फिर भी ईरान ने अपने को भारत का दोस्त साबित किया!

भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से सुरक्षित गुजरने की अनुमति
ईरान इजरायल युद्ध में खड़े दिखाई दिए मोदी, ख़ामेनेई की हत्या पर शोक भी व्यक्त न कर सके

 

चरण सिंह 
भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान-इजरायल अमेरिका युद्ध में इजरायल के साथ खड़े हुए दिखाई दिए हों, भले ही उन्होंने ख़ामेनेई की हत्या पर शोक व्यक्त न किया हो, भले ही वह अमेरिका के दबाव में निर्णय ले रहे हों पर ईरान ने फिर से अपने को भारत का दोस्त साबित किया है। ईरान ने भारतीय झंडे वाले तेल टैंकरों को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दे दी है। दरअसल विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बात की थी जिसके बाद यह रास्ता खुला है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समझना होगा कि इजरायल और अमेरिका भारत का कभी न हुआ है और न ही होगा। रूस और ईरान हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है और पीएम मोदी ने अमेरिका के दबाव में रूस और ईरान दोनों से अपने संबंध बिगाड़ लिए। वह भी तब जब अमेरिका लगातार भारत को अपमानित कर रहा है। नुकसान पहुंचा रहा है।
युद्ध नहीं बुद्ध की बात करने वाले मोदी ने ईरान पर हुए हमले में जिस तरह से चुप्पी साधी उससे भी दुनिया के महान लोकतांत्रिक देश भारत की छवि भी ख़राब हुई है। मोदी तो इजरायल की तकनीक भारत के गांव गांव तक पहुंचाने की बात करते रहे हैं। यह मोदी की विदेश नीति की विफलता ही है कि रूस से तेल खरीदने के लिए हमें अमेरिका से अनुमति लेनी पड़ रही है।
दरअसल पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव (ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष) के बीच ईरान ने अमेरिका, यूरोप, इजरायल और उनके सहयोगी देशों के जहाजों पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन भारतीय तेल टैंकरों (जैसे पुष्पक और परिमल) को खास छूट दी गई है। एक टैंकर तो मुंबई पोर्ट पहुंच भी चुका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। यहां से 20% ग्लोबल ऑयल गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद कई जहाज फंस गए थे, जिससे भारत में तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही थी। जयशंकर-अराघची की ये बातचीत (तीसरी कॉल पिछले दो हफ्तों में) ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बड़ा झटका बचाया। ईरान ने साफ कहा कि जो जहाज अमेरिका-इजरायल के हितों से नहीं जुड़े, उन्हें रास्ता खुला रहेगा।

दरअसल पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव (ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष) के बीच ईरान ने अमेरिका, यूरोप, इजरायल और उनके सहयोगी देशों के जहाजों पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन भारतीय तेल टैंकरों (जैसे पुष्पक और परिमल) को खास छूट दी गई है। एक टैंकर तो मुंबई पोर्ट पहुंच भी चुका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। यहां से 20% ग्लोबल ऑयल गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद कई जहाज फंस गए थे, जिससे भारत में तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही थी। दरअसल भारत और ईरान और हमारी दोस्ती बहुत पुरानी है। ईरान ने कई मामलों में भारत का खुले तौर पर समर्थन किया है। भारत और ईरान के संबंधों के प्रमाण इंडो-आर्यन संस्कृति की शुरुआत से मिलते हैं। भारत और ईरान धर्म, संस्कृति और भाषा के स्तर पर सदियों से जुड़े हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में भारत-ईरान संबंधों पर लिखा था कि “भारतीयों के जीवन और संस्कृति को दुनिया की अनेक मानव प्रजातियों और संस्कृतियों ने प्रभावित किया है।उनमें से सबसे पुराना और सबसे मज़बूत संबंध ईरानियों के साथ रहा है।
1946 में इलाहाबाद के दौरे पर आए ईरानी कल्चरल मिशन के प्रमुख ने कहा था कि ईरान के लोग और भारत के लोग भाइयों की तरह हैं, जो एक फ़ारसी जानकार के मुताबिक़ एक-दूसरे से बिछड़ गए थे। एक भाई पूरब में गया और दूसरा पश्चिम में। दोनों के परिवार अपने बारे में सब कुछ भूल गए। अगर शायद इन दोनों में कुछ कॉमन बचा है, तो वह हैं कुछ पुराने सुर, जो कभी-कभार इनकी बांसुरी से बज उठते हैं।भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को ‘फ्रेंडशिप ट्रीटी’ पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों की औपचारिक शुरुआत माना जाता है. इसमें कहा गया था कि दोनों देश शांति और दोस्ती के रास्ते पर चलेंगे। यह वह दौर था, जब विश्व अमेरिका और सोवियत यूनियन के दो ध्रुवों में बंट रहा था और भारत ने नॉन-अलाइनमेंट का रास्ता अपनाया था। 1956 में ईरान ने भारत को यह आश्वासन दिया था कि ईरान के पाकिस्तान के साथ क़रीबी रिश्ते कतई भारत के ख़िलाफ़ नहीं हैं और इससे भारत और ईरान के दोस्ताना संबंधों पर कोई असर नहीं होगा।

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