देवी कश्यप को श्रद्धांजलि 

देवी कश्यप 33 वर्ष आयु की एक घरेलू रसोइया थीं। वह अपनी आजीविका चलाने के लिए लखनऊ के मध्यमवर्गीय इलाके इंदिरा नगर में लोगों के घरों में खाना पकाने का काम करती थीं। वह अपने 13 वर्षीय बेटे अभिषेक, जो कक्षा सात का विद्यार्थी था, के साथ अपने पति से अलग रहती थीं। अत्यंत स्वतंत्र स्वभाव की होने के कारण बेटे के जन्म के बाद उनका अपने पति के साथ तालमेल नहीं रहा। उन्होंने एक बार फिर पति के साथ रहने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रयास भी सफल नहीं हुआ। उनके पति माल ढोने वाला रिक्शा चलाते थे और अंततः देवी से संबंध तोड़कर दूसरी महिला से विवाह करने का फैसला कर लिया। देवी किराए के मकान में रहती थीं।
जब लखनऊ विकास प्राधिकरण ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के अंतर्गत आवास योजना की घोषणा की, तो देवी ने इसके लिए आवेदन करने का निर्णय लिया। आवेदन ऑनलाइन भरा गया और उन्होंने 10,000 रुपये पंजीकरण शुल्क जमा किया।
इसी बीच लखनऊ के अकबर नगर की एक बस्ती को ध्वस्त किया जाना था और उपर्युक्त योजना के अंतर्गत बनाए गए मकान विस्थापित लोगों को प्राथमिकता के आधार पर कुछ रियायतों के साथ दिए गए। शेष मकानों के लिए लॉटरी निकाली गई और देवी भाग्यशाली रहीं कि उनका नाम चयनित सूची में आ गया। अब उन्हें आवंटन राशि के रूप में 50,000 रुपये जमा करने थे और अगले पांच वर्षों तक हर महीने 8,308 रुपये की किस्त देनी थी। कुल 4,19,550 रुपये का भुगतान पूरा होने के बाद ही उन्हें मकान मिलना था। सरकार की ओर से 2,50,000 रुपये की सब्सिडी दी जा रही थी। मकान की कुल कीमत 7,29,550 रुपये थी। देवी महीने में लगभग 10,000 से 15,000 रुपये कमाती थीं, यह इस बात पर निर्भर करता था कि वह कितने घरों में खाना पकाती हैं। वह हर महीने 7,000 रुपये किराया देती थीं। कोई बचत न होने के कारण उनके लिए 50,000 रुपये की आवंटन राशि और अगले पांच वर्षों तक मासिक किस्तें देना लगभग असंभव था। यदि उन्हें आवंटित मकान का कब्जा मिल जाता, तो उन्हें उम्मीद थी कि मौजूदा किराए का खर्च बच जाएगा और उस रकम से मासिक किस्त चुकाना संभव हो सकेगा।
उन्होंने ल.वि.प्रा. द्वारा आवंटियों के लिए आयोजित ऋण मेले में भाग लिया। उनके अपने बैंक ने वेतन पर्ची या आयकर रिटर्न प्रस्तुत किए बिना उन्हें ऋण देने से इनकार कर दिया। अब असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कितने लोगों – विशेषकर घरेलू कामगारों, रिक्शा चालकों या दिहाड़ी मजदूरों – के पास ऐसे दस्तावेज होने की संभावना है? उन्होंने लखनऊ मंडल के आयुक्त से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें लखनऊ में लीड बैंक के प्रबंधक से मिलने का निर्देश दिया। इस प्रबंधक ने उनके बैंक के प्रबंधक से बात की। इसके बाद वह उस शाखा के प्रबंधक के पास वापस गईं, जिसमें उनका खाता था। प्रबंधक ने एक बार फिर दिशा-निर्देशों को देखा और निष्कर्ष निकाला कि अधिकतम संभव अवधि में ऋण चुकाने का अवसर दिए जाने पर भी वह ऋण की अदायगी करने की स्थिति में नहीं थीं। वह इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि आखिर यह सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत बना मकान है, जिसे गिरवी रखा जा सकता है। यह समझ से परे था कि यदि देवी जैसे लोगों को ऋण नहीं मिल सकता, तो ल.वि.प्रा. ने अपने परिसर में ऋण मेला आयोजित ही क्यों किया? और यदि बैंक से ऋण उन्हीं लोगों को मिलने वाला था जिनके पास वेतन पर्ची या आयकर रिटर्न है, तो क्या वे वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी में आते हैं?
देवी ने फिर आयुक्त से मुलाकात की। उन्होंने कृपापूर्वक ल.वि.प्रा. के उपाध्यक्ष से यह सुनिश्चित करने को कहा कि देवी को ऋण और मकान दोनों मिलें। ल.वि.प्रा. के उपाध्यक्ष ने देवी के पक्ष में निर्णय लिया कि यदि वह मकान की कीमत का एक-चैथाई हिस्सा जमा कर देती हैं, तो उन्हें मकान का कब्जा दिया जा सकता है। इससे उनके लिए किस्तें चुकाना आसान हो जाता, क्योंकि तब उन्हें मौजूदा किराया नहीं देना पड़ता। अब मकान पर कब्जा पाने के लिए उन्हें 1.6 लाख रुपये की आवश्यकता थी। ल.वि.प्रा. के उपाध्यक्ष ने ल.वि.प्रा. के परिसर से संचालित बैंक के प्रबंधक से कहा कि देवी को यह राशि ऋण के रूप में उपलब्ध कराई जाए। बैंक प्रबंधक ने कागजी कार्रवाई शुरू कर दी।
देवी सुबह घरों में खाना पकातीं और उसके बाद सीधे ल.वि.प्रा. और बैंक कार्यालय चली जातीं, ताकि कागजी कार्रवाई पूरी कर सकें। फिर वह शाम का खाना पकाने के लिए वापस उन घरों में जातीं। कई दिनों तक उन्हें अपना दोपहर का भोजन भी छोड़ना पड़ा। कभी-कभी उनका कक्षा सात में पढ़ने वाला बेटा भी उनके साथ जाता था। जब ऋण स्वीकृत हुआ, तभी बैंक प्रबंधक का तबादला वाराणसी हो गया। नए प्रबंधक को कार्यभार संभालने में समय लगा। प्रभारी प्रबंधक ऋण की राशि जारी करने का निर्णय नहीं ले रहे थे।
लगातार भागदौड़ का देवी कश्यप के स्वास्थ्य पर गम्भीर असर पड़ा। कुछ महीने लोगों के घरों में खाना पकाने के बजाय सड़क के एक चैराहे पर चाट का ठेला लगाने का उनका असफल प्रयास पहले ही उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर चुका था। उनका हीमोग्लोबिन गिरकर 6 ग्राम प्रति डेसीलीटर रह गया, जबकि न्यूनतम वांछनीय स्तर 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर है। उन्हें लगभग दस दिनों के लिए हजरतगंज स्थित सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्हें तीन बोतल खून चढ़ाया गया और कुछ दवाएं दी गईं। वह एक महीने से काम नहीं कर पाई थीं, इसलिए उन्हें ऐसे आवास में जाना पड़ा जहां उदार मकान मालिक ने उन्हें मुफ्त में रहने की अनुमति दी।
ऐसा प्रतीत होता है कि अस्पताल में रहने के दौरान चढ़ाए गए खून या किसी दवा के कारण उनके शरीर में कोई प्रतिक्रिया हुई, जिसके चलते अस्पताल से छुट्टी मिलने के तीन दिन बाद ही उन्हें फिर उसी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अगल दिन ही उनकी स्थिति बिगड़ी और सिविल अस्पताल के चिकित्सकों ने उन्हें किंग जार्ज चिकिम्सा विश्वविद्यालय के चिकित्सालय ले जाने की संस्तुति की। एम्बुलेंस में सिविल अस्पताल से बड़े अस्पताल जाते समय उनकी मौत हो गई।
घर हासिल करने की उनकी उम्मीद उनकी मृत्यु के साथ ही खत्म हो गई। केवल इसलिए कि वह बहु प्रचारित प्रधानमंत्री आवास योजना के आवास के लिए 1.6 लाख रुपये का ऋण हासिल नहीं कर सकीं। यदि उनके जैसे असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को इस योजना के तहत घर के लिए ऋण नहीं मिल सकता तो आखिर ये आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आवास योजना किसके लिए है? वास्तविक गरीबों के लिए यह आवास अत्यधिक महंगे हो गए हैं। पिछली सरकार में वर्तमान योजना से बीस गुना कम कीमत में आवास हासिल किया जा सकता था।  मनमोहन सिंह सरकार के समय शहरी गरीबों के लिए बेसिक सर्विसेज फॉर अर्बन पुअर योजना के अंतर्गत एक मकान की कीमत 20,000 रुपये से भी कम थी। मायावती सरकार के समय गरीबों को कांशीराम योजना के तहत मुफ्त मकान मिले।
मोदी सरकार के समय गरीब की परिभाषा बदल गई है। अब गरीबी की सीमा बहुत ऊपर हो गई है। सबसे गरीब लोग उसी तरह बाहर रह गए हैं जैसे दलित जाति व्यवस्था से बाहर रह गए थे। उनकी श्रेणी का कोई नाम नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे जाति व्यवस्था में बहिष्कृत लोगों की कोई श्रेणी का नाम नहीं था। उनमें से कुछ लोगों के पास अब आधार कार्ड के लिए आवश्यक जन्म संबंधी दस्तावेज तक नहीं हैं, जिसके बिना किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ उठाना असंभव है।
देवी कश्यप ने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई और अपना घर हासिल नहीं कर सकीं क्योंकि उनका नाम सुभाष चंद्रा, विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी या ललित मोदी नहीं था।
 – संदीप पांडेय
  • Related Posts

    यूजीसी एक्ट खिलाफ चल रहे सवर्ण समाज के आंदोलन के यूपी में तेज होने पर दिखेगा योगी का असली चेहरा!

    चरण सिंह  यूजीसी के नियमों में बदलाव होने…

    Continue reading
    नाकारा है 80 प्रतिशत लोगों में डर पैदा करने वाली सत्ता!

    हिन्दू-मुस्लिम के अलावा कुछ नहीं है बीजेपी के…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    यूपी में मानी गई पंचायत सहायकों की बात, मिलेंगे 9000 रुपए महीना, वापस होंगे मुकदमे 

    यूपी में मानी गई पंचायत सहायकों की बात, मिलेंगे 9000 रुपए महीना, वापस होंगे मुकदमे 

    200 करोड़ से ज्यादा कमा चुकी ‘हनुमान अंश’ को कभी OTT से मिला था रिजेक्शन, अब कतार में लगे 3 प्लेटफॉर्म

    200 करोड़ से ज्यादा कमा चुकी ‘हनुमान अंश’ को कभी OTT से मिला था रिजेक्शन, अब कतार में लगे 3 प्लेटफॉर्म

    भारत ने पाकिस्तान के अधिकारी को किया तलब, नौसेना यूनिट से टक्कर पर कड़ा रुख

    भारत ने पाकिस्तान के अधिकारी को किया तलब, नौसेना यूनिट से टक्कर पर कड़ा रुख

    सहारनपुर में नकली सिक्कों के बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़… 20 रुपये के 6400 नकली सिक्के बरामद!

    सहारनपुर में नकली सिक्कों के बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़… 20 रुपये के 6400 नकली सिक्के बरामद!

    CJP Protest : हाई पावर्ड कमेटी में बदलाव नहीं, SC बोला- ‘आरोप कल्पना पर आधारित’

    CJP Protest : हाई पावर्ड कमेटी में बदलाव नहीं, SC बोला- ‘आरोप कल्पना पर आधारित’

    घरेलू गैस के बाद अब यूपीआई ट्रांजैक्शन पर केंद्र सरकार का डाका?

    घरेलू गैस के बाद अब यूपीआई ट्रांजैक्शन पर केंद्र सरकार का डाका?