पार्टियां क्यों कर रही हैं पुरानी और नई पेंशन की बातें ?

द न्यूज 15 

नई दिल्ली । यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र जारी कर दिये गये हैं। इसमें एक घोषणा जो काफी चर्चा में हैं वो पुरानी पेंशन की बहाली है। बता दें कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों की तरफ से अपने घोषणापत्रों में इसका उल्लेख किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि राजनीतिक पार्टियां आखिर पुरानी पेंशन योजना को लेकर इतना सक्रिय क्यों हैं? बता दें कि पिछले महीने अखिलेश यादव ने घोषणा की थी कि अगर उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनती है तो वह 2005 से पहले की “पुरानी पेंशन योजना” को बहाल करेगी। इसके छह दिन बाद ही यूपी के मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा ने अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक कर एक बयान जारी किया।सपा के बाद कांग्रेस भी कूदी मैदान में: इसमें बताया गया कि सरकारी नौकरी कर रहे लोगों के लिए “नई पेंशन योजना” अधिक फायदेमंद है। इसके अलावा सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए कहा कि सही मायने में “नई पेंशन योजना” को 2005 में मुलायम सरकार में मंजूरी मिल गई थी, लेकिन यह ठंडे बस्ते में पड़ी रही। बता दें कि सपा के अलावा कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में पुरानी पेंशन योजना के ‘समाधान’ की बात कहकर इस मामले में कूद पड़ी।

12 लाख वोटों पर नजर: बता दें कि अगर इस योजना को लागू किया भी जाता है कि इसका लाभ 2030-35 के आसपास रिटायर होने वाले लोगों को होगा। क्योंकि यह 2004 के बाद नौकरी पाने वाले लोगों पर लागू होगा। वैसे में इसका लाभ राज्य के सरकारी कर्मचारियों को भविष्य में होगा लेकिन राजनीतिक दलों को इस चुनाव में ही लाभ मिलने की संभावना है। क्योंकि उनकी नजर लगभग 12 लाख सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों पर है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में सरकारी कर्मचारियों की संख्या, खास तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में बढ़कर अब 12 लाख हो गई है। ऐसे में सभी पार्टियां का अनुमान है कि यह संख्या राज्य में मतदान को प्रभावित कर सकती हैं।
माना जा रहा है कि इस संख्या को अपने पाले में करने के लिए राजनीतिक दल पुरानी पेंशन और नई पेंशन को लेकर तमाम तरह के वादे कर रहे हैं। जिससे चुनाव में उनका पलड़ा भारी हो सके।

नई पेंशन योजना: इसे अब राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) के रूप में जाना जाता है। इसे केंद्र द्वारा 1 जनवरी, 2004 के बाद सभी नियुक्तियों के लिए पेश किया गया था। एनपीएस को पीएफआरडीए (पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण) अधिनियम, 2013 के तहत विनियमित किया जाता है। एनपीएस के जरिए सभी सरकारी कर्मचारी को एक स्थायी रिटायरमेंट खाता संख्या दिया जाता है। इसमें पेंशन फंड में अनिवार्य रूप से कर्मचारी के वेतन और महंगाई भत्ते का 10 फीसदी योगदान करना होता है। इस पैसे को फंड मैनेजर्स निवेश कर सकते हैं। नये बदलाव के बाद 2019 में योगदान का सरकारी हिस्सा 10% से बढ़ाकर 14% कर दिया गया है। कर्मचारी सेवानिवृत्ति पर कुल राशि का 60% निकाल सकता है। लेकिन सरकारी अधिकारियों द्वारा विनियमित और पंजीकृत बीमा फर्म से वार्षिकी खरीदने के लिए कम से कम 40% निवेश करना आवश्यक है। नई पेंशन स्कीम को अपनाने का अधिकार केंद्र ने राज्यों पर छोड़ दिया। वहीं मुलायम सरकार ने 2005 में ऐसा किया था। पुरानी पेंशन योजना: बता दें कि 2004 से पहले सरकारी नौकरी करने वालों को रिटायरमेंट के बाद एक पेंशन योजना का लाभ मिलता था। यह पेंशन उनकी नौकरी के दौरान बेस सैलरी पर नहीं बल्कि रिटायरमेंट के समय कर्मचारी की सैलरी पर निर्भर करती थी। पुरानी पेंशन योजना में कर्मचारी के खाते से पेंशन धनराशि की कोई कटौती नहीं होती। इसके तहत कर्मचारी के रिटायर होने के बाद पेंशन का सारा वित्तीय भार सरकार उठाती है। पुरानी और नई पेंशन योजना में मूल अंतर यह है कि एनपीएस एक योगदान-आधारित पेंशन प्रणाली है। पुरानी व्यवस्था के तहत, पेंशन को अन्य लाभों के साथ अंतिम मूल वेतन के 50% के रूप में निर्धारित किया गया था।

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