यूपी में बीजेपी के ब्राह्मण विधायक वाकई परेशान दिख रहे हैं, और ये बात यूं ही नहीं उठी है। हाल ही में 23 दिसंबर 2025 को लखनऊ में कुशीनगर के भाजपा विधायक पीएन पाठक (पंचानंद पाठक) के आवास पर एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें करीब 45-50 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी शामिल हुए। इसे आधिकारिक तौर पर “सहभोज” बताया गया (विधायक की पत्नी के जन्मदिन के बहाने लिट्टी-चोखा और फलाहार सर्व किया गया), लेकिन बंद कमरे में चर्चा मुख्य रूप से ब्राह्मण समाज की राजनीतिक स्थिति पर हुई।
मुख्य कारण और आंकड़े जो हैरान कर देते हैं
ब्राह्मणों की आवाज दबने की शिकायत → बैठक में चर्चा हुई कि पार्टी संगठन और सरकार में ब्राह्मणों का कद लगातार घटाया जा रहा है। ब्राह्मण डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को बनाया तो गया, लेकिन उन्हें पर्याप्त ताकत नहीं दी गई।
ठाकुरों से तुलना → यूपी में ठाकुर (क्षत्रिय) विधायकों की संख्या ब्राह्मणों से ज्यादा है, जबकि आबादी में ब्राह्मण 10-11% और ठाकुर 6-7% हैं। भाजपा के कुल 258 विधायकों में ठाकुरों की संख्या ब्राह्मणों से अधिक बताई जा रही है। कुछ दिन पहले ठाकुर विधायकों की “कुटुंब” बैठक हुई थी, जिसके बाद ब्राह्मणों ने भी अपनी एकजुटता दिखाई।
कुल ब्राह्मण विधायक → यूपी विधानसभा में कुल 52 ब्राह्मण विधायक हैं, जिनमें से 46 भाजपा के। बैठक में ज्यादातर भाजपा के ही थे, लेकिन कुछ अन्य दलों के भी शामिल हुए।
पार्टी की नाराजगी → भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी (कुर्मी समाज से) ने इसे पार्टी संविधान के खिलाफ बताया और चेतावनी दी कि जाति-आधारित ऐसी गतिविधियां अनुशासनहीनता मानी जाएंगी। कुछ भाजपा विधायकों ने भी इसकी आलोचना की। विपक्ष (खासकर सपा) इसे भाजपा में आंतरिक कलह बता रहा है और नाराज ब्राह्मणों को अपनी पार्टी में आने का न्योता दे रहा है। आयोजकों का कहना है कि ये सिर्फ सामाजिक-सांस्कृतिक चर्चा थी (जैसे बुजुर्गों की देखभाल, समाज का एकीकरण), कोई राजनीतिक मकसद नहीं। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ये जातीय गोलबंदी भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि ब्राह्मण उसका परंपरागत वोट बैंक रहा है।








