वाह मोदी जी, चोला गरीबी का और काम अमीरों के लिए!

आम आदमी को दो वक्त की रोटी के लाले और अमीर हो रहे मालामाल!

मुकेश अंबानी, गौतम अडानी, सावित्री जिंदल, सुनील मित्तल, शिव नाडर की 400% बढ़ी सम्पत्ति?

कोरोना काल में जब आम आदमी भुखमरी की कगार पर था तो ये पूंजीपति धन कमा रहे थे

चरण सिंह 

जो लोग पीएम मोदी को गरीब का बेटा समझते हैं। चाय बेचने वाला समझते हैं। वे लोग 2019 से 2025 तक की अपनी आय और संपत्ति देख लें। नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपतियों की आय और संपत्ति देख लें। सुनकर आंख फ़ैल जाएगी। मुकेश अंबानी की, गौतम अडानी की, सावित्री जिंदल की, सुनील मित्तल की, शिव नाडर की और उनके परिवार की सम्पत्ति इन दिनों बेतहाशा बढ़ी है। आम आदमी तो बेचारा ठगा ही गया है। आम आदमी को तो पीएम मोदी ने इमोशनल ब्लैकमेल ही किया है। अपने अमीर मित्रों को जमकर देश लुटाया अपने पर जमकर पैसा उड़ाया। जनता बेचारी को तो संकट को झेलने का प्रवचन ही देते रहे।

कभी नोटबंदी तो कभी कोरोना की मार और अब ईरान इजरायल युद्ध में जनता को कोरोना काल की तरह संकट झेलने के लिए तैयार रहने की बात कर रहे हैं। वह बात दूसरी है कि युद्ध रोकने के प्रयास की जगह युद्ध को बढ़ावा दे दिया। ईरान पर हमले से एक दिन पहले इजरायल चले गए। तो क्या मोदी को युद्ध की जानकारी नहीं होगी ? क्या मोदी युद्ध की आशंका के चलते देश में गैस और तेल की व्यवस्था नहीं कर सकते थे ? कोरोना काल में भी गरीब आदमी को शहरों से पलायन करना पड़ा था और ईरान इजरायल युद्ध में गैस की किल्लत के साथ ही रोजगार के अभाव के चलते गरीब आदमी पलायन को मजबूर हो गया है। मोदी जी अब भी बस प्रवचन दे रहे हैं। वैसे भी अब उनका पूरा ध्यान चुनाव पर है।

क्या कोरोना काल या फिर अब ईरान इजरायल युद्ध के समय मोदी ने एक अपने खर्चे और सुविधाओं पर लगने वाली धनराशि में एक पैसे की भी कटौती की ? नहीं न। किसी पूंजीपति, नेता, ब्यूरोक्रेट्स ने अपने खर्चे में एक पैसे की कटौती की ? क्या इन लोगों में से कोई थोड़ा सा भी संकट झेलने को तैयार है ? नहीं न। संकट तो बेचारे गरीब आदमी के लिए ही है। अब जब असम में विधानसभा चुनाव है तो मोदी चाय के बागान में पहुंच गए तो किसान-मजदूरों से बोलने लगे कि वह भी चाय बेचने वाला है। भाई असम के इन चाय वालों की जिंदगी भी अपनी जैसे बना दो मोदी जी।

देश का हर आदमी अपनी तरह ही गरीब बना दो। जितना पैसा आप जैसे चाय बेचने वाला पर खर्च हो रहा है उसका 100वां हिस्सा ही आम आदमी पर खर्च करा दो। काम करो अमीरों के लिए और चोला पहनो गरीब का। गरीबों को बेवकूफ बनाना अब नहीं चलेगा मोदी जी। जमीनी हकीकत तो यह है कि मुकेश अंबानी, गौतम अडानी, सावित्री जिंदल, सुनील मित्तल, शिव नाडर और इनके परिवार की कुल संपत्ति 2019 से 2025 के बीच 400% बढ़ी है।

अंबानी की संपत्ति 2019 से 2025 के बीच 153% बढ़ी, जबकि अडानी की संपत्ति में ज़बरदस्त 625% की बढ़ोतरी हुई है। भाई प्रधानमंत्री जी के मित्र तो ठहरे। सोचने की बात तो यह है कि कोरोना काल भी इन सालों में हुआ है। जब लोगों के पास रोजगार नहीं था। भुखमरी की हालत थी। लोग गांव की ओर पलायन कर रहे थे। देश में प्रधानमंत्री का कोई गरीब मित्र भी बता दो जिसकी सम्पत्ति बढ़ी हो। मतलब जब लोगों की सम्पत्ति घटी तब इन पूंजीपतियों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई।

यदि प्रधानमंत्री को देश और समाज की चिंता होती तो इन पूंजीपतियों पर थोड़े से टैक्स से ही देश का भला हो जाता। ‎अगर 2019 से 2025 के बीच मुकेश अंबानी की संपत्ति पर सिर्फ़ 2% संपत्ति कर भी वसूला गया होता,तो उससे इतने संसाधन जुट जाते कि देश के कितने गरीब छात्र फ्री में पढ़ कर कुछ बन जाते। लगभग दो साल तक सभी महिलाओं को मातृत्व अधिकार दिए जा सकते हैं।

यदि अडानी की संपत्ति पर 2% कर लगा दे तो पूरे देश के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ दो पूरे सालों तक चलाई जा सकती थीं। ख़राब हवा से सबसे ज़्यादा प्रभावित लगभग 8 करोड़ परिवारों को मुफ़्त एयर प्यूरीफ़ायर दिए जा सकते थे। सावित्री जिंदल पर इसी तरह का कर लगाने से लगभग एक दशक तक ST (अनुसूचित जनजाति) के छात्रों को प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियाँ दी जा सकती थीं। या फिर, इससे 2.5 करोड़ छात्राओं को स्कूल में उनकी पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने के लिए हर एक को ₹10,000 दिए जा सकते थे।

दरअसल सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी और ‘टैक्स द टॉप’ कैंपेन द्वारा प्रकाशित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में असमानता ऐसे स्तर पर पहुँच गई है जो बेहद भयानक है और आम आदमी के लिए अक्सर समझ से बाहर है। कौन है इसका जिम्मेदार ? अपने को चाय बेचने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री। स्थिति यह है कि भारत में सिर्फ़ 1,688 लोगों के पास ₹1,000 करोड़ या उससे ज़्यादा की कुल संपत्ति है। इनकी कुल जमा दौलत ₹166 लाख करोड़ से ज़्यादा है, जो भारत की GDP का लगभग 50% है!

पीड़ादायक तो यह है कि जन-कल्याण पर निवेश बढ़ाने के लिए कोई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। जहां सरकार बड़ी कंपनियों के टैक्स में कटौती करती है, वहीं कड़ी मेहनत करने वाले लोग बड़ी कंपनियों के मुकाबले ज़्यादा टैक्स दे रहे हैं। इसके अलावा, सरकार ने पिछले 11 सालों में पूंजीपतियों के ₹19.6 लाख करोड़ के कर्ज़ माफ़ कर दिए हैं! 2016 में हमने ‘धन कर’ के नाम पर जो कुछ भी मौजूद था, उसे भी समाप्त कर दिया गया है ।

जमीनी हकीकत यह है कि टॉप में बैठे मुट्ठी भर लोगों की दौलत लाखों-करोड़ों में बढ़ रही है। और दूसरा भारत वह है, जो कर्ज़ में डूबा है, जिसकी नौकरी पक्की नहीं है, और जो ज़्यादातर हाशिए पर पड़े तबकों से आता है और अपनी गुज़र-बसर करने के लिए संघर्ष कर रहा है। एक ओर मोदी को विश्वगुरु होने की संज्ञा दी जा रही है वहीं नोटबंदी से लेकर महामारी तक और अब LPG-कोयला संकट के चलते आम आदमी सड़कों पर कतारों में खड़ा है।

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