आमने-सामने दो भारत : कौन किसके साथ

प्रेम सिंह

(यह विस्तृत लेख सितंबर 2010 में लिखा गया था और ‘युवा संवाद’ के अक्तूबर 2010 अंक में प्रकाशित हुआ था। लेख देश में नवउदारवाद के 20 साल पूरा होने पर कमेंटरी है। नवउदारवाद नवसाम्राज्यवादी गुलामी की स्थिति है, जिसे भारत के शासक-वर्ग ने स्वीकार किया हुआ है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी के तहत उसने अपनी सत्ता और वैभव के लिए मेहनतकश जनता के जीवन और राष्ट्रीय संसाधनों को दांव पर लगाया हुआ है।  इसके चलते विषमता की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे सही-सही मापा नहीं जा सकता। न ही उसकी जरूरत समझी जाती है। बल्कि, बेहिचक तर्क दिया जाता है कि आर्थिक विषमता जितना बढ़ेगी, अर्थ-व्यवस्था उतनी ही मजबूत होगी।     

2021 में नवउदारवाद के 30 साल पूरे हो चुकने पर यह लेख फिर से जारी किया गया था। उन 30 सालों में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 7 साल शामिल थे, जो अब 11 साल हो चुके हैं। नवउदारवाद ही वह आधार है जिस पर खड़े होकर नरेंद्र मोदी और आरएसएस धड़ल्ले से ‘हिंदू-राष्ट्र’ का अभियान चला रहे हैं। मोदी जैसा प्रचार-तंत्र अभी तक किसी प्रधानमंत्री का नहीं रहा है।  उन्हें एक अतिरिक्त सुविधा भी बनी हुई है। वे जो-जो कहते-करते हैं, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी विरोध के नाम पर उसका बढ़-चढ़ कर प्रचार करते हैं। इस खाद-पानी के बल पर मोदी चर्चा और सत्ता के केंद्र में बने रहते हैं।

पिछले महीने मैंने ‘नवउदारवादियों की जीत के साढ़े तीन दशक’ लेख का पहला भाग साझा किया था। दूसरा भाग साझा करने से पहले यह लेख नए पाठकों के लिए पृष्ठभूमि के तौर पर पढ़ने और विचार करने के लिए एक बार फिर यथावत जारी कर रहा हूं। चाहें तो पुराने पाठक भी सरसरी निगाह डाल कर अपनी स्मृति ताजा कर सकते हैं।)    

पहला चक्र : नवउदारवादियों के हाथ

 

पिछले बीस सालों में एक चक्र पूरा हो चुका है। जल, जंगल, जमीन, खदान और अन्य संसाधनों की जम कर लूट हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में असंख्य लोग जमीन और घरों से विस्थापित हो चुके हैं। लाखों किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। लाखों जमीन का मुआवजा खाकर खाली बैठ गए हैं। लाखों जमीन बचाने के संघर्ष में लाठी-गोली खा रहे हैं। आदिवासियों का किसानों से बुरा हाल है। प्रशासकों और सुरक्षा बलों ने उनका जीना हराम कर दिया है। उनके अपने नेता और अफसर भी शासक वर्ग में शामिल होने के बाद उनके लिए पराए हो जाते हैं। नागरिक समाज के कुछ सरोकारधर्मी व्यक्ति और संगठन उनकी हिमायत में संघर्षरत न रहें तो आदिवासियों का जीवन गुलाम से बदतर हो जाए। जंगल से उजाड़े जाने वाले बहुत-से आदिवासी माओवादियों की हिंसक क्रांति के सिपाही बन गए हैं। इधर किसानों की आवाज आई है कि जमीन इसी तरह छीनी जाती रही तो वे भी नक्सलवादी बनेंगे। विस्थापन का कहर गांवों पर ही टूटता रहा है। लेकिन इस बीच दो पुराने शहर टिहरी और हरसूद भी बड़े बांधों की डूब में आ चुके हैं।

 

इस सब तबाही के बाद बेरोजगारी, मंहगाई, अपराध, उग्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्याएं बढ़ी ही नहीं, बेकाबू हो चुकी हैं। शिक्षा और इलाज गरीबों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। बाढ़, सूखा, भूकंप, भूस्खलन, तूफान जैसी आपदाओं का कहर जब-तब टूटता रहता है। इस मौसम में उतराखंड में लगातार बारिश होने, बादल फटने और जगह-जगह भूस्खलन होने से अनेक सड़कें और इमारतें नष्ट हो गईं। टिहरी बांध से पानी छोड़े जाने से उसके आस-पास के करीब 25 गांव डूब में आ गए। अतिवृष्टि से पहाड़ और तलहटी के गावों और शहरों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। सभी जानते हैं कि ये आपदाएं महज प्राकृतिक नहीं हैं। विकास की अंधाधुंधी ने पर्यावरण को गहरे संकट में डाल दिया है। पिछले 20 सालों में पर्यावरण संरक्षण के कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गई हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की नवउदारवादियों की चिंता अभी तक दिखावे की है।

 

पिछले 20 सालों में भारत की धरती का ही नहीं, लोगों का तापमान भी बढ़ा है। जरा-जरा-सी बात पर दिमाग गरम हो जाता है। जब बाहर भूगोल बदलता है तो मनुष्य के अंतर पर भी उसका असर आता है। पिछले 20 सालों का एक हासिल यह भी है कि भारत के लोग सतही, नकलची और झगड़ालू प्रवृति के होते जा रहे हैं। एक जगह किशन पटनायक ने लिखा है, इस बात का विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि उपभोक्तावादी हैसियत वाले मनुष्य सुखी भी होते हैं। पूंजीवादी उपभोक्तावाद में गरीबों का मरना तो होता ही है, अमीरों का मिजाज भी ठिकाने नहीं रहता। सरकारों द्वारा गरीबी की झूठी-सच्ची रेखा खींची जाती है। लेकिन इस व्यवस्था में अमीरी की कोई रेखा नहीं है। सबको उत्तरोत्तर अमीर होते जाना है। बिना यह सोचे कि वैसा एक बड़ी आबादी की कीमत पर होता है। देशों की सरकारों से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक यह व्यवस्था देखी जा सकती है, जिसके निर्धारण में विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की, और सुचारू संचालन में सैन्य व खुफिया प्रतिष्ठानों की केंद्रीय भूमिका होती है। जो लोकतंत्र आजकल दुनिया में चलता है, इन्हीं के हवाले होता है। तानाशाही शासन तो होता ही है। 

 

दरअसल, निरंतर अमीरी की जद्दोजहद में जीने वाले लोग हमेशा गरीब ही बने रहते हैं। परंपरागत अभिव्यक्ति में इसे‘निन्यानवे का फेर’ कहा गया है। अलबत्ता अब निन्यानवे और सौ का आंकड़ा किसी गिनती में नहीं है। अबके आंकड़ों का घनत्व वंचितों की ही नहीं, अच्छे-अच्छे समझदारों की समझ से परे होता है। लाखों-करोड़ों में वस्तुओं की बिक्री के बाजार का हवाला तो मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ में भी आया है, लेकिन बिलियंस और ट्रिलियंस में बताए जाने वाले आज के बाजार के आंकड़ों से दिमाग चकरा जाता है। यह सचमुच बहुत ऊंचे लोगों का खेल है। विकासशील ही नहीं, विकसित देशों के नेता और प्रशासक शायद ही इस खेल को पूरा समझ पाते हैं? जहां अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री गेंद पकड़ाने वाले हों, वहां नवउदारवाद के समर्थक टिप्पणीकारों को अपनी हैसियत अपने ही गिरेबां में झांक कर देख लेनी चाहिए। 

 

हमें अपने आधुनिकतावादी-प्रगतिवादी मित्रों से हमेशा डर लगा रहता है कि वे कब नुक्ता निकाल देंगे कि ‘अमीरों की गरीबी’ का जिक्र करके हम यथास्थितिवाद का पोषण, यथार्थ समस्या का दार्शनिकीकरण अथवा आध्यात्मिकरण कर रहे हैं। क्योंकि वे दोनों पूंजीवाद को मानव सभ्यता के विकास में क्रांतिकारी चरण मानते हैं, जिसमें पहला और अंतिम सद्गुण (वर्चू) अमीर होना है। हम स्पष्ट कर दें कि इस व्यवस्था में अमीर भी गरीब बना रह जाता है, यह हम गरीबों की गरीबी की पीड़ा को कम आंकने के लिए नहीं कह रहे हैं। इसलिए कह रहे हैं कि निरंतर अमीरी की जद्दोजहद गरीबों की यातना को निरंतर बढ़ाती जाती है। अमीर अमीरी के लिए जो भी कीमत चुकाते हों, अमीरी गरीबों की कीमत पर ही संभव होती है। यह देशों के स्तर पर भी होता है और देशों के अंतर्गत इलाकों व नागरिकों के स्तर पर भी। (हालांकि भारत जैसे देश में चरम दरिद्रता में जीने वाले असंख्य स्त्री-पुरुष-बच्चों को वास्तविक अर्थ में नागरिक कहा ही नहीं जा सकता।) यह होना तभी तय हो गया था जब उत्पादन के पूंजीवादी साधनों-संसाधनों  के अंधाधुंध दोहन से जुड़ी पूंजी और टेकनोलाजी के बल पर सामंतवादी-पूंजीवादी दौर के सेठ-साहूकारों जैसा जीवन स्तर सबको उपलब्ध कराने वाले ‘वैज्ञानिक’ समाजवाद की घोषणा की गई थी।

 

बहरहाल, उदारीकरण के चलते भारतीय जीवन के हर क्षेत्र और आयाम में तेजी से बदलाव आया है। आर्थिक नीतियों और फिर राजनीति के पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों का मातहत हो जाने के बाद सभी संस्थाओं, सिद्धांतों, मूल्यों, मान्यताओं आदि पर उसका प्रभाव आना लाजिमी है। उस प्रभाव की अनेक अभिव्यक्तियां हैं – अमीरी के बढ़े-चढ़े प्रदर्शन से लेकर भूख, कुपोषण, मौत, आत्महत्या आदि के मंजर तक। विशाल आबादी को उनके जमीन, जंगल, धंधों और घरों से बेदखल कर देश को ‘महाशक्ति’ बनाने के अनुष्ठान में दो भारत आमने-सामने खड़े हो गए हैं। अमीर भारत मुख्यधारा राजनीति की अनेक पार्टियों का इकलौता नौनिहाल है और गरीब भारत का हालचाल नागरिक समाज के सरोकारों से उपजी सही अर्थों में जनांदोलनधर्मी राजनीति पूछती है।

 

20 साल के बाद भारत की मुख्यधारा राजनीति का रास्ता साफ नजर आता है, जिस पर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी प्रधानमंत्री के पद की दावेदारी में दौड़ लगा रहे हैं। दोनों तरफ शाबाशी देने वालों की कमी नहीं है। जो कुछ पिछड़े और दलित नेता दांव लगने की फिराक में थे, उनका चर्चा अब कहीं नहीं है। नकली आभिजात्य असली के मुकाबले कब तक ठहरेगा? यूपी का ब्राह्मण  कांग्रेस और भाजपा की लगातार हार से अपने स्वार्थ के लिए मायावती कि पैर भले पड़ गया हो, सभी जानते हैं वह उसे सिर पर नहीं बिठा सकता। कोई माकूल जवाब मुख्यधारा राजनीति का नहीं बन पाया है।

 

यह भी हो सकता था कि मुख्यधारा राजनीति की पार्टियों के आपसी और एक पार्टी के भीतरी टकरावों से नई सूरत बनती नजर आती। सिंगूर और नंदीग्राम के मुद्दों पर ममता बनर्जी को जनता और नागरिक समाज का जैसा व्यापक जनसमर्थन मिला, उसके बल पर मुख्यधारा राजनीति कुछ न कुछ गरीब भारतोन्मुखी हो सकती थी। हमने ऐसी आशा व्यक्त भी की थी। लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि वे मुख्यधारा राजनीति की ही एक उभरती खिलाड़ी हैं।

 

पिछले 20 सालों में दोनों (गरीब और अमीर भारत) के बीच जम कर संघर्ष भी हुआ है, जो जारी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पहले चक्र की बाजी नवउदारवादियों के हाथ रही है। उनका दावा ज्यों का त्यों बना हुआ है कि देश आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बन रहा है। उनके इस दावे को निर्णायक चुनौती नहीं मिली है। देश के सामान्य बौद्धिक अभिजन की परोक्ष-अपरोक्ष सहमति और हिस्सेदारी तो ‘महाशक्ति भारत’ के निर्माण में है ही, इस ‘महान उद्यम’ की कामयाबी में कई नवउदारवाद विरोधी रहे जनांदोलनकारी और बुदिजीवी शामिल हो गए हैं। उनके तर्क अजीब और चौंकाने वाले हैं।

 

जनांदोलनों का गतिरोध

 

हालांकि बनाव अस्सी के दशक से बन रहा था, वैश्वीकरण की शुरुआत औपचारिक और निर्णायक रूप से 20 साल पहले हुई। शुरुआत के दो-तीन साल के भीतर संविधान और समाज के लिए उसका आपदायी रूप सामने आ गया। तभी से एक समझदारी यह बनना शुरू हुई कि नई आर्थिक नीतियों से तबाह होने वाली जनता के विविध समूहों की प्रतिरोधी संघर्ष चेतना से मुख्यधारा राजनीति के बरक्स वैकल्पिक राजनीति खड़ी होनी चाहिए – विचारधारा के स्तर पर भी और राजनैतिक संस्कृति के स्तर भी। माना गया कि अलग-अलग मुदों को लेकर उठने वाले आंदोलनों के कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज के सरोकारधर्मी सदस्यों और पूंजीवादी साम्राज्यवाद के विरोधी बुद्धिजीवियों को देश की जनता के साथ साझा और समझदारी बना कर यह उद्यम करना है। यानी स्थानीय स्तर पर होने वाले जनांदोलनों को मिला कर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक जनांदोलन छेड़ना है। अपनी जमीन पर खड़े होकर दुनिया के स्तर पर चलने वाले प्रतिरोध आंदोलनों से संबंध बना कर उसे और व्यापक बनाना है। किशन पटनायक ने सबसे पहले यह विचार जनांदोलनकारियों के सम्मुख रखा और उस दिशा में प्रयास  किया। इस प्रकिया को जनांदोलनधर्मी राजनीति को राजनीतिधर्मी जनांदोलन में बदलना कह सकते हैं। 

 

लेकिन बीस साल का एक चक्र पूरा होने के बाद देखने में आ रहा है कि प्रतिरोध की जिस चेतना को विकल्प का आधार बनना था, वह मुख्यधारा राजनीति का चबैना बन रही है। आजकल नेताओं में किसानों और आदिवासियों में फूटने वाले आक्रोश की फसल काटने की होड़ लगी है। जहां किसान और आदिवासी अपनी जमीन और जंगल के लिए आंदोलन करते हैं, वहां राजनीतिक पार्टियों के नेता अपनी राजनीति करने पहुंच जाते हैं। बिना इस लिहाज के कि केंद्र अथवा राज्य में अपनी सरकार होने पर वे किसानों और आदिवासियों के साथ वही सुलूक करते हैं जिसका अन्य पार्टी के शासन में विरोध करने पहुंचे हैं। जो जनांदोलनकारी उनके हितों के पक्ष में पिछले 20 सालों से डट कर काम कर रहे हैं, उनका महत्व और भूमिका नेताओं के पहुंचने से नगण्य हो जाती है।   

 

आंदोलन के स्फूर्त नेताओं और जनांदोलनकारियों पर बाजी मारने के लिए इन नेताओं को कुछ खास नहीं करना होता। उन्हें घटनास्थल पर पहुंचना भर होता है। नेताओं के आने की खबर से मीडिया वहां पहले से पहुंचा होता है। बड़े नेता मीडिया का इंतजाम करके पहुंचते हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी कहीं पहुंच जाएं तो शो लाइव हो जाता है और दूरदर्शन पर कई दिनों तक चलता है। जल्दी से जल्दी पूरे ऐशोआराम से पहुंचने के साधनों की कोई कमी नहीं रहती है। उद्योगपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुखों की तरह नेताओं के पास धन की कोई कमी नहीं है। वे अपने चारों तरफ धनवानों की बाड़ खड़ी करके रखते हैं। अक्सर वे हवाई जहाज से और फिर नित नए मॉडल की कारों के काफिले से पहुंचते हैं। वह पिछड़ा जमाना अब नहीं रहा कि नेताओं के पहुंचने के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं को टिकट के पैसों का इंतजाम करना होता था।

 

नेताओं की धनाढ्यता पर सवाल उठाना अब अच्छा नहीं माना जाता। इसके पीछे कई तरह की धारणाएं काम करती हैं। एक तो यही कि आर्थिक महाशक्ति बनने वाले देश में किसी भी मामले में कमखर्ची का कोई काम नहीं होना चाहिए। लोगों के दिमाग में एक धारणा यह भी बिठाई गई है कि जो नेता या पार्टी साधनहीन है, वह जनता का क्या कल्याण करेगी?  नए नेता पहले अपना पेट भरेंगे, इससे अच्छा है पुरानों को ही बने रहने दिया जाए! नेताओं और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों द्वारा इस तरह की जनधारणा बनाने के पीछे एक गहरा मंतव्य होता है – बड़े नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश को लूटते हैं तो उनके नीचे भी आशा बंधती है। देश के बुदिजीवी और कलाकार तक आशा की उस डोर से बंधे चलते हैं – लूट का यह कारोबार चलेगा तो वेतन, भत्ते, पेंशन, अनुदान, पुरस्कार आदि बढ़ेंगे। जब से विदेशी कंपनियां कला से लेकर शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी छिटकने लगी हैं, उनकी आशा बलवती हो गई है। एक तरह से भारत में पूंजीवाद के नाम पर लूटपाट का राज चल रहा है।

 

किसानों-आदिवासियों के पास पहुंचने के पीछे किसी पार्टी अथवा नेता का दांव राज्य की सत्ता है, किसी का केंद्र की। केंद्र की सत्ता पर कांग्रेस का दावा मजबूत है क्योंकि उसके पक्ष में जनांदोलनकारी और बुद्धिजीवी हैं। इस स्थिति से राहुल गांधी को प्रोमोट करने वाली कमेटी काफी उत्साहित है। वरना कुछ साल पहले, जब वह राहुल गांधी के ‘रोड शो’  कराती थी, सोनिया गांधी नाराज और निराश दिखने लगी थीं। युवराज की लोकप्रियता बढ़ती नहीं थी, भद जरूर पिटती थी। लिहाजा, कमेटी को कसा गया था। यूपीए-दो में गाड़ी चल निकली है। और चलती का नाम ही गाड़ी होता है। हमें लगता है सोनिया के सलाहकार जनांदोलनकारी, भले ही परोक्ष रूप से, राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की सलाह भी कुछ न कुछ देते होंगे। आज नहीं तो कल जरूर देंगे। 

 

नेताओं का आंदोलनरत किसानों अथवा आदिवासियों के पास पहुंचना लोगों की नजर में एक बड़ी बात बना दी गई है। नेता जनता के पास जाएं, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? लेकिन समस्या यह है कि सत्ता के लिए होने वाले इस संघर्ष में यह सच्चाई ओझल हो जाती है कि यह पूरी राजनीति जिस विचारधारा और व्यवस्था की वाहक है, उसमें किसानों और आदिवासियों को बरबाद होते जाना है। वही स्थिति छोटे उद्यमियों, व्यापारियों, दुकानदारों और कारीगरों की है। इस संदर्भ में औपनिवेशिक काल से चला आ रहा भूमि अधिग्रहण कानून 1894, पिछले बीस सालों में बने खदान, वाणिज्य-व्यापार, पेटेंट और बीज संबंधी कानून देखे जा सकते हैं।    

 

मुआवजे से नहीं बचेंगे किसान

 

जब तक इतनी बड़ी आबादी का वजूद है और देश में लोकतंत्र है, किसानों-आदिवासियों के हित-साधन के दावे सरकारें करती रहेंगी। आदिवासी क्षेत्र में नक्सलवाद जब खतरे के निशान से ऊपर बढ़ता है, तब भी सरकारें राहत देने की बात करती हैं। जंगल अधिकार कानून ऐसा ही एक कदम था। हालांकि राहत के साथ उनका जोर दमनचक्र चलाने पर रहता है। जनहित के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन को सस्ते दामों पर अधिग्रहित करने का विरोध पिछले बीस सालों से देश के विभिन्न इलाकों में हो रहा है। विरोध में किसानों के साथ कई जनांदोलनकारी समूह और व्यक्ति शामिल होते हैं, जिन्होंने समय-समय पर आयोजित जनसुवाइयों, धरना-प्रदर्शनों, चर्चाओं, परचों, पुस्तिकाओं आदि के माध्यम से सरकारों पर दबाव बनाने की कोशिश की है कि वह भूमि अधिग्रहण कानून को तुरंत बदले तथा जमीन और घर से बेदखल होने वाले लोगों का समुचित पुनर्वास करे। इसी संघर्ष से विकास की प्रचलित अवधारणा और उस पर आधारित मॉडल के विकल्प का विमर्श भी निकला।

 

लेकिन सरकारों को विकल्प की बात सुनना गवारा नहीं है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर माकपा-भाकपा तक सभी पार्टियां प्रचलित विकास को लेकर एकमत हैं। बाकी पार्टियां उनका अनुगमन करती हैं। यह भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की त्रासदी है कि जिस पिछड़े, दलित, आदिवासी उभार में नई राजनीति की संभावनाएं अंतर्भूत थीं, वह उसी राजनीति से पराभूत है, जिसके विरोध में उसका उभार हुआ। बहरहाल, विकल्प की बात दिगर, प्रचलित विकास के अंतर्गत भी किसानों को राहत देने के बजाय सरकारों ने सेज कानून देश की छाती पर थोप दिया। साथ ही तरह-तरह की विशाल परियोजनाओं और हबों के लिए किसानों की जमीन का अधिग्रहण और तेजी से कर निजी कंपनियों के सुपुर्द कर रही हैं। पहले बड़े बांधों के लिए गांव उजाड़े जाते थे, अब मेगा सिटी, एक्सप्रेस हाईवे, हवाई अड्डे, एजुकेशन सिटी आदि बनाने के लिए गांवों को उजाड़ा जा रहा है। देश में कई जगह परमाणु संयंत्र लगने हैं, उनके लिए भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण की सरकारों की मुहिम के परिणामस्वरूप किसानों का असंतोष तेजी से बढ़ा है। पूरे देश में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन हो रहे हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने के लिए सरकारें पुलिस बल का इस्तेमाल करती हैं। कई आंदोलनकर्ता किसान पुलिस की गोलियों से मारे जा चुके हैं।  

 

असंतोष से निपटने के लिए सरकार भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक और पुनर्वास और पुनर्गठन विधेयक लाई है। लेकिन उनसे किसानों को उनकी मेहनत और उपज का सही दाम न देकर, जमीन का दाम दिए जाने की नवउदारवादी नीति बदलने नहीं जा रही है। अगर ऐसा होता तो सरकारें इस कानून को ही निरस्त करतीं और नया कानून बना कर सुनिश्चित करतीं कि किसानों को उनकी जमीन से किसी भी सूरत में बेदखल नहीं किया जाएगा। कम हो या ज्यादा, एकमुश्त मिले या किश्तों में, किसान मुआवजे से बचने वाले नहीं हैं। ज्यादातर किसान मुआवजे से एक पीढ़ी का भी पोषण और हीला सुनिश्चित नहीं कर पाते। संशोधन विधेयक से जमीनों का अधिग्रहण नहीं रुकने वाला है। मुआवजे की नीति में कुछ फेर बदल हो सकता है।

 

आजकल मुआवजे के हरियाणा मॉडल की तारीफ की जा रही है, जिसके तहत किसानों को 30 साल तक प्रति एकड़ 15000 रुपए सालाना दिए जाएंगे। मायावती ने आगे बढ़ कर यह राशि 20000 रुपए कर दी है। पिछले साल महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश के साथ हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए थे। चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को नरेंद्र मोदी के बाद एक और ‘विकास पुरुष’ के दर्शन हुए। पहले सोनिया गांधी और उसके बाद मनमोहन सिंह ने हरियाणा जाकर मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पूरमपूर विकास पुरुष बताया। दोनों की ठवन यह थी, देखो, हमारे पास भी भाजपा की टक्कर का एक विकास पुरुष है। ये वही भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं जिन्हें 2005 के चुनाव में भजनलाल की जीत के साथ बटमारी करके हाईकमान ने मुख्यमंत्री बनाया था। मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं था, जैसा कि कुछ चुनाव विश्लेषक साथियों ने उस समय कहा था और राहत की सांस ली थी कि अब हरियाणा से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। भ्रष्टाचार की कथा हुड्डा के शासनकाल में भी वैसी ही अनंत रही है, जैसी भजनलाल के समय में थी। हरियाणा में दबी जबान में लोग हुड्डा को प्रॉपर्टी डीलर मुख्यमंत्री कहते हैं!

 

असली कारण था,‘बूढ़ा’ भजनलाल सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह के सपनों का विकास उनकी इच्छित तेजी और आदेश के साथ नहीं कर सकता था। सोनिया गांधी ने जो उन्हें हरियाणा के विकास के लिए सौ में से सौ नंबर दिए, वह उनकी कसौटी से सही है। हुड्डा ने अपने शासनकाल में हरियाणा के उस विकास की गति को सर्वाधिक तेजी के साथ बढ़ाया है, जो बंसीलाल के ‘सूरजकुंड-बढ़खल लेक’ काल में शुरू हुई थी।

 

 

हरियाणा के विकास की हकीकत न तब छिपी सच्चाई थी, न आज है। हरियाणा के विकास का मायना रहा है, उसे दिल्ली के नवढनाढ्य तबके के आराम, अय्याशी और आय का पिछवाड़ा बनाना। हरियाणा की सभी सरकारें यह करती रही हैं। प्रतिरोध भी हुआ है। लेकिन राजनीति और विकास की वैकल्पिक परिकल्पना न होने के चलते बदलाव नहीं हो पाता। हरियाणा को ‘शराब का ठेका’ बना देने के विरोध में हरियाणा की कमेरी महिलाओं ने एक बार जबरदस्त आंदोलन किया था। लोगों को याद होगा उस आंदोलन की फसल बंसीलाल ने काटी थी। कुछ समय हरियाणा में शराबबंदी लागू भी रही। लेकिन बूढ़ा बंसीलाल अपनी ही लगाई लत के जाल में फंस कर रह गया। शराबबंदी हटी ही नहीं, आने वाले सालों में पूरे हरियाणा में उसका अभूतपूर्व विस्तार हुआ।   

 

हुड्डा की खासियत यह है कि उसने हरियाणा को दिल्ली के, और इस बीच बने खुद हरियाणा के अमीरों की चारागाह बनाने में निर्णायक और सफल भूमिका निभाई है। हरियाणा के सभी सीमांतों तक हुड्डा की ‘विकास-लीला’ का विस्तार देखा जा सकता है। हुड्डा की खूबी रही है कि मुख्यधारा मीडिया समेत ‘दि हिंदू’ जैसे अखबार ने भी उनके ‘विकास कार्यों’ का जम कर प्रचार किया है। हुड्डा के विकास कार्यों की तारीफ के पुल बांधते वक्त सोनिया गांधी ने कहा कि हुड्डा के नेतृत्व में शिक्षा के क्षेत्र में हरियाणा में ‘परिघटनात्कम’ (फेनोमेनल) विकास हुआ है। जाहिर है, उनका आशय सोनीपत के पास कोंडली में बन रहे राजीव गांधी एजुकेशन सिटी और चंडीगढ़ में बन रहे राजीव गांधी टेक्नोलोजी पार्क जैसी योजनाओं से है।

 

हम यहां आपको केवल राजीव गांधी एजुकेशन सिटी की थोड़ी हकीकत बताते हैं। इस बड़ी परियोजना में 6 गांवों (ऐतिहासिक गांव बड़खालसा, असावरपुर, फिरोजपुर खादर, पतला, सेवली, ओरंगाबाद) की जमीन ली गई है। परियोजना के बारे में पूछना तो छोड़िये, जमीन का अधिग्रहण करने के बारे में किसानों से नहीं पूछा गया। सीधे अधिसूचना जारी कर दी गई। किसानों ने एक संघर्ष समिति बना कर विरोध किया और अदालत गए। सरकारों के हाथ में किसानों के शोषण का हथियार बने उपनिवेशवादी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के चलते अदालत ने पहली सुनवाई में ही केस खारिज कर दिया। मुआवजा सरकारी दर पर 16 लाख रुपए प्रति एकड़ तय किया गया, जबकि जीटी रोड के दोनों तरफ होने के चलते ज़मीन का बाज़ार भाव करोड़ों रुपए प्रति एकड़ था। हार कर करीब 70 प्रतिशत किसानों ने घोषित मुआवजा उठा लिया है। लंबे समय से चौतरफा उपभोक्तावादी माहौल से घिरे और भ्रष्ट राजनीति के चंगुल में फंसे हरियाणा के किसानों को रिझाना, पटाना या फोड़ना सरकारों के लिए आसान रहा है।

 

किसान समझ नहीं पाते हैं कि जैसे आज जमीनें ली जा रही हैं, चाहे सरकारों द्वारा या प्राइवेट बिल्डिरों द्वारा, वैसे ही कल गांव भी लिए जाएंगे! अंग्रेजों के आने से पहले क्या कल्पना की जा सकती थी कि हजारों सालों से रहने वाले आदिवासियों को उनके जंगलों से ही नहीं, घरों से भी उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा? हरियाणा में चंडीगढ़ का उदहारण है, जिसे बसाने के लिए 24 गांव और उनके 9000 वाशिंदे उठाए गए थे। अब यह सूचना आसानी से मिलती भी नहीं है। न यह कि उन गांववासियों ने कड़ा विरोध किया था। लेकिन सीधे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ होने के चलते उनकी एक नहीं सुनी गई।

 

बहरहाल, राजीव गांधी एजुकेशन सिटी किसानों को उजाड़ कर अमीरजादों को भारत में ही वह शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए बनाया जा रहा है जिसे बाहर जाकर प्राप्त करना अब खतरनाक होता जा रहा है। दावा वही घिसा-पिटा है जिसे नवउदारवादी अक्सर दोहराते रहते हैं – विश्व स्तरीय संस्थानों और यूनिवर्सिटियों की स्थापना करके विश्व स्तरीय उच्च शिक्षा और शोध की सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। कहने की जरूरत नहीं कि विश्व स्तरीय के नाम पर दी जाने वाली मुख्यतः आईटी, मैनेजमेंट, इंजीनियरी और एप्लाइड विज्ञानों की यह शिक्षा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कुशल मजदूर तैयार करने के लिए होती है। छात्रों के व्यक्तित्व के समग्र विकास और राष्ट्र-निर्माण के लिए नहीं।

 

बताया गया है कि 5 हजार करोड़ सालाना टर्नओवर वाले व्यापार घराने ही एजुकेशन सिटी में अपने संस्थान खोल सकते हैं। थापर यूनिवर्सिटी, मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर रिसर्च एंड एजुकेशन, फोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट तथा बिरला स्कूल आफ मैनेजमेंट टेक्नोलोजी ने एजुकेशन सिटी में जगह ली है। उनकी तारीफ में यह भी बताया गया है कि इन सबका विदेशी यूनिवर्सिटियों अथवा उद्योगों से संबंध है। यह भी बताया गया है कि विदेशों से भी छात्र यहां शिक्षा लेने आएंगे। मजेदारी यह है कि सरकार ने शिक्षा देने वाले ‘सेठों’ से ‘नो प्रोफिट नो लौस’ के आधार पर शिक्षा देने को कहा है! हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) द्वारा बनाए जा रहे शिक्षा के इस नगर में होटल, मल्टीप्लैक्स, शॉपिंग आरकेड, फूड कोर्ट, साप्ताहिक बाजार और झील आदि होंगे।

 

राजीव गांधी एजुकेशन सिटी की संकल्पना और निर्माण में हरियाणा के एक भी शिक्षा से जुड़े व्यक्ति की भूमिका नहीं रही है। सारा काम विदेशी संस्थाओं के मुताबिक नौकरशाह कर रहे हैं। एजुकेशन सिटी में रिहाइश, बिजनेस और मनोरंजन की भी समस्त सुविधाएं उपलब्ध होंगी, नहीं होंगे तो बस किसान, जिनका खात्मा करना इस विकास और उसे अंजाम देने वाले विकास पुरुषों का पहला काम है। उनका हरियाणा में कोई प्रतिरोध नहीं करता। हरियाणा में प्रतिरोध के नाम पर बचा रह जाता है दिल्ली में कंडक्टरी, सिपाहीगीरी, मास्टरी करते हुए हेंकड़ी जताना और दलितों पर हमला और बेटियों की हत्या करना! हालांकि, प्रतिरोध का एक और रूप पिछले साल सामने आया। हरियाणा जैसे ‘खाते-पीते’ राज्य में नक्सलवादियों की मौजूदगी से बहुतों को हैरानी हुई। पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया। हरियाणा पुलिस की ‘लाठी’ के बारे में कौन नहीं जानता! आने वाले समय में इस लाठी की गाज मौजूदा विकास और उसे अंजाम देने वाली राजनीति का शांतिपूर्ण विरोध करने वालों पर ज्यादा तेजी से गिरेगी। 

 

विधानसभा चुनाव के कुछ दिनों पहले हमारे मित्र दौलतराम चौधरी ने ‘ट्रिब्यून’ अखबार में एक लेख लिख कर चिंता जाहिर की कि दिल्ली में हरियाणा की कोई वैसी अलग पहचान नहीं बनती, जैसी अन्य राज्यों से आकर बसने वाले समाज की बनती है। एक वक्त उन्होंने ‘पींग’ पत्र निकाल कर हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान उभारने की कोशिश की थी। उनका वह प्रयास सतत नहीं रह पाया। इस बीच चौधरी साहब लोकदल, हरियाणा विकास पार्टी-भाजपा गठबंधन से होते हुए कांग्रेस को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। सवाल है कि जब हरियाणा में ही हरियाणा की पहचान नहीं बचती है, तो दिल्ली में कहां से बचेगी? तब तो और भी कठिन होगा जब हरियाणा के बुद्धिजीवी दिल्ली या हरियाणा में सरकारों के साथ हो जाएंगे। पूंजीवादी विकास का यही तो संकल्प है कि कोई भी स्थानीय पहचान नहीं बचने देनी है – दुनिया में देशों की और देशों के अंदर प्रांतों-इलाकों की। विकास के तहत देश के बाकी राज्य भी हरियाणा की नियति को प्राप्त होते जा रहे हैं।    

 

किसानों में कई कमियां और कमजोरियां हैं, जिनसे उन्हें उबरना चाहिए। दलित-विरोध और स्त्री-विरोध उनमें प्रमुख है। हालांकि, ये कमजोरियां भारत के नौकरीपेशा और व्यवसाय करने वाले मध्यवर्ग में भी हैं और उच्च वर्ग में भी, जो अधिकांशतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनते हैं। मध्य और उच्च वर्ग के लोग उन कमजोरियों के साथ अपना हित-साधन कर लेते हैं। लेकिन किसान नहीं कर सकता, क्योंकि पूंजीवाद के साथ मीजान बैठाने में वह मध्य और उच्च वर्गों जैसा सक्षम नहीं है कि दकियानूसी संस्कार और पूंजीवादी उपभोक्तावाद की मिश्रित मानसिकता के साथ जीवन काट ले। वह केवल लुम्पेन बन कर रह जाता है।

 

वास्तविकता में पूंजीवाद का फायदा उसे मध्य और उच्च वर्गों की तरह मिल ही नहीं सकता है। भारत के मध्य और उच्च वर्ग की (उदर) पूर्ति का ही अंत नजर नहीं आता तो उन किसानों और आदिवासियों की बारी कब आएगी जिन्हें उनकी जमीन और घरों से विस्थापित किया जा रहा है? शासक-वर्ग द्वारा फैलाया गया यह भ्रम अथवा अंधविश्वास है कि प्रचलित विकास से किसानों और आदिवासियों का विकास भी होगा। उपनिवेशवादी दौर से नवसाम्राज्यवादी दौर तक की सच्चाई यही है कि आधुनिक पूंजीवादी विकास ने किसानों और आदिवासियों को अपनी जगह से विस्थापित और जगह पर विकृत किया है। जबकि कमियों के मुकाबले उनके गुण बहुत ज्यादा हैं, जो समाजवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े काम के हैं।       

 

आओ रानी हम ढोयेंगे …

 

पिछली बार हमने खुशवंत सिंह के बारे में चर्चा की थी। अंग्रेजी में उन जैसे और भी कई मौजमस्तीबाज पत्रकार हैं जिनकी नाल हमेशा शासक-वर्ग के साथ जुड़ी होती है। उनकी नकल कुछ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के पत्रकार भी करते हैं। हालांकि वह भोंडी नकल होती है। (हिंदी व भारतीय भाषाओं का स्वतंत्र स्वभाव जाते-जाते जाएगा।) कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे पत्रकार और बुद्धिजीवी बार-बारी से कांग्रेस-भाजपा के साथ होते रहते हैं। हालांकि कहते हमेशा यह हैं कि उनका राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है। मनमोहन सिंह की शान में कसीदे पढ़ने वाले खुशवंत सिंह अडवाणी का गुणगान भी बखूबी कर चुके हैं। जब पिछड़े और दलित नेताओं का नवउदारवाद के साथ सीधा और स्थायी संबंध कायम हो जाएगा, यानी वे केंद्र में सरकार बनाने की हैसियत में आ जाएंगे, तो ये सब उनके साथ हो जाएंगे। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों ने इतनी घुसपैठ बना ली है कि आने वाले लंबे समय के लिए केंद्र में नवउदारवादी नीतियों का अनुगामी नेतृत्व ही सरकार चलाएगा। इस भवितव्य को देख कर ही ज्यादातर दलित और पिछड़े बुद्धिजीवी नवउदारवाद के भक्त बन गए हैं! भले ही वे यह नहीं समझते कि उस व्यवस्था में भी उनका शूद्रत्व स्थायी रहने वाला है। वैसे तो नवउदारवादी नीतियों के विरोधी नेतृत्व की सरकार बनना बड़ा मुश्किल होगा, अगर नवउदारवादी नीतियों से तबाह जनता के दबाव में किसी झटके में बन जाती है तो देश के पत्रकार और बुद्धिजीवी ही उसे नहीं चलने देंगे।

 

अभी तक के इतिहास में कांग्रेस नवउदारवादी नीतियों की योग्यतम वाहक है। इसीलिए ज्यादातर पत्रकार और बुद्धिजीवी उसके साथ होते हैं। कांग्रेस का समर्थन धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर किया जाता है। उनमें कुछ धर्मनिरपेक्षता के प्रति उत्साह में इतना ऊंचे निकल जाते हैं कि धर्म की उदारवादी धारा को भी सांप्रदायिकता के खाते में डाल देते हैं। हम आपको यह बता चुके हैं कि सोनिया के ये सेकुलर सिपाही दरअसल प्रछन्न नवउदारवादी होते हैं। उनका ‘भाजपा आ जाएगी’ का भय दरअसल कांग्रेस चली जाएगी का भय होता है। वरना देश का विभाजन स्वीकार करने से लेकर सिख विरोधी दंगों में पिछले 25 सालों में एक भी व्यक्ति को सजा न होने की सच्चाई वे अच्छी तरह से जानते हैं।

 

श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की अभूतपूर्व जीत ‘हिंदू जीत’ थी, जिसमें आरएसएस ने सकिय भूमिका निभाई थी। भाजपा उस तरह की जीत शायद ही कभी दर्ज कर पाए। गुजरात में निर्दोष मुसलमान नागरिकों के कत्लेआम पर सोनिया के सेकुलर सिपाहियों ने दिल्ली में धरना और सभाएं कीं, लेकिन जब यहां ‘बड़ा पेड़ गिरने पर धरती हिली थी’ तो वे अपने घरों में दुबके बैठे थे। गुजरात के कत्लेआम पर तत्काल बहुत-सी कविताएं लिखी गईं, प्रदर्शनियां आयोजित की गईं, लेकिन सिखों का कत्लेआम धर्मनिरपेक्ष कलाकारों के लिए वैसे सरोकार का विषय नहीं बना। तह में जाकर देखें तो पता चलता है मार्क्सवादियों से लेकर आधुनिकतावादियों तक बुद्धिजीवियों की यह टेक है कि मुसलमानों को कांग्रेस के साथ जोड़े रखना है। सफदर हाशमी की एक छुटभैये कांग्रेसी नेता ने हत्या कर दी थी। उनकी याद में बनी ‘सहमत’ संस्था शुरू से कांग्रेसी पैसे पर पलती है। विभाजन से 84 के दंगों तक कांग्रेसी राज दंगों और अन्य तरह से अल्पसंख्यकों के साथ क्या सुलूक करता रहा है, उसकी रपटें भी मौजूद हैं।

 

शुरू से ही इनका अड्डा कांग्रेसी सरपरस्ती में उच्च शिक्षण, अध्ययन और शोध की सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं में जमता है। कोई भी कांगेसी ‘नृप’ होने पर उन्हें कोई ‘हानि’ नहीं होती। इधर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक साथ कई नए विधेयक/कानून के आने के साथ जहां कुछ पुराने बुद्धिजीवियों में नया जोश आया है, वहीं सारी गुणवत्ता विदेशी विश्वविद्यालयों में देखने वाली एक नई ब्रीड भी सामने आई है। पूंजी में पगी यह ब्रीड आज कांग्रेस के साथ है, कल कोई भी भाजपाई नृप होने में हानि नहीं मानेगी।

 

नवउदारवादी नीतियों के वाहक की योग्यता-सूची में भाजपा दूसरे नंबर पर आती है। इसीलिए केंद्र में सता की दावेदारी में भी उसका दूसरा नंबर लगा हुआ है। एक बार छह साल के लिए वह गठबंधन सरकार चला भी चुकी है। भाजपा के पास अपने पत्रकार और बुद्धिजीवी हैं। लेकिन धर्मनिरपेक्ष खेमे में भी ऐसे बहुत हैं, जो मौका पड़ते ही भाजपा में उदार धारा खोज लेते हैं। पहले उसका प्रतिनिधित्व अडवाणी के बरक्स वाजपेयी करते थे, अब मोदी के बरक्स अडवाणी करते हैं। अडवाणी अदूरदर्शिता के चलते प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। उन्होंने अपनी छवि ‘लौह पुरुष’ की बनाई, जबकि जमाना ‘विकास पुरुष’ होने का है। किसी भी विकास पुरुष को लौह पुरुष तो पत्रकार और बुद्धिजीवी बना ही देते हैं। विकास पुरुष मोदी के प्रशंसक अंदरखाने लौहपुरुष मोदी के भी भक्त होते हैं। वे मोदी के मुसलमानों के साथ ‘वैज्ञानिक’ सख्ती से निपटने का लोहा मानते हैं।

 

कहने का आशय यह है कि देश में नवउदारवाद की पैठ चौतरफा गहरी होती जा रही है। कई जनांदोलनकारियों के कांग्रेस की गोद में जा गिरने से जनांदोलनधर्मी राजनीति का पक्ष और कमजोर हुआ है। ऐसे संगीन समय में नवउदारवाद विरोध की एक-एक सच्ची आवाज बेशकीमती है। दूर भविष्य की आशा उन्हीं आवाजों से बनती है। हमारे साथी अरुण त्रिपाठी वैसी ही एक आवाज रहे हैं। लेकिन इधर उनका स्वर बदला है। गांधी, लोहिया, जेपी, भगत सिंह और 1857 के क्रांतिकारियों पर गंभीरतापूर्वक और प्रतिबद्धता के साथ विचार और चर्चा करने वाले त्रिपाठी जी अचानक राहुल गांधी के पैरोकार बन गए हैं। ‘हिंदुस्तान’ अखबार में राहुल गांधी के समर्थन में जो लेख उन्होंने लिखा है, वह हैरान करने वाला है। वह न उनके विचारों से मेल खाता है, न लिखने की शैली से।

 

अगर राहुल गांधी प्रकाश करात से बड़े वामपंथी हैं, वह भी नीचे से वामपंथ लाने वाले, और कांग्रेस में नवउदारवाद के बरक्स एक सशक्त वामपंथी धारा बह रही है, तो फिर वामपंथ की चर्चा और समीक्षा को भारत में विराम दे देना चाहिए। अगर लोगों की नहीं, वोटों की, और दुनिया के स्तर पर व्याप्त कुछ-कुछ पर्यावरण की चिंता से कुछ देर के लिए एक कंपनी का काम रोक दिए जाने पर कांग्रेस में प्रचलित विकास के बरक्स वैकल्पिक विकास की धारा (मनमोहन सिंह बनाम सोनिया गांधी) प्रवाहित हो गई है, तो वैकल्पिक विकास के विमर्श और संघर्ष को भी बंद कर देना चाहिए।

 

शासक वर्ग की यही मंशा है कि चित और पट दोनों उसकी मानी जाएं। वह मारने का हक़ रखता है, और पूरा मारने के लिए पुचकारने का। अपने इस अधिकार पर वह बुद्धिजीवियों की स्वीकृति चाहता है। शासक-वर्ग को बुद्धिजीवियों की स्वीकृति मिलती है, तो उसकी ताकत बढ़ती है क्योंकि बुद्धिजीवी जनता में भी स्वीकृति दिलवाते हैं। साथ ही इससे उन्हें (बुद्धिजीवियों को) खुद ताकत का अहसास होता है कि वे जनता के साथ  जुड़े हैं। नागार्जुन ने एक कविता में इसे इस तरह कहा है : ‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी/ यही हुई है राय जवाहरलाल की’।

 

त्रिपाठी जी का मन नहीं मानता कि राहुल गांधी नाटक कर रहे हैं । अगर प्रेमचंद या शेक्सपीयर की तरह इस दुनिया को ही ‘रंगमंच’ न मान लिया जाए, तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि राहुल गांधी नाटक कर रहे हैं। उनका वही काम है, वे कर रहे हैं। वे ज्यादा से ज्यादा उस कमिटी के ‘पात्र’ कहे जा सकते हैं, जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया है।

 

दरअसलसमस्या राहुल गांधी के नहींखुद त्रिपाठी जी के साथ है। वे अपने लेख में एक प्रतिपक्ष रचते हैं जो सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस को ठीक से समझ नहीं रहा है और उस प्रतिपक्ष को ध्वस्त करके अपनी समझदारी के ठीक होने के प्रति आश्वस्त होना चाहते हैं। वह प्रतिपक्ष वामपंथियों (मार्क्सवादी और समाजवादी – दोनों) और विकल्पवादियों का है। जाहिर हैवह उनकी एक छद्म निर्मिती है। भारत के लोकतंत्र पर परिवारवाद, वंशवादजातिवादसंप्रदायवाद और इधर पिछले 20 सालों से नवसाम्राज्यवाद का दबाव है। इतने दबावों के चलते यह होता रहता है कि निहायत राजनीतिक निरक्षर व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री बन जाते हैं। राजीव गांधी बन सकते हैं तो राहुल गांधी भी बन जाएंगे। लेकिन उससे वामपंथ और विकल्प का संघर्ष बुरा और पराजित नहीं हो जाएगा।

 

गोपियां उद्धव से कहती हैं : ‘ऊधो मन नाहिं दस-बीस/एक हुतो सो गयो स्याम संग को आराधै ईश’। जो मन समता और स्वतंत्रता के मूल्यों में रमा हैउसे कम से कम नवउदारवाद के खुले खेल में समाजवाद दिखाई नहीं दे सकता। मुक्तिबोध के शब्दों में बुद्धि का भाल फोड़ कर’ ही नवउदारवाद में समाजवाद का दर्शन’ हो सकता है। हकीकत यही है कि राहुल गांधी नियामगिरि के आदिवासियों के नहींनवउदारवाद के सच्चे सिपाही हैं। आदिवासियों के होते तो अब तक वे सारे कानूनआदेशसमझौतेप्रस्तावविधेयक वापस ले लिए जाते जिनके द्वारा किसानों और आदिवासियों का जमीन और जंगल का हक ही नहींजीवन का हक भी छीन लिया गया है। जीवन के सारे आयामों को नवउदारवाद के शिकंजे में ले लेने वाले इन कानूनों और नीतियों के परिणाम गरीब भारत के लिए अगले 20 सालों में बीते पहले 20 सालों के मुकाबले ज्यादा विनाशकारी होंगे। यह देखना रोचक होगा कि दो भारतों की आमने-सामने की टक्कर के अगले चक्र में कौन किसके और कितना साथ होगा?

 

सितंबर 2010

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