ग्रेटर नोएडा में बेबस पिता के सामने ढाई घंटे में भी डूबते बेटे को न बची सकी 80 कर्मचारियों की टीम
चरण सिंह
जब लोग उदासीन हों। प्रशासन भ्र्ष्ट हो। भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले तंत्र खुद भ्रष्टाचारियों के लिए काम करने लगें तो उसके कितने बड़े दुष्परिणाम सामने आते हैं। उसका एक बड़ा उदहारण ग्रेटर नोएडा में एक बेबस बाप के सामने बेटे की दर्दनाक मौत है। यह हर किसी के लिए शर्मनाक है कि अपनी कार पर लेते डूब रहे बेटे को बचाने के लिए उसका पिता भी पहुंचता है। वह 112 नंबर पर डायल भी करता है। दमकल विभाग के साथ ही एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के 80 कर्मचारी भी पहुंचते हैं। बेटा बचाओ बचाओ चिल्लाता रहता है पर उसे बचाया नहीं जा सका। पिता के सामने ही बेटा दम तोड़ देता है। ऐसा भी नहीं कि यह कोई मामला किसी गांव या फिर कस्बे हो। देश ही नहीं विदेश में भी एक अच्छी खासी पहचान बनाए हुए हाईटैक सिटी नोएडा का है।
दरअसल ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में टाटा यूरिका पार्क सोसायटी के पास में 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की गाड़ी 16 जनवरी की रात करीब 12 बजे घने कोहरे के कारण अनियंत्रित होकर 50 फुट गहरे पानी भरे गड्ढे में जा गिरी। युवराज लगभग 90 तक बचाओ बचाओ चिल्लाता रहा पर उसे बचाया न सका। 80 लोगों की टीम नकारा साबित हुई। दरअसल जब युवराज की गाड़ी इस 50 फुट गड्ढे में गिरी तो वह किसी तरह से गाड़ी से निकलकर उसकी छत पर चढ़ गया और अपने पिता को फोन किया और घबराई हुई आवाज में बोला, मुझे बचा लो, मैं डूब जाऊंगा…।
पिता आनन फानन में घटनास्थल पर पहुंचे, लेकिन बेबस खड़े रह गए। उन्होंने डायल 112 और अन्य जगहों पर मदद मांगी। मौके पर पुलिस, दमकल विभाग और SDRF/NDRF की टीमें पहुंचीं। कुल तीन विभागों के करीब 80 कर्मचारी पर वे सब निकम्मे साबित हुए। नोएडा जैसे हाईटैक सिटी में युवराज को बचाया न सका। एक डिलीवरी बॉय ने साहस दिखाकर पानी में कूदने की कोशिश की, लेकिन वह भी नाकाम रहा। आखिरकार NDRF टीम ने देर से पहुंचकर जेसीबी से रास्ता बनाया और युवराज को निकाला, लेकिन तब तक वह डूब चुका था।
अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया। यह हादसा सिस्टम की लापरवाही, तैयारी की कमी और बुनियादी सुरक्षा (बैरेकेडिंग, चेतावनी बोर्ड, लाइटिंग) न होने का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। स्थानीय लोग गुस्से में हैं। कैंडल मार्च निकले, नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ नारे लगे। पिता ने कहा कि अगर थोड़ा साहस या बेहतर उपकरण होते तो बेटा बच सकता था। यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता और “हाईटेक” शहरों में भी जिंदगी की अनदेखी का दर्द है। देखने की बात यह है कि लोगों ने इस गद्दे में भरे पानी की शिकायत कर बार ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को की पर किसी अधिकारी के कानों पर जूं न रेंगी। रेंगती भी कैसे ? सबको पैसा चाहिए। इंसानियत, संवदेसनशीलत और जिम्मेदारी से इनको क्या लेना देना ?








