राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया। होसबोले ने आपातकाल (1976) के दौरान इन शब्दों को जोड़े जाने को ‘राजनीतिक अवसरवाद’ और संविधान की आत्मा पर हमला बताया, जिसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आरएसएस ने कभी संविधान को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और बीजेपी का पिछला लोकसभा चुनाव अभियान भी संविधान बदलने पर केंद्रित था, जिसे जनता ने नकार दिया।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस विवाद पर बोलते हुए कहा कि संविधान की प्रस्तावना में कोई बदलाव नहीं हो सकता, क्योंकि यह संविधान की आत्मा और नींव है। उन्होंने आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्दों को ‘नासूर’ करार दिया, जो उस ‘अंधकारपूर्ण काल’ में संविधान के साथ छेड़छाड़ का परिणाम थे। धनखड़ ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की संविधान रचना में भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि ये शब्द मूल प्रस्तावना का हिस्सा नहीं थे।
विपक्ष ने धनखड़ के बयान पर भी निशाना साधा। डीएमके ने उनके पिछले बयानों को ‘अनैतिक’ बताया, जबकि कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने संयम बरतने की बात कही। यह विवाद संविधान के मूल स्वरूप और आपातकाल के इतिहास को लेकर गहरे मतभेदों को उजागर करता है








