नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली!

डॉक्टर कल्पना पांडेय ‘नवग्रह ‘
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली । वाकई में अवसरवादिता के आयाम अभूतपूर्व हैं। किसानों पर अपनी दिखावटी घड़ियाली आंसू ने सारे भ्रमों पर पानी फेर दिया। सच है सत्ता की कसौटी दंभ और झूठ का व्यापार है।

माना गुरु पर्व पर प्रेम- सद्भाव और परोपकार की गंगा में सब को स्नान करा कर बहुत ही सराहनीय कदम उठाया है । पर जब तक संसद में इस पर मुहर नहीं लगेगी तब तक यह सिर्फ़ एक चुनावी स्टंट है। जिन हथियारों के इस्तेमाल से पिछले एक वर्ष से किसानों पर वार हो रहा था अचानक ही उनमें धार खत्म हो गई। अकारण ही कार्य संपादित और संपन्न हो गया।

अंतर्कलह और मंथन का दौर इतनी आसानी से ख़त्म! आगामी चुनाव और उनका भ्रमित करने वाला शो शुरू हो गया । किसानों की मांग जायज़ नहीं , विकास रुक जाएगा , हम नहीं झुकेंगे के बाद अचानक ही सारे जुमले धराशाई हो गए ? बात पचती नहीं। दाल में ज़रूर कुछ काला है ऐसा कहना बिल्कुल गलत है, क्योंकि यहां तो पूरी दाल ही काली है।

साम- दाम -दंड -भेद हर उपाय से जनता को भ्रमित करना । क्षणिक सुख का लालच दिखाकर अपने स्वार्थ को पूरा करने की पुरजोर कोशिश। सर्दी, गर्मी ,बरसात की मार झेलते किसान और मुसीबतों से बर्बाद होती आम जनता के लिए, अचानक ही मरहम की घुट्टी बनकर तैयार। माना सरकार का दिल बड़ा है पर दिमाग में कौन सा षड्यंत्र चल रहा है कोई नहीं जानता। वैसे तो सत्ता के पोषक आधारहीन पैमाने हैं जिधर लाभ दिखा उधर ही लुढ़क जाते हैं । चुनावी सरगर्मी और अपने कार्यों का आकलन, कहीं न कहीं मिटती साख की भरपाई करने के लिए ज़ोर आजमाइश तो नहीं !

खाद की कमी के लिए रात- दिन कतारें, मारा-मारी पर किसानों के आंसू नहीं रुक रहे। कितनी जानें चली गईं, कितने परिवार बेसहारा हो गए पर दिल नहीं पसीजा। अचानक गुरु पर्व के दिन ही दरबार सज गया, आत्मा जाग उठी। प्रेम- करुणा का सागर छलक गया। यह कहीं गिरगिट के बदलते रंग तो नहीं। चुनाव के लिए मतदाताओं की खरीद के लिए बोली लगनी तो शुरू नहीं हो गई!

किसान और आम जनता को सतर्कता से पैनी निगाह रखनी होगी। चिंतन और मनन के साथ संघर्ष करना होगा। अपने अधिकारों के लिए कुशासन और सुशासन में अंतर करना होगा। सत्ता उसे ही सौंपनी है जो देशहित के नाम पर जनता को छले नहीं । उनके ज़ख्मों पर नमक न छिड़कें। धर्माचरण का सही रूप चरित्र में उतारें।

सभी किसान भाइयों और परिवारों की खुशियां टिकी रहें इसके लिए संसद से पास होने पर ही सच्चाई की राह दिखाई देगी । चुनाव से पहले ही इस पर मुहर लगाना ज़रूरी है। जनता को जु़बानी स्वीकारोक्ति में अपने मत की कीमत को जांचते रहना है । झूठी हुआं-हुआं की पहचान सबको है होशियार माहौल बदला हुआ है।

 

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