Lok Sabha Elections : क्या गिरिराज सिंह की चुनौती स्वीकार करेंगे नीतीश कुमार ?

चरण सिंह राजपूत 

क्या नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पीएम मोदी के सामने चुनाव लड़ेंगे ? फूलपुर से चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं नीतीश कुमार ? नीतीश कुमार की खिंचाई क्यों कर रहे हैं प्रशांत कुमार ? क्या इंडिया गठबंधन में पीएम पद के दावेदार बनेंगे नीतीश कुमार ? क्या नीतीश कुमार को बनाया जा रहा है इंडिया गठबंधन का संयोजक ? अब नीतीश कुमार के सुर में सुर क्यों मिला रहा है राजद ? आइये आपको बताते हैं कि नीतीश कुमार देश की राजनीति में क्या करने जा रहे हैं और उनका अब क्या वजूद रह गया है ?

भले ही नीतीश कुमार की वाराणसी की रैली रद्द कर दी गई हो पर उत्तर प्रदेश में वह कुछ बड़ा करने जा रहे हैं। नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश से लेकर झारखंड तक रैलियां करने की रणनीति बना रहे हैं। यह अपने आप में दिलचस्प है कि नीतीश कुमार विपक्ष की लामबंदी तो कर रहे हैं पर बिहार में घिर जा रहे हैं। कभी जन सुराज यात्रा के नेता प्रशांत कुमार उन्हें बिहार को ही संभालने की नसीहत दे रहे हैं तो कभी बीजेपी गिरिराज सिंह और सम्राट चौधरी उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं।

नीतीश कुमार कभी शराबबंदी पर घिर जा रहे हैं तो कभी शिक्षकों की भर्ती पर और कभी स्कूलों में जारी होने वाले छुट्टियों के कैलेंडर के मामले में। अब जब उनके उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा चल रहे हैं तो बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या नीतीश कुमार गिरिराज सिंह की यह चुनौती स्वीकार करेंगे ? क्या वह पीएम मोदी के खिलाफ ताल ठोकेंगे ? वैसे नीतीश कुमार की पीएम मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना तो बनता है क्योंकि खुद जदयू के नेता उन्हें इंडिया गठबंधन का प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं। फूलपुर से भी तो डॉ. राम मनोहर लोहिया तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ते थे। जब नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनना ही है तो फिर प्रधानमंत्री के सामने खड़े होने में दिक्कत क्या है ?

वैसे भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो हैं ही। चुनाव हार भी गए तो मुख्यमंत्री तो रहेंगे। दरअसल नीतीश कुमार की वजह से ही विपक्ष की लामबंदी हो पाई है। नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का संयोजक भी बनाये जाने की बात की जा रही है। देखने की बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी तो नीतीश कुमार को तत्कालीन भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने नीतीश कुमार के चुनाव लड़ने की बात की जा जाए तो  नीतीश कुमार के कुछ प्लस प्वाइंट हैं तो कुछ नेगेटिव प्वाइंट। इसमें दो राय नहीं कि नीतीश कुमार बेदाग चेहरा हैं। पिछड़ों में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। जेपी क्रांति से निकले नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के रास्ते पर पहुंचाया है। भूमाफिया और बदमाशों को जेल की सलाखों के पीछे भिजवाया। उन्हें सुशासन बाबू के नाम से पुकारा जाता है।इंडिया गठबंधन में भी उनका कद दूसरे नेताओं से बड़ा है।

जहां तक उनके खिलाफ निगेटिव माहौल की बात है तो नीतीश कुमार को सत्ता का लोभी माना जाता है। वह कभी बीजेपी की गोद में जा बैठते हैं तो कभी राजद की। कभी प्रधानमंत्री मोदी के गुणगान करने लगते हैं तो कभी उनको ललकार देते हैं। कभी गैर संघवाद का नारा देते हैं तो कभी एनडीए में शामिल हो जाते हैं। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहने लगते हैं कि कोई नहीं है टक्कर में तो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खिलाफ विपक्ष की लामबंदी करने लगते हैं। ऐसे में नीतीश कुमार की विश्वसनीयता पर उंगली उठना स्वाभाविक है।

नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंच चुके हैं। उनका प्रयास कि बिहार में सीटों का बंटवारा जल्द से जल्द हो। इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार ही हैं जिनकी बात न केवल अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव मानते हैं बल्कि उनका असर ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, हेमंत सोरेन, शरद पवार समेत लगभग विपक्ष के सभी नेताओं पर है।

नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश से लेकर झारखंड तक इसलिए रैली करने की योजना बना रहे है क्योंकि वह चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश के लगभग सभी प्रदेशों में वह चुनाव लड़े। जहां तक बिहार की 40 सीटों की बात है तो नीतीश कुमार 2019 के लोकसभा सीटों के हिसाब से सीटों का बंटवारा चाहते हैं। वह बात दूसरी है कि लालू प्रसाद ने उन्हें विधायकों की संख्या के आधार पर सीटें देने का मन बना लिया है। हालांकि लालू प्रसाद नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री पद के पक्ष में हैं।

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