दही-चूड़ा भोज में नीतीश को बुला कर गायब रहे चिराग

 एक मिनट में निकल गए सीएम नीतीश

दीपक कुमार तिवारी

पटना। लोक जनशक्ति पार्टी-आर (एलजेपीआर) की ओर से मकर संक्रांति पर आयोजित दही-चूड़ा भोज एनडीए की एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए आयोजित था। पार्टी प्रमुख चिराग पासवान इस भोज के आयोजन के लिए सोमवार शाम को दिल्ली से पटना पहुंचे थे। आते ही उन्होंने पार्टी दफ्तर पहुंच कर तैयारियों का जायजा लिया। वहां मौजूद पत्रकारों से उन्होंने कहा कि पिता रामविलास पासवान की परंपरा का निर्वहन तो वे कर ही रहे हैं, लेकिन इस आयोजन का असल उद्देश्य एनडीए की एकजुटता का संदेश है। उन्होंने ये भी बताया कि एनडीए के सभी नेताओं को भोज के लिए न्योता भेजा गया है। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन भोज के वक्त जब मेहमान पहुंचने लगे तो वहां से चिराग नदारद थे। खासकर नीतीश कुमार जब मंत्री विजय चौधरी और अन्य लोगों के साथ पहुंचे तो चिराग का अता-पता नहीं था। उन्हें सूचना गई तो वे भागे-भागे आए, लेकिन तब तक सीएम नीतीश कुमार, रामविलास पासवान के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर जा चुके थे। इसके बाद अगले ही मिनट सीएम नीतीश कुमार वहां से निकल गए।
बिहार में दही-चूड़ा भोज से सियासत की शुरुआत की पुरानी परंपरा रही है। पिछले ही साल लालू प्रसाद यादव की ओर से आयोजित दही-चूड़ा भोज में नीतीश कुमार ने लालू से दही का टीका लगवाया था। उसके बाद हफ्ते भर में उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया था। इसलिए इस बार नीतीश के पहुंचने पर चिराग की गैरमौजूदगी को भी लोग किसी रणनीति का हिस्सा समझने लगे हैं। हालांकि, नीतीश कुमार सोमवार को ही उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के भोज में शामिल हुए थे। वहां ऐसी नौबत नहीं आई।
चिराग पासवान से नीतीश कुमार के रिश्ते पूर्व में अच्छे नहीं रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग ने नीतीश कुमार को बड़ी चोट पहुंचाई थी। आज भी नीतीश अगर अपने 45 विधायकों के कारण असहज हो जाते हैं तो इसकी मूल वजह चिराग पासवान की ओर से जेडीयू की ढाई दर्जन सीटों पर पराजय है। हालांकि हाल के दिनों में दोनों के रिश्ते काफी मधपुर रहे हैं। चिराग अक्सर नीतीश कुमार से मिलते हैं। वे तो अब बिहार की राजनीति करने की बात भी कहने लगे हैं। यही वजह है कि इसमें चिराग की साजिश की गंध लोग सूंघ रहे हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान अपने भी उम्मीदवार उतारना चाहते हैं। चुनाव तो जेडीयू भी लड़ना चाहती है, लेकिन भाजपा की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा कि दोनों पार्टियों के लिए वो सीटें छोड़ेगी। संभव है कि चिराग पासवान इससे खफा हों। हालांकि, नीतीश से इस मुद्दे पर नाराज होने की कोई वजह नहीं है। सीटें न मिल पाने पर दोनों की चुनाव लड़ने की इच्छा पर पानी फिर सकता है तो दोनों की भाजपा से नाराजगी होनी चाहिए। चिराग और नीतीश की पार्टियां पहले भी दिल्ली के दंगल में उतर चुकी हैं। कामयाबी नहीं मिली, यह अलग बात है। इस बार तो जेडीयू ने बाजाप्ता प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर बताया था कि पार्टी चुनाव लड़ेगी और एनडीए के बैनर तले ही लड़ेगी।
हाल के दिनों में एक बात खूब चर्चा में रही कि भाजपा नीतीश कुमार को अगली बार सीएम नहीं बनाएगी। आरजेडी के नेता भी इस बात को हवा देते रहे हैं। लालू यादव ने तो नीतीश को महागठबंधन के साथ आने का ऑफर देकर इस चर्चा को पंख लगा दी। नीतीश कुमार के कुछ दिनों तक चुप्पी साधे रहने से इस तरह के कयासों को हवा मिली। बात अब भी स्पष्ट नहीं हुई है, लेकिन नीतीश कुमार ने आरजेडी को यह कह कर जवाब दे दिया है कि वे अब एनडीए से अलग नहीं होंगे। अलबत्ता चिराग पासवान ने हाल ही में यह बात जरूर कही थी कि नीतीश के नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव एनडीए लड़ेगा और अगली बार भी नीतीश ही सीएम बनेंगे। मगर, राजनीति में किसी की बातों पर भरोसा करना मुश्किल है।

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