स्कूल छोड़ती बेटियाँ: संसाधनों की कमी या सामाजिक चूक?

(“बेटियाँ क्यों छोड़ रही हैं स्कूल? सवाल सड़कों, शौचालयों और सोच का है” “39% लड़कियाँ स्कूल से बाहर: किसकी जिम्मेदारी?” “‘बेटी पढ़ाओ’ का सच: किताबों से पहले रास्ते चाहिए”)

 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है कि 15 से 18 वर्ष की उम्र की लगभग 39.4% लड़कियाँ स्कूल से बाहर हो चुकी हैं। शिक्षा के इस मौन पलायन के पीछे स्कूलों की दूरी, परिवहन की अनुपलब्धता, शौचालयों की कमी और सुरक्षा को लेकर भय जैसे कारण हैं। यह स्थिति केवल एक व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की कमजोरी को भी दर्शाती है। यह लेख सवाल करता है कि क्या हम सच में बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं या सिर्फ नारे गढ़कर आत्मतुष्टि पा रहे हैं?

प्रियंका सौरभ

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा हर गली-चौराहे, सरकारी इमारतों और बैनरों पर चमकता है, लेकिन यह नारा उन गाँवों और बस्तियों तक नहीं पहुँच पाता जहाँ बेटियाँ रोज़ स्कूल छोड़ रही हैं। हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि 15 से 18 वर्ष की आयु वर्ग की 39.4% लड़कियाँ स्कूल से बाहर हैं। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, यह हमारे सामाजिक ढांचे पर एक कठोर टिप्पणी है।

घर से स्कूल की दूरी, सुरक्षित परिवहन की कमी, उच्च माध्यमिक विद्यालयों का अभाव, शौचालयों की स्थिति और सामाजिक असुरक्षा – ये सारी बातें किसी शोधपत्र की विषयवस्तु नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत हैं जिनसे रोज़ हज़ारों बच्चियाँ जूझ रही हैं। और अंततः उन्हें शिक्षा से हाथ धोना पड़ता है। सरकारी आंकड़े भले ही बढ़े हुए नामांकन दिखाते हों, लेकिन हकीकत यह है कि नामांकन के बाद लड़कियाँ स्कूल तक टिक नहीं पातीं।

एक आम ग्रामीण परिदृश्य को देखें। पाँचवीं तक की स्कूल तो आसपास है, लेकिन आठवीं के बाद विद्यालय दूर है। परिवहन की कोई सुविधा नहीं। न बस, न साइकिल, न ही कोई महिला सहकर्मी या मार्गदर्शक। माता-पिता अपनी बेटी को पाँच किलोमीटर दूर अकेले भेजने से डरते हैं। उन्हें चिंता होती है कि रास्ते में कोई छेड़छाड़ न हो, कोई हादसा न हो। उस चिंता में स्कूल जाना बंद हो जाता है।

शौचालयों की बात करें तो यह सिर्फ सुविधा नहीं, आत्मसम्मान और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। किशोरावस्था में लड़कियाँ उन परिवर्तनों से गुजरती हैं, जहाँ एक स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय उनकी शिक्षा की निरंतरता तय कर सकता है। लेकिन अधिकांश सरकारी स्कूलों में या तो शौचालय हैं ही नहीं, या हैं तो गंदे, असुरक्षित, या क्षतिग्रस्त। माता-पिता के लिए यह एक और कारण बन जाता है अपनी बेटियों को स्कूल से हटाने का।

सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। जिन स्कूलों में कोई महिला शिक्षक नहीं होतीं, कोई सीसीटीवी कैमरा या गार्ड नहीं होता, वहाँ किशोर लड़कियों को भेजना आज भी माता-पिता के लिए जोखिम उठाने जैसा है। यह डर केवल अव्यवस्था से नहीं, समाज की असंवेदनशीलता से भी उपजा है। आए दिन होने वाली घटनाएं, समाचारों में आती छेड़छाड़ की खबरें इस भय को और गहरा करती हैं।

इन सबके अलावा शिक्षा को लेकर समाज की प्राथमिकताएँ भी स्पष्ट नहीं हैं। एक लड़का पढ़े तो ‘परिवार का भविष्य’ बनता है, लेकिन लड़की पढ़े तो ‘शादी की उम्र निकलने का डर’ पैदा होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह मानसिकता अब भी गहराई से मौजूद है। लड़कियों की शिक्षा को ‘लाभ’ से ज्यादा ‘खर्च’ माना जाता है।

अब यदि इन परिस्थितियों में एक बेटी स्कूल छोड़ दे, तो क्या इसमें उसकी गलती है? या यह एक सामूहिक चूक है — व्यवस्था की, समाज की, और हमारी?

इस स्थिति का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, ठोस क्रियान्वयन से होगा। सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि हर गाँव से तीन किलोमीटर के दायरे में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हो। यह बुनियादी शैक्षिक ढांचा हर बच्चे का अधिकार है।

परिवहन की सुविधा उतनी ही ज़रूरी है जितनी शिक्षक की उपस्थिति। यदि बच्चियाँ स्कूल नहीं पहुँच पाएंगी तो पढ़ेंगी कैसे? सरकार को स्कूल वैन, छात्रा साइकिल योजना या सार्वजनिक परिवहन में ‘स्कूल पास’ जैसे विकल्प सुनिश्चित करने होंगे।

हर स्कूल में स्वच्छ और उपयोगी शौचालयों की अनिवार्यता केवल ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का हिस्सा नहीं, बल्कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के सच्चे मर्म का आधार होना चाहिए। महिला कर्मचारियों की नियुक्ति, नियमित निरीक्षण और साफ-सफाई के लिए स्थानीय प्रशासन को उत्तरदायी बनाया जाए।

सुरक्षा के लिए प्रत्येक स्कूल में महिला शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ाई जाए। सुरक्षा गार्ड, सीसीटीवी कैमरा और स्कूल परिसर में अभिभावकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। यह कदम न केवल बेटियों को सुरक्षा का भरोसा देगा, बल्कि अभिभावकों को मानसिक शांति भी।

इसके साथ ही स्कूलों के भवन और अधोसंरचना को केवल औपचारिकता के लिए नहीं, गुणवत्ता के साथ विकसित किया जाना चाहिए। पुस्तकालय, कंप्यूटर कक्ष, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल का मैदान — ये सब स्कूल के मानक हिस्से होने चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण बिंदु डिजिटल शिक्षा है। महामारी ने दिखा दिया कि जिनके पास मोबाइल, इंटरनेट और बिजली नहीं, वे पढ़ाई से बाहर हो जाते हैं। ग्रामीण स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और उपकरण की उपलब्धता अब विलासिता नहीं, अनिवार्यता है।

शिक्षा विभाग को उन लड़कियों की नियमित सूची बनानी चाहिए जो स्कूल छोड़ चुकी हैं। उनके घर जाकर कारण जानना, उन्हें वापस लाने के लिए प्रेरित करना, और माता-पिता को विश्वास में लेना प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

साथ ही समाज को भी आत्मावलोकन करना होगा। हम अपनी बेटियों को क्यों पढ़ाना चाहते हैं — नौकरी के लिए, शादी के लिए या आत्मनिर्भरता के लिए? जब तक समाज का जवाब अस्पष्ट रहेगा, तब तक समाधान भी अधूरा रहेगा।

प्रशासन, समाज और परिवार को मिलकर यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि कोई भी बच्ची शिक्षा से वंचित न हो। इसका अर्थ है केवल विद्यालय खुलवाना नहीं, बल्कि उसमें बेटी के जाने और टिके रहने की पूरी ज़िम्मेदारी लेना।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अगर केवल बैनर की पंक्ति नहीं रहना है तो इसे पंचायतों, स्कूल समितियों, शिक्षक संगठनों, अभिभावकों और छात्रों के साझा प्रयास में बदलना होगा। तभी एक ऐसा समाज बनेगा, जहाँ कोई भी बेटी पढ़ाई से वंचित नहीं होगी।

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