विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश सरकार का सांस्कृतिक दांव

कलाकारों के लिए पेंशन योजना का ऐलान

दीपक कुमार तिवारी

नई दिल्ली/पटना। बिहार की राजनीति में एक बार फिर से कलात्मक और सामाजिक सरोकारों की दस्तक सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले एक और मास्टरस्ट्रोक चल दिया है। इस बार निशाना बनाए गए हैं राज्य के वे कलाकार जो वर्षों से मंचों पर परंपरा, संस्कृति और लोक चेतना को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने ‘मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना’ और ‘गुरु-शिष्य परंपरा योजना’ को हरी झंडी दे दी है। इसके तहत गायन, वादन, चित्रकारी, नाटक, अभिनय सहित पारंपरिक लोक विधाओं से जुड़े कलाकारों को अब हर माह ₹3,000 की पेंशन मिलेगी। यह योजना खासतौर पर वरिष्ठ और आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों के लिए तैयार की गई है। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में ₹1 करोड़ के वार्षिक खर्च को प्रशासनिक मंजूरी दी गई है।

 

कलाकारों को लुभाने की रणनीति?

 

नीतीश सरकार के इस फैसले को राजनीतिक विश्लेषक चुनावी दांव मान रहे हैं। राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए विभिन्न वर्गों को साधने की कोशिश पहले से ही तेज है। पेंशन योजना को कलाकारों के सम्मान और भरण-पोषण की दिशा में सकारात्मक पहल बताया जा रहा है, लेकिन इसे सांस्कृतिक वोट बैंक को साधने की रणनीति भी माना जा रहा है।

 

लेकिन विपक्ष ने उठाया सवाल:

 

राज्य सरकार की इस घोषणा की तुलना जब पड़ोसी राज्यों से होती है तो कुछ सवाल खड़े होते हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पहले ही वृद्ध व गरीब कलाकारों को ₹4,000 प्रतिमाह पेंशन देने का ऐलान कर चुकी है, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार वृद्ध कलाकारों को ₹6,000 तक मासिक पेंशन और ₹25,000 की एकमुश्त सहायता देती है। ऐसे में नीतीश सरकार की ₹3,000 की राशि को ‘कम और प्रतीकात्मक’ करार दिया जा रहा है।

 

तेजस्वी का पलटवार और मुकाबला:

 

तेजस्वी यादव लगातार ‘बिजली फ्री’ और ‘माई-बहिन सम्मान योजना’ जैसे लोकलुभावन वादों के जरिए नीतीश सरकार को घेरते रहे हैं। ऐसे में यह नई योजना सत्ता पक्ष की ओर से सांस्कृतिक मोर्चे पर बढ़त बनाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में कलाकारों के बीच इसका असर पड़ने की उम्मीद है, जो सामाजिक और जातीय समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

 

राजनीतिक विश्लेषण:

 

बिहार की राजनीति में कलाओं का यह हस्तक्षेप नया नहीं है, लेकिन यह पहला अवसर है जब कलाकारों को सीधे पेंशन से जोड़कर चुनावी रणनीति रची गई है। इससे यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में मतदाताओं को साधने के लिए ‘कल्याण योजनाओं’ की झड़ी और भी तेज हो सकती है।

 

संभावित असर:

 

ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में लोक कलाकारों को साधने की कवायद

युवा कलाकारों में उत्साह, लेकिन राशि को लेकर असंतोष

विपक्ष को मिला एक और मुद्दा – “पड़ोसी राज्यों से कम क्यों?”

सांस्कृतिक राजनीति का नया अध्याय

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