जो लोग समझ रहे थे कि डरा धमका पर देश पर राज करते रहेंगे, जो लोग समझ रहे थे कि सरकार के गलत आदेश को लागू कर स्वार्थ सिद्ध करते रहेंगे वे अब सुधर जाएं नहीं तो देश की जनता सुधार देगी। दिल्ली जंतर मंतर पर हुए युवाओं के आंदोलन से देश में क्रांति हो चुकी है। अब बच्चे, युवा, महिलाएं हर कोई अपने हक़ के लिए खड़ा हो रहा है। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मोर्चा खुल रहा है। देश को आंदोलित होता देख अब जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोगों का भी जमीर जाग रहा है तो कुछ जनता के आक्रोश के डर से अपने में सुधार कर रहे हैं। न्यायपालिका से भी अच्छे आदेश आने लगे हैं। देश में दूसरी आज़ादी का माहौल बन चुका है। यह माहौल देश को एक बड़े बदलाव की ओर जा रहा है।
सत्ता में बैठे लोग समझ लें कि डंडे के जोर पर ज्यादा दिनों तक जनता को नहीं दबाया जा सकता है। सरकार के गलत आदेश को जनता पर थोपने वाले ब्यूरोक्रेट्स को अपने कुकर्मों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। भले ही देर से पर देश में सत्ता के अराजक नीतियों के खिलाफ लोग खड़े हो रहे हैं। एक ओर सरकार के टाल मटोल रवैये के खिलाफ एक्शन लेते हुए जहां सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली जंतर मंतर पर हुए युवाओं के आंदोलन में दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश दिया है वहीं अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन में डीयू की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता अमृता चौधरी पर लगाए गए एनएसए को अवैध करार दे दिया है। साथ ही मुआवजे के तौर पर 5 लाख रुपए देने के भी आदेश दिया है, वह भी गौतमबुद्धनगर की डीएम मेधा रूपम के वेतन से काटकर। देश के महत्वपूर्ण जिले गौतमबुद्धनगर जिले को संभाल रहीं 35 वर्षीय मेधा रूपम की सबसे बड़ी योग्यता यह है कि वह पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के चेहते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।
अमृता चौधरी पर लगे एनएसए मामले में जिला प्रशासन की ओर से छात्रा को एक विशेष विचारधारा से जुड़ा हुआ बताते हुए आंदोलनकारियों को उकसाने का आरोप लगाया गया है। महान क्रांतिकारी भगत सिंह की किताब रखने को भी अपराध माना गया है। मामले कर रहे न्यायाधीश ने बाकायदा पूछा कि यह कौन सी विशेष विचारधारा है जिस अपराध माना जा रहा है। आंदोलन को उकसाने के आरोप पर जिला प्रशासन कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। मतलब बीजेपी के राज में अपने हक़ मांगने के लिए प्रेरित करने को भी अपराध माना जा रहा है। वह देश की सुरक्षा को खतरा।
एनएसए को आंदोलन को कुचलने का हथियार बना लिया गया है। नोएडा में हो रहे असंगठित मजदूरों के शोषण पर कोई बोलने को तैयार नहीं। मीडिया भी सत्ता और प्रभावशाली लोगों की भाषा बोल रहा है। देर सवेर गोदी मीडिया में बैठे पत्रकारों को भी अपना जमीर जगाना पड़ेगा। नहीं तो जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा।
बीजेपी के राज में आंदोलन करना जैसे अपराध हो गया हो। जहां किसी ने आंदोलन किया कि आवाज को दबाने के लिए लगा दिया एनएसए। मेधा रूपम ने सरकार का हुक्म बजाते हुए अमृता चौधरी पर एनएसए तो लगवा दिया पर वह यह भूल गईं कि देश में अदालत भी है। अब देश भर में फजीहत हो रही है। मेधा रूपम जैसे आईएएस डीएम के वजूद को भी गिरा रही हैं। देश में अधिकतर ब्यूरोक्रेट्स सत्ता का हुक्म बजाकर जनता का शोषण करते हैं। लोगों का हक़ दिलाने के लिए विभिन्न पदों पर बैठे ये अधिकारी हक़ हकूक की लड़ाई लड़ने वाले लोगों की आवाज दबाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।
दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में जहां एक और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को बड़ी राहत दी है वहीं ब्यरोक्रेट्स को बड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत उनकी निरुद्धि को अवैध करार देते हुए आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें रिहा किया जाए। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा करने को कहा गया है। हाईकोर्ट के इस आदेश से शायद दूसरे डीएम भी कुछ सीख लें। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव या फिर किसी मंत्री का कुछ नहीं बिगड़ता है बात सीधे डीएम पर आती है।
दरअसल यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से आकृति चौधरी को रासुका के तहत निरुद्ध किए जाने के आधार के साथ पुलिस की कार्रवाई के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य और दस्तावेज पेश करने को कहा था।
कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि आकृति चौधरी को रासुका के तहत निरुद्ध करने की कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार और सामग्री (सबूत) प्रस्तुत नहीं की जा सकी। इसके बाद न्यायालय ने आकृति चौधरी के खिलाफ जारी निरुद्धि आदेश को रद्द कर दिया। इससे पहले हाईकोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा था कि एफआईआर दर्ज करने से पहले आकृति चौधरी को शांति भंग की आशंका के संबंध में कोई नोटिस दिया गया था या नहीं. कोर्ट ने कथित तौर पर मजदूरों को भड़काने वाले वीडियो और वॉट्सऐप चैट से जुड़ी सामग्री भी मांगी थी।
पुलिस की ओर से आरोप लगाया गया था कि 13 अप्रैल को वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चल रहे श्रमिक आंदोलन के दौरान आकृति चौधरी ने मजदूरों को भड़काने का प्रयास किया था। पुलिस के मुताबिक, इसके बाद हिंसा और आगजनी हुई तथा सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।
हाईकोर्ट में इन आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए जा सके। इसी आधार पर कोर्ट ने रासुका के तहत आकृति चौधरी की निरुद्धि को अवैध करार देते हुए आदेश रद्द कर दिया और अन्य मामले में वांछित न होने की स्थिति में उनकी रिहाई का निर्देश दिया।