जब बम्बई के गोवालिया मैदान में 10 अगस्त को तिरंगा तिरंगा फहराया था अरुणा आसफ अली ने 

राजकुमार जैन 

 

सादर नमन अरुणा जी 

77 में जेल से छूटा तो दिल्ली गया । जार्ज फर्नांडिस और मधु लिमये का चहेता था , राजनारायण जी से खट्टा- मीठा रिश्ता आजीवन रहा , आखिरी दिनों में केवल मीठा । जार्ज और मधु जी की खुंदक हमलोंगो से निकाल लेते थे राज नारायण जी । थोड़ीदेर बोल बतिया कर असल मुद्दे पर आ जाते थे । यह समाजवादी आंदोलन का स्थायी भाव रहा । आचार्य नरेन्द्रदेव , जय प्रकाश नारायण , डॉ लोहिया , अच्युत पटवर्धन वगैरह का जमाना हम लोंगो ने देखा जरूर लेकिन आधा अधूरा और टूट कर टुकड़ों में बंटा हुआ । हम तीसरी पीढ़ी के लोग दूसरी पीढ़ी को नजदीक से केवल देख सुन ही नही रहे थे , उसे आत्मसात भी करते जा रहे थे , जाने अनजाने ।
80/ 81 की बात है । दिल्ली , बंगाली मार्केट के त्रिवेणी सभागार में पत्रकारों , साहित्यकारों और अलग अलग क्षेत्रों में काम कर रहे सक्रिय लोंगो का मजमा जुटा था । मधुजी ( स्वर्गीय मधु लिमये ) विशेष आमंत्रित थे । कहीं से नेता राज नारायण जी को पता चल गया वे भी आ गए । मधु जी बोले इसके बाद वसन्त साठे और वी यन गाडगिल जी का एलान हुआ । गाडगिल जी मंच की तरफ बढ़े इसके पहले ही नेता राजनारायण जी माइक के पास पहुंच गए – पहले में बोलूंगा फिर गाडगिल जी बोलेंगे । सब हंसने लगे। बहरहाल गोष्ठी का पहला सत्र समाप्त हुआ दूसरे सत्र का विषय प्रवर्तन करना था , श्रीमती अरुणा आसफली को । लोग चाय पी रहे थे , इतने में अरुणा जी आईं और आते ही सबसे पहले मधुजी के गले मिली , फिर बसन्त साठे और गाडगिल से हाथ मिला कर पलटी तो नेता राजनारायण जी ने अदब से नमस्कार किया । अरुणा जी राजनारायण जी के पास आ गयी , और बात चीत होने लगी । मधु जी ने हमसे कहा – हम राजकुमार जी ( प्रोफेसर राजकुमार जैन साहब ) के साथ निकल लेते है तुम आ जाना । पुरानी बातें याद आती हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं । मधु लिमये जिससे समूची संसद हिलती थी , बड़े बड़े मंत्रियों की घिघी बांध जाती थी , उसके पास अपनी कोई गाड़ी नही थी , प्रोफेसर जैन साहब अपने स्कूटर पर लिए उन्हें इधर उधर ले जाते थे ।
अरुणा जी के नाम का बुलावा आया वे अंदर चली गयी । एक नजर अरुणा जी पर ।
आज उनका जन्मदिन है । हमारी कोई शिकायत न सरकार से है , न ही इस मीडिया से कि – आजादी के दीवानों को याद करे , क्यो याद करें ? शर्मिंदा होने के लिए ? जब ये शख्सियतें जंगे आजादी में तिरंगा लिए , मात्र आत्मबल के हथियार के साथ अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ रहे थे , मर , खप रहे थे , तब ये बरतानिया हुकूमत की पालकी ढो रहे थे । जिन्हें याद करेंगे तो वे दस्तावेज भी तो खुलेंगे जो इन की साहसी कथाओं से भरा पड़ा है । नई पीढ़ी पूछेगी न , कौन हैं ये अरुणा आसफली ?
अरुणा आसफली का जन्म अविभाजित पंजाब के कालका में हुआ था । इनके पिता गांगुली होटल व्यापार से जुड़े रहे । इसी सिलसिले में अरुणा जी अपने पिता के साथ कालका से चलकर नैनी ताल आ गयी और यही उनकी शिक्षा हुई । पढ़ाई के दौरान ही अरुणा जी स्वतंत्रता आंदोलन से जा जुड़ी । 1930 , 32 और 41 में इन्हें जेल की सजा मिली । सन 42 का विश्वप्रसिद्ध आंदोलन – क्विट इंडिया और डू आर डाइ । अंग्रेजो भारत छोड़ो के प्रस्ताव के बाद ही 9 अगस्त 42 को जब पूरी कांग्रेस गिरफ्तार हो गयी तो आन्दोल का नेतृत्व कांग्रेस शोसलिस्ट ने अपने हाथ मे ले लिया । बम्बई के गोवालिया मैदान में 10 अगस्त को तिरंगा जिस बहादुर
‘ लड़की ‘ ने फहराया था ये वही अरुणा आसफ अली हैं । आजादी के बाद दिल्ली की पहली मेयर बनी अरुणा आसफ अली की शख्सियत तवारीख का चकदार हिस्सा है । आज अरुणा जी जनदिन है ।
सादर नमन अरुणा जी ।

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