कॉकरोच जनता पार्टी’ के बारे में आपकी क्या राय है?

मेरे कई मित्रों, साथियों ने मुझसे पूछा है कि आपकी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’के बारे में क्या राय है। मैं अपने बाल्यकाल ‌ से ही समाजवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाला आस्थावान‌ व्यक्ति हूं। गत 60 सालों से भी ‌‌ अधिक समय से मैं समाजवादी तहरीक के साथ‌ जुड़ा रहा हूं। रोज-बरोज‌‌‌ मेरी दृढ़ आस्था‌ समाजवादी विचार दर्शन, सिद्धांतों, नीतियों, कार्यक्रमों, ‌ मैं बढ़ती ही गई। इस दौरान एक सक्रिय राजनीति कार्यकर्ता के रूप में भी ‌ राजनीतिक गतिविधियों में मैंने भाग लिया है। एक पल के लिए भी कभी मैं सोशलिस्ट ‌ परिधि से बाहर के किसी राजनीतिक दल ‌ का सदस्य नहीं बना।

आपातकाल के बाद सोशलिस्ट पार्टी का जब जनता पार्टी में विलय हो गया तत्पश्चात में जरूर जनता पार्टी का सदस्य बना। हालांकि मैं सोशलिस्ट पार्टी के‌‌ अस्तित्व समाप्त करने का‌ पक्षधर नहीं था। मेरी मान्यता है‌ कि बिना विचारधारा, मेनिफेस्टो, ‌ और एक रात में पैदा हुए नेतृत्व ‌‌ द्वारा गठित राजनीतिक पार्टी‌ एक राजनीतिक छलावा के अलावा और कुछ नहीं हो सकती। कालांतर में कई इस प्रकार की ‌ पार्टीयों का ‌ जितना जल्दी उदय हुआ‌ उतनी ही तेजी से ‌ उसका विसर्जन भी। सत्ताधारी पार्टी की‌ नीतियों, कारनामों,‌ से‌ आजिज होकर‌,‌ तथा कहीं से भी आशा की किरण पूरी होते देखकर आवाम खासतौर से नौजवान पीढ़ी ‌ उसकी और आशा भरी दृष्टि से देखने लगती है। एक‌ वैचारिक राजनीतिक पार्टी के‌ क्रियाकलापों, ‌ उसके कार्यकर्ताओं को‌ गढ़ने में‌‌‌ लंबा वक्त लगता है, ‌ बरसों बरस के संघर्ष, शिक्षण‌ से तैयार कार्यकर्ता तमाम उम्र ‌ विचारधारा के प्रचार प्रसार में लगा रहता है,‌ हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी होते रहते हैं।

चलताऊ पार्टियां,‌ नेताओं ‌को रातों-रात खड़ा करने में सोशल मीडिया ‌ के यंत्रों की जादूई‌ भूमिका होती है। ‌ कांग्रेस, ‌ भाजपा, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट‌ पार्टियों से‌ आपका वैचारिक मतभेद हो सकता है, ‌ परंतु ‌‌ उनकी विचारधारा मेनिफेस्टो, ‌ नेतृत्व‌‌, क्रिया-कलापों ‌ से अवगत तो रहते हैं, ‌ उसकी कोई सीमा तो होती है।
आज केंद्र से लेकर राज्यों तक भाजपा का शासन जारी है। उसका एक ही मेनिफेस्टो ‌ हिंदू मुस्लिम फसाद, अलगाव‌ जारी है। आर्थिक नीतियों में ‘मुक्त व्यापार’ की उनकी नीति में चंद पूंजीपतियों ‌ के हाथों में देश की सारी संपत्ति को सौंपने, गिरवी रखने का क्रम जारी है। परंतु मत भूलिए 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहमना संगठनों ने इन 100 वर्षों में ‌ दुर्गम परिस्थितियों में,हर प्रकार के अवरोधों‌ का सामना करते हुए अपनी विचारधारा के आधार पर ‌ समर्पित कार्यकर्ताओं की लाखों लोगों की फौज खड़ी कर दी। वक्ती तौर पर‌ भले ही कुछ समय‌ के लिए, ‌ सीमित क्षेत्र में ‌ मीडिया द्वारा गठित दलों‌ का उभार दिखाई दे परंतु वह कदापि स्थाई नहीं होगा। आसन्न संकट को देखते हुए विचारधारा पर आधारित दलों‌ मैं समयबद्ध ‌ कार्यक्रम के आधार पर‌ संघर्ष और चुनावी एकता इसका हल हो सकता है। ‌
राजकुमार जैन

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