फिलहाल विशेषज्ञों की राय में भारतीय रुपया जल्द ही 100 के लेवल तक नहीं गिरने वाला है। दिसंबर 2025 के अंत में USD/INR रेट करीब 89-91 के आसपास है (हालिया रिकॉर्ड लो 91 के पार पहुंचा था, लेकिन कुछ रिकवरी भी दिखी)। ज्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2026 में यह 86-92 के रेंज में रह सकता है, और 100 तक पहुंचना बेस केस नहीं है – बल्कि यह तभी संभव है अगर नेगेटिव फैक्टर्स जैसे ट्रेड वॉर बढ़ना, कैपिटल आउटफ्लो जारी रहना और ऑयल प्राइस स्पाइक हो।
एक्सपर्ट्स ने बताए मुख्य कारण (रुपये की गिरावट के):
अमेरिका-भारत ट्रेड टेंशन और टैरिफ: 2025 में अमेरिका ने भारतीय एक्सपोर्ट्स पर 50% तक टैरिफ लगाए, जिससे एक्सपोर्ट कम हुए और इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस गिरा। ट्रेड डील में देरी से डॉलर की डिमांड बढ़ी।
फॉरेन इन्वेस्टर्स का आउटफ्लो: FIIs ने 2025 में भारतीय स्टॉक्स से 17-18 बिलियन डॉलर निकाले, जो रुपये पर प्रेशर डाल रहा है।
ट्रेड डेफिसिट और इंपोर्ट्स: ऑयल, गोल्ड इंपोर्ट्स बढ़े, जबकि एक्सपोर्ट्स प्रभावित। इससे डॉलर की मांग ज्यादा।
स्ट्रॉन्ग अमेरिकी डॉलर: ग्लोबल लेवल पर डॉलर मजबूत, जबकि RBI ने ज्यादा इंटरवेंशन नहीं किया (कंट्रोल्ड डेप्रिशिएशन की स्ट्रैटजी)।
कुछ एक्सपर्ट्स (जैसे सुनील सुब्रमण्यम) कहते हैं कि यह “सोची-समझी रणनीति” है – टैरिफ को काउंटर करने के लिए रुपया कमजोर रखा जा रहा, ताकि एक्सपोर्ट्स कंपटीटिव हों।
इकोनॉमी के लिए खतरे (रिस्क्स):
महंगाई बढ़ना: इंपोर्ट्स (तेल, मशीनरी) महंगे होंगे, जिससे पेट्रोल-डीजल, सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं।
विदेशी कर्ज महंगा: भारत का विदेशी डेट सर्विसिंग कॉस्ट बढ़ेगा।
विदेश यात्रा/पढ़ाई महंगी: स्टूडेंट्स और टूरिस्ट्स को ज्यादा खर्च।
इन्वेस्टमेंट प्रभावित: ज्यादा गिरावट से इन्वेस्टर सेंटिमेंट खराब हो सकता है।
लेकिन पॉजिटिव साइड: एक्सपोर्टर्स (IT, फार्मा) को फायदा, रेमिटेंस ज्यादा वैल्यू, और कुछ एक्सपर्ट्स (RBI गवर्नर सहित) कहते हैं कि यह इकोनॉमी की ग्रोथ को सपोर्ट कर रहा है – इन्फ्लेशन कंट्रोल में है और GDP ग्रोथ 6.5-7% रहने की उम्मीद।
लॉन्ग टर्म में (2030 तक) कुछ मॉडल्स 100-110 तक प्रोजेक्ट करते हैं अगर स्ट्रक्चरल इश्यूज (डेफिसिट, इन्फ्लेशन डिफरेंशियल) बने रहें, लेकिन ज्यादातर का बेस केस रिकवरी है अगर ट्रेड डील होती है और ग्लोबल डॉलर कमजोर पड़ता है।








