कारपोरेट शक्ति पर लोकशक्ति की विजय का वर्ष

डॉ. सुनीलम

देश के किसानों के लिए यह वर्ष ऐतिहासिक आंदोलन की सफलता का वर्ष रहा। वर्ष की शुरुआत बॉर्डरों पर किसान आंदोलन पर सरकारों के बेबुनियाद आरोपों और फ़र्ज़ी मुकदमों से हुई। बॉर्डरों पर किसानों को हमले भी झेलने पड़े। सर्दी, गर्मी, बरसात, बेमौसम आंधी तूफान का सामना भी करना पड़ा। किसान आंदोलन ने 715 किसानों की शहादत के बाद जीत हासिल की है । देश और दुनिया ने इस वर्ष कारपोरेट शक्ति पर, लोक शक्ति को विजयी होते देखा है। भारत का इतिहास सभी देशों की तरह युद्धों से भरा इतिहास है, राम- रावण के युद्ध और कौरव पांडवों के युद्ध तो धर्म ग्रंथों में अधर्म पर धर्म की जीत के तौर पर हजारों साल से दर्ज हैं। आजादी के 75 साल बाद संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में 380 दिन चले राष्ट्रव्यापी आंदोलन में महाबली केंद्र सरकार के खिलाफ किसानों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर अधर्मियों को परास्त किया है। जिसे किसान आंदोलनों में ही नहीं, दुनिया के बड़े जन आंदोलनों में स्वर्ग अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।
मुझे इस बात की खुशी है कि किसान संघर्ष समिति ने पहले दिन से आखरी दिन तक तीन किसान विरोधी कानूनों को रद्द कराने के आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी की। यदि कोरोना काल नही होता तो शायद मध्य प्रदेश के सभी जिलों में दौरा कर पाता। निजी कारणों से बॉर्डरों पर भी पूरा समय नहीं दे पाया लेकिन समय-समय पर उपस्थिति दर्ज कराता रहा। मध्य प्रदेश के अधिकांश जिलों में किसान संघर्ष समिति के साथियों ने संयुक्त किसान मोर्चा के द्वारा जारी सभी कार्यक्रमों का अक्षरशः पालन किया।
किसान आंदोलन की खासियत उसका सामूहिक नेतृत्व, निर्णय लेने की पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया, आंदोलन के स्वरूप बदलने की सटीक रणनीति तथा किसानों की चट्टानी एकजुटता रही है। वहां पंजाब में 32 किसान संगठनो ने सरकार और विपक्ष दोनों को झुकाने और किसान आंदोलन को जमीनी स्तर पर हर किसान के साथ साथ जन आंदोलन बनाने में कामयाब रहे। वहीं हरियाणा के किसानों ने मनोहर लाल खट्टर की दमनकारी और क्रूर नीतियों का डटकर मुकाबला किया। किसानों के आगे हरियाणा सरकार लाचार असहाय दिखी। हालांकि हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने ही क्षेत्र में एसडीएम को सीधे आदेश देकर किसानों के सर फुड़वाने का काम किया। 40 हजार से ज्यादा फ़र्ज़ी मुकदमें किसानों पर थोपे गए, परंतु किसानों ने हिम्मत नहीं हारी और सरकार को झुकाकर ही दम लिया।
इस वर्ष का लखीमपुर खीरी में गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के लड़के द्वारा किसानों को अपनी गाड़ी से इरादतन कुचलने का दृश्य शायद ही कभी भुलाया जा सके। सरेआम दिनदहाड़े हत्या के बाद इस घटना के जिम्मेदार गृह राज्य मंत्री का इस्तीफा ना होना यह बतलाता है कि भाजपा एक गिरोह में तब्दील हो चुकी है, जो अपने गिरोह के सदस्य को बचाने के लिए कितनी भी दूर तक जा सकती है।
किसान आंदोलन ने सोशल मीडिया की ताकत को भी साबित कर दिया। एक तरफ जहां गोदी मीडिया ने किसान आंदोलन को लगभग ब्लैक आउट किया, वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से किसान आंदोलन अपना पक्ष और मुद्दे नागरिकों तक पहुंचाने में कामयाब रहा, जिसके चलते सरकार के खिलाफ वातावरण बना। जिससे घबराकर सरकार को बिना इच्छा के किसान विरोधी कानूनों को वापस लेने को मजबूर होना पड़ा।
इस वर्ष किसान आंदोलन और देश के श्रमिक आंदोलन की एकजुटता ने राजनीति में नई संभावनाओं को जन्म दिया। अगले वर्ष यह एकजुटता सड़कों पर ताकत खड़ी कर पाई तो सरकार ने निजीकरण की जो रफ्तार पकड़ी है उसपर अंकुश लगाने में देश के श्रमिक सफल हो सकते हैं।
अगले वर्ष होने वाले 5 राज्यों के चुनाव, 2024 के आम चुनाव की रिहर्सल साबित होंगे। यदि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को परास्त करने की एकजुटता की रणनीति बनाती है तो 2024 में विपक्षी एकजुटता से काफी उम्मीद की जा सकती है।
इस वर्ष कोरोना की दूसरी लहर में लगभग देश के हर परिवार की तरह मैंने भी अपने कई साथियों को खोया है। देश के सभी नागरिकों की तरह इस वर्ष गहराई से स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों की टीस सभी ने भोगी है । परंतु घोषणाओं के अलावा स्वास्थ्य सेवाओं में साल के शुरू से अंत तक कोई ज्यादा अंतर दिखलाई नहीं पड़ रहा है । गंगा में तैरती लाशें ऑक्सीजन और वेंटिलेटर की कमी से लड़ते कोरोना के मरीजों,श्मशानों में स्थान कम पड़ जाने के बाद तो सरकारों की आंखें खुलनी चाहिए थी लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए पक्ष और विपक्ष की ओर से कोई साझा प्रयास होता नहीं देखा गया। जिसकी अपेक्षा देश का हर नागरिक पक्ष विपक्ष दोनों से ही करता है । प्राइवेट नर्सिंग होम की लूट पर कोई रोक नहीं लगी, लूट यथावत जारी रही।
भारत की न्यायपालिका आम नागरिकों के लिए आशा का केंद्र रही है। जब से नए मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने पद भार संभाला है, पूरे देश में सर्वोच्च न्यायालय से नई उम्मीदें पैदा हुई है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों की संवैधानिकता को लेकर एक साल तक सुनवाई करने की आवश्यकता नहीं समझी। ठीक उसी तरीके से धारा 370 हटाने की वैधानिकता, नागरिकों की जासूसी से जुड़े पेगासस मुद्दे तथा नागरिकता संशोधन कानून की वैधानिकता पर निर्णय देना तो दूर सर्वोच्च न्यायालय को इतने महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस तक करने के लिए समय नहीं मिला।
सरकार पूरे वर्ष हिंदू – मुस्लिम ध्रुवीकरण को बढ़ाने में व्यस्त रही। तमाम राज्यों में धर्मांतरण से जुड़े कानून पारित किए गए। मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुई और साल के जाते-जाते हरिद्वार, दिल्ली और रायपुर की धर्म संसद में सरेआम मुसलमानों का सफाया करने का तथा हिंदुओं से शस्त्र उठाने और हिन्दू राष्ट्र बनाने का आह्वान किया गया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गोली मारने से लेकर गांधी जी को महा हरामी तक कहा गया, परंतु प्रधानमंत्री तथा सरकार के प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने मुंह तक नहीं खोला। क्रिसमस के दिन और उसके पहले तमाम जगहों पर ईसाइयों के पूजा स्थलों पर हमले किए गए। इस तरह की सांप्रदायिक हमलों की घटनाओं को देखकर यह कहा जा सकता है कि आर एस एस हिंदू राष्ट्र बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। उसे सम्पूर्ण विपक्ष मिलकर ही चुनौती दे सकता है ।
प्रधानमंत्री ने इस वर्ष 8 हजार करोड़ का हवाई जहाज, 11 करोड़ की बुलेट प्रूफ गाड़ी खरीदी तथा अपने रहने के लिए सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट के नाम पर भव्य महल बनाने के लिए तेजी से काम शुरू करवा दिए हैं।
यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि देश में 74 वर्षों में सबसे ज्यादा महंगाई और बेरोजगारी बढ़ी है। होना तो यह चाहिए कि सरकार महंगाई को रोकने के लिए और अधिकतम रोजगार पैदा करने की दिशा में काम करती। लेकिन सरकार विपक्ष पर आरोप लगाने तथा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में उलझी रही।
इस वर्ष बंगाल के मतदाताओं ने मोदी- अमित शाह को जबरदस्त राजनीतिक पटकनी देकर लोकतंत्र में चुनाव के महत्व को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। उधर केरल और तमिलनाडु में भी विपक्ष की सरकार बनी है। उत्तर प्रदेश में जब यह वर्ष शुरू हुआ था, तब ऐसा लग रहा था कि योगी उत्तर प्रदेश में अपराजेय है, परंतु साल के आखिरी में यह स्पष्ट दिखने लगा कि उत्तर प्रदेश की जनता बदलाव चाहती है तथा अरबों रुपयों की विकास योजनाओं, गोदी मीडिया के अभियान और सरकारी मशीनरी के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार अपनी सत्ता बचाने में कामयाब होती नहीं दिखलाई पड़ रही है।
यह वर्ष जाते जाते देश की जनता के सामने तमाम चुनौतियां छोड़कर जा रहा है। किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती संसद द्वारा रद्द किए गए तीन कृषि कानूनों की फिर वापसी है, जिसका इशारा कृषि मंत्री कर चुके हैं। किसानों को यह भी मालूम है कि यदि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार वापस आती है तो कानून भी वापस आएंगे । किसानों के लिए अगला वर्ष एमएसपी की कानूनी गारंटी की लड़ाई लड़ने वाला वर्ष होगा। श्रमिकों को 4 श्रमिक कोड और निजीकरण के खिलाफ बड़ी गोलबन्दी करनी होगी।
संविधान और देश बचाने के लिए नागरिकों के आगे आने से ही बात बनेगी। केवल पार्टियों और सरकारों से उम्मीद करना नाकाफी होगा।

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