हमें क्यों गज़ा से एकजुटता दिखानी चाहिए!

जब इजराइल बना था तभी महात्मा गांधी ने कह दिया था कि फिलीस्तीन उसी तरह अरबों का है जिस तरह इंग्लैण्ड अंग्रेजों का व फ्रांस फ्रांसीसियों का। यानी उन्होंने जेरुसलम के इलाके में इजराइल बनाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1947 में प्रस्ताव पारित कर दो मुल्क बना दिए, इजराइल तो अस्तित्व में आ गया, किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ ने फिलीस्तीन को आज तक मान्यता नहीं दी है, उसे 2012 में सिर्फ गैर-सदस्य पर्यवेक्षक का दर्जा मिला। 1948 में ’नकबा’ नामक घटना में 7 लाख फिलीस्तीनियों को खदेड़ने से लेकर पिछले तीन वर्षों में 72,000 लोगों, जिनमें ज्यादातर महिलाएं व बच्चे हैं, को मारने तक इजराइल लगातार फिलीस्तीनियों पर अत्याचार करता आ रहा है। साथ ही साथ पूरी दुनिया के यहूदियों को लाकर वहां बसाने, खासकर फिलीस्तीन की भूमि पर, जिसमें हाल ही में भारत के मिजोरम से 240 लोग गए हैं, की प्रक्रिया भी चलती रही है। 7 अक्टूबर 2023 के हमले में हमास, जो गज़ा में सरकार चलाता है, ने 250 इजराइलियों को बंधक बनाया और करीब 1200 लोगों को मारा।

बंधक सारे जिंदा या मुर्दा छोड़ दिए गए। किंतु आज की तारीख में करीब 10,000 फिलीस्तीनी इजराइली जेलों में बंद है जिन्हें फांसी की सजा देने का इजराइल ने हाल ही में कानून बना दिया है। कहा तो यह जा रहा है कि जो फिलीस्तीनी घातक हमले करने के आरोपी होंगे उनके लिए यह कानून है लेकिन यह तय है कि इसकी चपेट में कर्ह और लोग आएंगे। यह कानून नस्लवादी है क्योंकि यह यहूदियों पर लागू नहीं होगा।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 2024 के अपने फैसले में कहा कि इजराइल ने अवैध तरीके से फिलीस्तीनी भूमि पर कब्जा किया हुआ है और उसे यह कब्जा खाली करना चाहिए, जिन यहूदियों को जबरदस्ती फिलीस्तीनी भूमि पर बाहर से लाकर बसा दिया गया है उनसे जमीन खाली कराई जाए, राहत का सामान – खाना, पानी, दवाएं, आदि, की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए व फिलीस्तीनी शरणार्थियों के लिए बनी संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था के काम करने में कोई बाधा न खड़ी की जाए। कई देशों का मानना है कि इजराइल गज़ा में नरसंहार कर रहा है। 2024 में ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने इजराइल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू व रक्षा मंत्री को युद्ध अपराधी मानते हुए उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।
इजराइल ने गज़ा और वेस्ट बैंक, जो फिलीस्तीन के दो हिस्से हैं, की चारों ओर से नाकेबंदी की हुई है। गज़ा की आधे से ज्यादा जमीन पर इजरादल का कब्जा है। इजराइल हथियारों का इस्तेमाल तो बड़े पैमाने पर रोज करता ही है खाने-पीने की चीजों को भी वहां पहुंचने से रोकने के कारण गज़ा के बच्चे भुखमरी का भी शिकार हो रहे हैं। 10 अक्टूबर, 2025 को हुए युद्ध-विराम का कोई मतलब ही नहीं। उसके बाद इजराइल गज़ा में 700 से ज्यादा लोगों को हमलों में मार चुका है।

2010 में तुर्की से एक नावों के बेड़े ने गज़ा की नाकेबंदी तोड़ने की कोशिश की। मावी मारमारा नामक जहाज पर इजराइल ने हमला कर दिया जिसमें 9 सामाजिक कार्यकर्ता मारे गए। 2025 में वैश्विक सुमुद बेड़ा आयोजित किया गया जिसमें 44 देशों से 40 जहाजों पर 500 से ज्यादा कार्यकर्ता गज़ा की तरफ बढ़े। यह अंतर्राष्ट्रीय पहल गज़ा की नाकेबंदी तोड़ने के उद्देश्य से ली गई थी। इसमें जानी मानी जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाली स्वीडन की ग्रेटा थुनबर्ग और नेल्सन मण्डेला के पोते भी शामिल हुए। गज़ा पहुंचने से पहले ही इजराइल ने सभी जहाज रोककर सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और फिर अपने अपने देश वापस भेज दिया। इन कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित भी किया गया। इस वर्ष वैश्विक सुमुद बेड़े में 100 देशों से 1000 कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। स्पेन, इटली, आदि जगहों से जहाजों के बेड़े रवाना हो गए है। यह अंतर्राष्ट्रीय आयोजन फिलीस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने का एक नायाब तरीका है।

जब तक फिलीस्तीनी लड़ रहे हैं हमें उनके साथ एकजुटता दिखाना जरूरी है नहीं तो तिब्बत की तरह लोग उनके संघर्ष को भूल जाएंगे। डोनाल्ड ट्रम्प के गज़ा के लिए एक बोर्ड आॅफ पीस बना देने से, जिसका उद्देश्य हमास का निशस्त्रीकरण व गज़ा का पुनर्निर्माण है, गज़ा के अस्तित्व के लिए संकट और बढ़ गया है क्योंकि यह पूरी योजना बिना फिलीस्तीनी भागीदारी के बनाई जा रही है। अमरीका हमास के हथियार खत्म करना चाहता है, ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम खत्म करना चाहता है लेकिन इजराइल, जिसने अवैध तरीके से नाभिकीय शस्त्र बनाए हुए है पर कुछ नहीं बोलता, उल्टे उसकी और हथियारों व पैसों से मदद करता है। चाहे फिलीस्तीन हो या तिब्बत, यदि वहां के लोग आजादी चाहते हैं तो यह उनका अधिकार है और हमारा कर्तव्य है कि हम उनका साथ दें।

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