“डर और न्याय के बीच फंसी जनता”

पुलिस और कोर्ट -कचहरी का उद्देश्य जनता की रक्षा करना और न्याय देना है। लेकिन ये न्याय के रक्षक नहीं , ख़ौफ़ है, आम जनता का डर है। एक आम नागरिक जब इन संस्थाओं का नाम सुनता है, तो उसके मन में डर और असहजता का भाव उत्पन्न होता है। ।अक्सर पुलिस का व्यवहार कठोर, रूखा और अधिकार जताने वाला होता है। थाने में जाने मात्र से लोग डरते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उल्टा फँस न जाएँ या उनके साथ गलत व्यवहार न हो। कई बार देखा गया है कि पुलिस धन या राजनीतिक दबाव में आकर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करती। इससे जनता का भरोसा टूटता है और डर पैदा होता है कि न्याय नहीं मिलेगा। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ निर्दोष लोगों को जबरन आरोपी बना दिया गया या थाने में शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। इस तरह की घटनाएँ लोगों को पुलिस से दूर कर देती ।

भारत की न्याय व्यवस्था में मुकदमे सालों-साल चलते हैं। एक आम आदमी को बार-बार तारीखों पर जाना, वकीलों की फीस देना, और मानसिक तनाव सहना पड़ता है। कानूनी प्रक्रिया बहुत जटिल है। एक सामान्य व्यक्ति को इसे समझने में कठिनाई होती है और वकीलों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके साथ-साथ कानूनी खर्च भी भारी होता है, जो गरीब या मध्यम वर्ग के लोगों के लिए चिंता का विषय है। अधिकतर कानूनी कार्य अंग्रेज़ी या तकनीकी भाषा में होते हैं, जिसे आम जनता समझ नहीं पाती। यह भी एक बड़ा कारण है कि लोग कोर्ट-कचहरी से कतराते हैं। जब आम जनता को लगता है कि न्याय मांगने पर उसे ही दोषी ठहरा दिया जाएगा, तो वह अन्याय सहना पसंद करती है लेकिन कोर्ट या पुलिस के पास नहीं जाती। यह मानसिकता समाज में अन्याय को बढ़ावा देती है और अपराधियों के हौसले बुलंद करती है।

पुलिस और न्यायपालिका में सुधार — अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता जरूरी है। लोगों को उनके अधिकार और न्याय प्रक्रिया के बारे में जागरूक करना ।छोटे मामलों के लिए त्वरित न्याय प्रणाली को बढ़ावा देना चाहिए।पुलिस को जनता के साथ सहयोगी और मित्रवत संबंध बनाने चाहिए।जब तक आम जनता पुलिस और कोर्ट-कचहरी को अपने सहयोगी नहीं बल्कि शत्रु समझेगी, तब तक न्याय व्यवस्था में जनता की सहभागिता नहीं हो पाएगी। यह जरूरी है कि इन संस्थाओं में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही हो, ताकि डर नहीं, विश्वास जन्म ले। न्याय तभी सशक्त होता है जब वह सबके लिए सुलभ, सरल और निष्पक्ष हो।कोई भी व्यक्ति ना जाने क्यों पुलिसवाले से बहुत दूर रहता है । जानता है कि अगर वह केवल मात्र न्याय के लिए पुलिस के पास जाएगा तब भी पुलिस उसीको इतना परेशान करेगी वह अपना सुख चैन खो देता हैं। समझ नहीं आता कि पुलिस को जनता की सेवा के लिए चुना गया है और यही पुलिस आम आदमी को बेवजह परेशान करती रहती है और अगर शिकायत कर दो तो झूठे केस में फँसा देती है और अगर एक बार झूठे केस में फँस गए हैं तो उससे बचने के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं और यहाँ तो आम आदमी की और हालत ख़राब हो जाती है वह बेचारा न्याय की तलाश में कोर्ट कचहरी के इतने चक्कर लगाता है कि उसके पैर की चप्पलें घिस जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता । ना जाने कितना पैसा बर्बाद हो जाता है क्योंकि कचहरी में बैठा हर एक आदमी मुँह खोलें केवल पैसा ही माँगता रहता है ।

ज़रा सोचो एक मजबूर आदमी पहले से ठगा हुआ फिर भी कोर्ट में बैठा हर कर्मचारी बस उस मज़दूर को ठगना ही चाहता है । पीड़ित व्यक्ति वक़ील के पास केस करता है और वकील मनचाहा पैसा लूटता है चलो यहाँ तक तो ठीक है पर जज की जिसकी इतनी बढ़िया सैलरी है उसका काम तो न्याय करता है। पर उसे भी पैसा चाहिए । अब कम उम्र के जो नए नए जज बने हैं यह तो अपने आपको भगवान समझने लगे हैं दादागिरी है काम तो करेंगे नहीं सिर्फ़ पैसा लेंगे और एक दिन में केवल मात्र मुश्किल से आधा घंटा के लिए एक कचहरी में बैठते हैं और बिना पैसे लिए कोई काम करते ही नहीं है ।कितने शर्म की बात है न्यायालय में बैठा उच्च पद पर जज नाम की हस्ती न्याय देने की बजाय पीड़ित के साथ अन्याय करती हैं। भारतीय समाज में एक पुरानी कहावत है – “पुलिस और कोर्ट-कचहरी से जितना दूर रहो, उतना ही अच्छा है।” यह कहावत केवल डर या संकोच की भावना से नहीं, बल्कि अनुभवों और व्यावहारिक जीवन की सच्चाइयों पर आधारित है। यह लेख इसी विषय पर प्रकाश डालता है कि क्यों एक आम नागरिक के लिए पुलिस और न्यायालयों से दूरी बनाए रखना एक समझदारी भरा कदम माना जाता है। पुलिस और कोर्ट का काम जनता की रक्षा करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और न्याय दिलाना है। फिर भी, एक आम नागरिक के लिए इन संस्थाओं से जुड़ना अक्सर तनाव, समय और आर्थिक संसाधनों की बर्बादी का कारण बनता है। पुलिस थाने में एक मामूली रिपोर्ट दर्ज कराने में भी कई बार अनावश्यक पूछताछ, भ्रष्टाचार या डर का माहौल देखने को मिलता है। वहीं, अदालतों में मामलों के लंबा खिंचने, तारीख पर तारीख मिलने, वकीलों की फीस और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता आम नागरिक को थका देती है।जो व्यक्ति ईमानदारी और कानून के दायरे में रहकर जीवन जीता है, उसे पुलिस और कोर्ट की जरूरत ही नहीं पड़ती। नैतिक जीवन जीना केवल धार्मिक या आध्यात्मिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक शांति और आत्मिक संतोष का मार्ग है। जब हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं और समाज में संयमित जीवन जीते हैं, तो हम स्वतः ही इन संस्थाओं से दूर रहते हैं। यह भी समझना जरूरी है कि पुलिस और न्यायालय हमारे दुश्मन नहीं हैं। ये संस्थाएं हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए हैं, लेकिन इनका उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब कोई दूसरा विकल्प न हो। जैसे बीमार होने पर ही अस्पताल जाना चाहिए, वैसे ही जब अन्य सभी उपाय असफल हो जाएं, तभी कोर्ट-कचहरी का सहारा लेना चाहिए।हालांकि, यह भी सच है कि यदि पुलिस व्यवस्था अधिक पारदर्शी, संवेदनशील और जनोपयोगी हो और न्यायिक प्रक्रिया तेज और सुलभ हो, तो आम लोगों का भरोसा इन संस्थाओं पर और बढ़ सकता है।

तब शायद ये कहावत बदल भी सकती है। लेकिन जब तक व्यवस्था में सुधार नहीं आता, तब तक “दूरी बनाकर चलना ही समझदारी है।” पुलिस और कोर्ट-कचहरी से दूर रहो” – यह सलाह डराने के लिए नहीं, बल्कि सतर्कता बरतने के लिए है। यदि हम सही रास्ते पर चलें, सत्य का साथ दें और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें, तो न हमें पुलिस की जरूरत पड़ेगी, न कोर्ट की। और यदि कभी जरूरत पड़ भी जाए, तो कानून से न डरते हुए, पूरे आत्मविश्वास से उसका सामना करना चाहिए। हर कोई चाहता है कि कानूनी मामलों से जितना दूर रहे उतना अच्छा है। वाद-विवाद या किसी भी परिस्थिति में कोर्ट,पुलिस में फंसने के कारण व्यक्ति को पेरशानी तो झेलनी ही पड़ती है साथ ही समय और पैसे की बर्बादी के साथ मान-सम्मान की हानि भी होती है। कई बार न चाहते हुए भी कानूनी मामलों में फंसना पड़ जाता है।

  • ऊषा शुक्ला
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