तोल मोल के बोल ….

अरुण श्रीवास्तव

घर में बड़े-बुजुर्ग अक्सर टोका करते थे खिंचाई किया करते थे और कभी-कभी तो पिटाई भी कर देते थे वो भी इस बात के लिए कि, बिना सोचे-समझे बोला क्यों? हालांकि पिटने के बाद घर में हिदायत दी जाती कि चोंच खोलने से पहले सोच लिया करो कि क्या बोलना है। हंसी मजाक में हम लोग भी अक्सर दोस्तों को सहकर्मियों पर तंज कसते हुए कहते हैं कि कुछ बोलने से पहले दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो (अगर है तो)। ये बात किसी एक व्यक्ति पर किसी एक क्षेत्र पर किसी एक जात वर्ग या समुदाय विशेष पर ही लागू नहीं होती बल्कि सबके लिए लागू होती है। यूं भी अपने समय की चर्चित फिल्म का एक संवाद है “मुंह से निकली बोली और बंदूक से निकली गोली कभी वापस नहीं आती”। बावजूद इसके कुछ क्षेत्रों में खास कर राजनीति में अक्सर मांग की जाती है और इसे मनवाने के लिए अस्त्रों-शस्त्रों की बौछार की जाती कि जो कहा गया है वह बयान वापस लिया जाए या उसे वापस लेना ही होगा। हालांकि निजी जीवन और व्यक्तिगत जीवन में चीजें एक जैसी नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिए। इसलिए यदि कोई निजी जीवन से सार्वजनिक जीवन में आता है तो उसे फूंक फूंक कर कदम रखना चाहिए।
प्रसिद्ध क्रांतिकारी रूसी नेता लेनिन की एक पुस्तक का नाम ही है ‘एक कदम आगे दो कदम पीछे’ हालांकि राइट विंग इसका मजाक उड़ाती है कि यदि इसे व्यावहारिक रूप में लागू करने लगेंगे तो अपनी मंजिल तक कभी पहुंच ही नहीं पाएंगे अब ऐसे लोगों की सोच को क्या कहा जाए। लेनिन के हिसाब से एक कदम आगे चलने से पहले दो कदम पीछे की सोचना चाहिए। शतरंज में यह बहुत ही मायने रखता है।
ताजा मामला फिल्म अभिनेत्री व मंडी संसदीय क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनकर आई कंगना राणावत का है। हाल ही में उन्होंने या यूं कहें कि आएदिन ऐसा कुछ कह देखतीं हैं कि हंसी का पात्र बन जाती हैं। बनें भी क्यों न ज्यादातर बातें बे सिर पैर की रहती है। कंगना कोई आज की ख्याति प्राप्त नहीं हैं अपने देश के ही नहीं विदेशी भी उन्हें जानते हैं। फिल्मी घराने की न होने के बाद भी उन्होंने अपना सिक्का जमाया। आम लोगों की तरह संघर्ष भी किया पर पर कसौटी उनके कहे पर है।
उनका कहा उन्हें बालक बुद्धि नहीं बैल बुद्धि की ओर इशारा करता है। बानगी के तौर पर लें तो एक ऐ़कर से बातचीत के दौरान उन्होंने कह दिया कि, देश को असली आजादी 2014 के बाद मिली है वह यही नहीं थमती एक अन्य कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश के आजाद होने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस को पीएम क्यों नहीं बनाया गया। अपनी आदत के अनुसार वो यहीं नहीं रुकतीं इसी संसद के मानसून सत्र के दौरान उन्होंने लोकसभा परिसर में एक संवाददाता से राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए कहा कि राहुल नशे की हालत में संसद में आते हैं इनकी तो इससे संबंधित जांच होनी चाहिए। अब चंद सवाल तो उठना लाजिमी वो ये कि, कंगना कह कहां रहीं हैं चुनावी सभा या रैली में कह रही हैं तो वो संसद के बाहर कह रहीं हैं। किसके बारे में कह रही हैं तो वे किसी दल या दल के नेता पर नहीं नेता प्रति पक्ष के विषय में कह रही हैं, अब क्यों कह रही हैं ये कंगना ही सही बता सकतीं हैं। लोकसभा में न तो ड्रग पर और न ही नशा मुक्ति आंदोलन पर बहस चल रही थी। फिर किसी संवाददाता ने भी तो राहुल गांधी को लेकर सवाल नहीं किया था।
हर तबके में यह बात आम होती जा रही है कि कंगना को हर एक के फटे (कहावत मात्र) में टांग अड़ाने की आदत सी पड़ गई है। जिस क्षेत्र से वे आयीं हैं वहां इस तरह की बातें सामान्य हैं पर आज़ वो फिल्म अभिनेत्री नहीं लोकसभा की माननीय सदस्य हैं मंडी संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं जनता की प्रतिनिधि भी हैं‌‌। आजकल फिल्मी दुनियां में इस तरह की बातें आरोप फिल्म को प्रमोट करने के लिए की जातीं हैं फिर फिल्मों में एक दृश्य को कई बार फिल्माने की सुविधा होती है डायलॉग में भी कांट-छांट की संभावना रहती है पर राजनीति में नहीं।

 

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