मृति को एक “अभिजात नैतिक व्यवस्था” (Aristocratic Moral Order) का उदाहरण माना। उन्होंने इसकी तुलना ईसाई धर्म से करते हुए इसे अधिक श्रेष्ठ बताया, क्योंकि उनके अनुसार ईसाई धर्म कमजोरी, अनुरूपता और कुंठा को बढ़ावा देता है। नीत्शे के विचार में मनुस्मृति ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व करती थी जो लोगों के बीच मौजूद भिन्नताओं को खुले रूप में स्वीकार करता है और उसी के अनुसार सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करता है। उन्होंने इसकी प्रशंसा इसलिए की क्योंकि यह सार्वभौमिक समानता के सिद्धांत को अस्वीकार करती प्रतीत होती थी।

हालाँकि नीत्शे की व्याख्या मुख्यतः दार्शनिक और अमूर्त थी। वे उन ऐतिहासिक अनुभवों से अधिक सरोकार नहीं रखते थे जो जातिगत भेदभाव का शिकार लोगों ने झेले थे। उनके लिए मनुस्मृति का महत्व मुख्यतः ईसाई नैतिकता और लोकतांत्रिक समतावाद की आलोचना के उपकरण के रूप में था। वे इसके सामाजिक परिणामों की अपेक्षा इसके वैचारिक संदेश में अधिक रुचि रखते थे।

अम्बेडकर ने मनुस्मृति के प्रति नीत्शे की प्रशंसा से स्पष्ट असहमति व्यक्त की। उन्होंने यह स्वीकार किया कि नीत्शे की “अतिमानव” (Superman)) की अवधारणा और मनु की सामाजिक पदानुक्रम की धारणा में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं। किंतु अम्बेडकर का तर्क था कि दोनों ही दृष्टिकोण अंततः सामाजिक असमानता और कुछ समूहों के प्रभुत्व को वैधता प्रदान करते हैं। उनके अनुसार कोई भी सामाजिक सिद्धांत नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता यदि वह प्रत्येक मनुष्य की समान गरिमा और मूल्य को अस्वीकार करता हो।

अम्बेडकर और नीत्शे के बीच का यह अंतर वास्तव में समानता और पदानुक्रम के बीच व्यापक दार्शनिक संघर्ष को प्रतिबिंबित करता है। नीत्शे को भय था कि समानता उत्कृष्टता और सृजनात्मकता को दबा देगी, जबकि अम्बेडकर का विश्वास था कि पदानुक्रम अनिवार्य रूप से उत्पीड़न पैदा करता है और समाज के बड़े हिस्से को अवसरों से वंचित कर देता है। नीत्शे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जो श्रेणी और विशेषाधिकार पर आधारित हो, जबकि अम्बेडकर न्याय, स्वतंत्रता और सामाजिक समावेशन पर आधारित समाज के पक्षधर थे।

निष्कर्षतः, मनुस्मृति डॉ. बी.आर. अम्बेडकर और फ्रेडरिक नीत्शे के बीच गहरे वैचारिक मतभेद का केंद्र बन गई। नीत्शे ने इसे अभिजात सामाजिक व्यवस्था के आदर्श और समतावादी मूल्यों के विकल्प के रूप में देखा, जबकि अम्बेडकर ने इसे जातिगत उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार और मानवीय पीड़ा का स्रोत माना। उनकी परस्पर विरोधी व्याख्याएँ आज भी जाति, लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय से जुड़ी बहसों को प्रभावित करती हैं। अंततः यह विवाद केवल एक प्राचीन ग्रंथ की व्याख्या का प्रश्न नहीं है, बल्कि मानव समाज की दो प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं—एक पदानुक्रम और विशेषाधिकार पर आधारित, तथा दूसरी समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित—के बीच संघर्ष का प्रतीक है।

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