यह प्रश्न कि डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने सिख धर्म को, गंभीर विचार-विमर्श के बावजूद, अंततः क्यों स्वीकार नहीं किया, आधुनिक भारतीय बौद्धिक एवं राजनीतिक इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अम्बेडकर का धर्म-परिवर्तन केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक निर्णय नहीं था, बल्कि वह दलितों (अस्पृश्य वर्गों) के सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक मुक्ति-प्रयास का अभिन्न अंग था। येवला कांफ्रेंस में उनका ऐतिहासिक कथन—“मैं हिन्दू के रूप में जन्मा हूँ, परन्तु हिन्दू के रूप में मरूँगा नहीं”—उनकी वैचारिक यात्रा का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसके पश्चात् उन्होंने विभिन्न धर्मों—विशेषतः सिख धर्म—का गंभीर तुलनात्मक अध्ययन किया।
यद्यपि सिख धर्म अपने समतावादी सिद्धांतों के कारण एक सशक्त विकल्प के रूप में उभरा, तथापि अम्बेडकर ने अंततः बौद्ध धर्म को अपनाया। यह निबंध इस तर्क को स्थापित करता है कि सिख धर्म का अस्वीकार तीन प्रमुख कारणों पर आधारित था—(1) सामाजिक व्यवहार में जाति की निरंतरता, (2) राजनीतिक स्वायत्तता एवं अधिकार-सुरक्षा की समस्या, तथा (3) अखिल-भारतीय सामाजिक परिवर्तन के लिए उसकी सीमित उपयुक्तता।
I. धर्म के मूल्यांकन के लिए अम्बेडकर का मानदण्ड
अम्बेडकर ने धर्म को केवल आध्यात्मिक विश्वास न मानकर एक सामाजिक-नैतिक व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया। ‘जाति का विनाश’ में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी धर्म तभी सार्थक है जब वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को व्यवहारिक रूप में स्थापित करे।
उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि—
केवल सैद्धांतिक समानता पर्याप्त नहीं है;
सामाजिक संरचना में वास्तविक परिवर्तन अनिवार्य है;
जाति-व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन ही सामाजिक लोकतंत्र का आधार है।
इस प्रकार, सिख धर्म का मूल्यांकन करते समय अम्बेडकर का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या वह व्यवहारिक स्तर पर जाति का उन्मूलन कर सका है।
II. सिख धर्म के साथ अम्बेडकर का ऐतिहासिक संवाद (1935–1937)
येवला घोषणा के पश्चात् अम्बेडकर ने सिख नेतृत्व, विशेषकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के साथ गंभीर वार्ता कीं।
ये वार्ताएँ केवल धार्मिक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। अम्बेडकर ने निम्नलिखित शर्तों पर बल दिया—
सिख संस्थाओं में दलितों की समान भागीदारी
जातिगत भेदभाव का वास्तविक उन्मूलन
प्रतिनिधित्व एवं नेतृत्व में भागीदारी
राजनीतिक अधिकारों एवं संवैधानिक संरक्षण की गारंटी
इससे स्पष्ट होता है कि अम्बेडकर के लिए धर्म-परिवर्तन एक सामाजिक-राजनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया थी।
III. सिख समाज में जाति की निरंतरता
यद्यपि सिख धर्म के मूल सिद्धांत जाति-भेद का विरोध करते हैं, अम्बेडकर ने पाया कि व्यवहार में जातिगत विभाजन विद्यमान थे।
उन्होंने देखा कि—
विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग गुरुद्वारे प्रचलित थे;
सामाजिक संबंधों में उच्च और निम्न का भेद बना हुआ था;
तथाकथित “मज़हबी सिख” सामाजिक रूप से हाशिये पर थे।
अम्बेडकर के लिए यह स्थिति अस्वीकार्य थी। उनके अनुसार, किसी धर्म की प्रामाणिकता उसके सामाजिक व्यवहार से निर्धारित होती है, न कि केवल उसके सिद्धांतों से।
IV. राजनीतिक स्वायत्तता और अधिकार-सुरक्षा का प्रश्न
अम्बेडकर के चिंतन में राजनीतिक शक्ति का केंद्रीय स्थान था। उनका प्रसिद्ध कथन—“राजनीतिक शक्ति ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है”—इस तथ्य को रेखांकित करता है।
सिख धर्म में परिवर्तन के संदर्भ में उनकी प्रमुख चिंताएँ थीं—
दलितों का “अल्पसंख्यक के भीतर अल्पसंख्यक” बन जाना;
संवैधानिक संरक्षण (जैसे आरक्षण) के संभावित ह्रास की आशंका;
स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व का अभाव।
अम्बेडकर किसी भी ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकते थे, जिसमें दलितों की राजनीतिक स्वायत्तता कमजोर हो।
V. क्षेत्रीय सीमाएं और अखिल-भारतीय परिप्रेक्ष्य
सिख धर्म का प्रमुख आधार पंजाब क्षेत्र था। अम्बेडकर, इसके विपरीत, एक अखिल-भारतीय सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
उनके लिए आवश्यक था कि—
धर्म पूरे भारत में स्वीकार्य और संगठित हो;
वह विभिन्न भाषायी और सांस्कृतिक समुदायों को जोड़ सके;
वह व्यापक सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सके।
सिख धर्म की क्षेत्रीय सीमाएं इस दृष्टि से एक बाधा सिद्ध हुईं।
VI. नयी सामाजिक पहचान का प्रश्न
अम्बेडकर का उद्देश्य केवल हिन्दू धर्म से मुक्ति नहीं था, बल्कि एक नयी, सम्मानजनक और स्वायत्त पहचान का निर्माण था।
सिख धर्म को अपनाने से यह आशंका थी कि—
दलित एक स्वतंत्र समुदाय के रूप में विकसित नहीं हो पाएँगे;
वे सिख समाज के भीतर एक अधीनस्थ स्थिति में रहेंगे;
उनकी विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक पहचान कमजोर हो जाएगी।
इसलिए, अम्बेडकर के लिए धर्म-परिवर्तन का अर्थ था—स्वाभिमान और आत्मनिर्णय की स्थापना।
VII. बौद्ध धर्म की ओर अंतिम अग्रसरता
अन्ततः अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे उन्होंने एक तर्कसंगत, नैतिक और समतावादी धर्म के रूप में प्रस्तुत किया।
बुद्ध और उसका धम्म में उन्होंने बौद्ध धर्म को—
सामाजिक न्याय का आधार,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संगत,
तथा मानवतावादी मूल्यों से युक्त बताया।
बौद्ध धर्म ने उन्हें एक नवीन सामाजिक-धार्मिक ढाँचा प्रदान किया, जिसे वे दलित मुक्ति के लिए पुनर्निर्मित कर सके।







