“ट्रांसफर फाइलें धूल फांक रही हैं : सरकार की मंशा सवालों के घेरे में”

(“शिक्षक इंतज़ार में, सरकार इनकार में: क्या ट्रांसफर सिर्फ चुनावी औजार है?”, “शिक्षक ट्रांसफर नीति: मंशा है या महज दिखावा?”, “नीति, नीयत और नजरअंदाजी: हरियाणा में शिक्षक बनाम सिस्टम”)

 

हरियाणा में शिक्षक ट्रांसफर नीति वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है, जबकि सरकार ने CET परीक्षा मात्र एक महीने में आयोजित करवा दी — फॉर्म से लेकर परिणाम तक। यह विरोधाभास दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता में शिक्षक नहीं, राजनीति है। हर बार कैबिनेट मीटिंग और पोर्टल अपडेट का बहाना बनाकर ट्रांसफर को टाल दिया जाता है। शिक्षकों की पारिवारिक, मानसिक और स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरतें सरकार की नीयत की बलि चढ़ रही हैं। अब समय है कि सरकार पारदर्शी नीति लागू करे, वरना मौन असंतोष जल्द आंदोलन में बदल सकता है।

डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा में शिक्षकों की स्थानांतरण नीति (Transfer Policy) को लेकर जारी असमंजस अब एक मज़ाक बन चुका है। पिछले कई महीनों से शिक्षक इंतजार कर रहे हैं कि कब ट्रांसफर पोर्टल खुलेगा, कब कैबिनेट मीटिंग में निर्णय होगा, और कब उनकी वर्षों से अटकी उम्मीदें परवान चढ़ेंगी। लेकिन अफसोस, यह सब बातें अब केवल सरकार की “राजनीतिक प्राथमिकताओं” पर निर्भर हैं। और जब हम सरकार की प्राथमिकताएं देखते हैं, तो साफ हो जाता है कि शिक्षकों की ट्रांसफर नीति उनके एजेंडे में सबसे नीचे है।

दूसरी ओर, सरकार ने जिस फुर्ती से CET (कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट) आयोजित किया है, वह एक बेमिसाल मिसाल बन गया है — एक महीने में फॉर्म, परीक्षा और अब परिणाम तक! अगर यही इच्छाशक्ति ट्रांसफर नीति को लेकर होती, तो आज सैकड़ों शिक्षक अपने परिवार के पास, बीमार माता-पिता के साथ या छोटे बच्चों की देखभाल में लगे होते।

CET में स्पीड, ट्रांसफर में सस्पेंस

CET परीक्षा की बात करें तो सरकार ने: फॉर्म आमंत्रित किए,
परीक्षा केंद्र तय किए, लाखों उम्मीदवारों की परीक्षा करवाई,
और अब परिणाम भी घोषित होने वाला है — यह सब 30-35 दिनों के भीतर। यह एक प्रशासनिक मशीनरी का अद्भुत उदाहरण हो सकता था — अगर यही तेजी और पारदर्शिता शिक्षक ट्रांसफर नीति में भी दिखती। लेकिन वहां हर बार कैबिनेट मीटिंग की प्रतीक्षा, पोर्टल अपडेशन का बहाना, नीति समीक्षा का हवाला और न जाने क्या-क्या बहाने बनते रहे।

कैबिनेट मीटिंग: निर्णय का बहाना या जनता को भरमाने का तरीका?

हर बार यही कहा जाता है कि “अगली कैबिनेट मीटिंग में फैसला होगा।” लेकिन वह अगली मीटिंग कभी “अंतिम” नहीं बनती। शिक्षकों की निगाहें हर बुधवार की बैठक पर टिकी रहती हैं, लेकिन हर बार निराशा हाथ लगती है। क्या ये कैबिनेट मीटिंग्स केवल टालमटोल का राजनीतिक नाटक बनकर रह गई हैं? या फिर वास्तव में सरकार शिक्षकों की पीड़ा को ही नहीं समझना चाहती?

ट्रांसफर नीति: सिर्फ कागज़ों में न्याय, ज़मीन पर अन्याय

सरकार हर साल MIS पोर्टल खुलवाकर शिक्षकों से दस्तावेज अपडेट करवाती है। शिक्षक निष्ठा से सब अपडेट करते हैं, लेकिन जब उनकी ज़रूरत होती है — ट्रांसफर की प्रक्रिया — तो यही पोर्टल “तकनीकी खराबी” की शरण में चला जाता है।
कई शिक्षक ऐसे हैं जो 10-12 सालों से एक ही स्कूल में फंसे हुए हैं। जिनकी पारिवारिक, मानसिक, और शारीरिक स्थिति इस स्थानांतरण पर निर्भर करती है। लेकिन सरकार उन्हें “पॉलिसी वेटिंग” और “कमेटी समीक्षा” जैसे शब्दों से बहला रही है।

नीति बनाम नीयत: यही है असली अंतर

सरकार की नीयत अगर पारदर्शिता और शिक्षक कल्याण की होती, तो अब तक ट्रांसफर नीति लागू हो चुकी होती।
CET के 15 लाख बच्चों के लिए महीनों का काम हफ्तों में हो सकता है, तो कुछ हज़ार शिक्षकों के ट्रांसफर क्यों नहीं?
यह फर्क केवल प्रशासनिक नहीं है, यह मानसिकता का फर्क है। सरकार को लगता है कि शिक्षक “साइलेंट वर्कर्स” हैं, वे प्रदर्शन नहीं करेंगे, सड़कों पर नहीं उतरेंगे, और न ही कोई राजनीतिक नुकसान होगा। यही सोच उन्हें उपेक्षित करती है।

शिक्षकों की ज़िंदगी सरकारी आलस्य की बंधक

कोई शिक्षक अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा के लिए ट्रांसफर चाहता है। कोई अपने छोटे बच्चों के पालन-पोषण हेतु, कोई विवाहित शिक्षक/शिक्षिका अपने जीवनसाथी के पास स्थायी पोस्टिंग की प्रतीक्षा में है। कुछ शिक्षकों की अपनी बीमारी के चलते भी ट्रांसफर की जरूरत है। पर इन मानवीय पहलुओं को ट्रांसफर नीति में “डेटा”, “रैंक”, “दूरी”, और “ऑनलाइन प्रक्रिया” के तकनीकी शब्दों में घुमा दिया जाता है।

चुनावी लाभ बनाम संवेदनशील प्रशासन

सरकार को जहां वोट दिखते हैं, वहां काम होता है। CET एक बड़ा राजनीतिक दांव है — सरकार युवाओं को यह दिखाना चाहती है कि वह नौकरियों को लेकर संवेदनशील है। भले ही उसमें चयन दर केवल 1-2% हो। लेकिन असल में, ये परीक्षा भी एक भ्रम है — चपरासी के लिए PhD धारक खड़े हैं।
वहीं शिक्षक, जिनसे सरकार की शिक्षा प्रणाली चल रही है, जिनके कंधों पर बच्चों का भविष्य है — उन्हें पॉलिसी की भूलभुलैया में भटका दिया गया है।

मौन आंदोलन की आग सुलग रही है

सरकारी स्कूलों में कार्यरत हजारों शिक्षक अब सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुप्स और चुपचाप प्रशासनिक माध्यमों से अपनी बात रख रहे हैं। लेकिन यह चुप्पी बहुत देर तक नहीं रहेगी।
यदि सरकार ने यह रवैया जारी रखा, तो जल्द ही यह असंतोष एक आंदोलन का रूप ले सकता है। और तब सरकार को समझ आएगा कि “शिक्षक केवल पाठशाला नहीं चलाते, जनमत भी बना सकते हैं।”

क्या ट्रांसफर एक राजनीतिक टूल बन चुका है?

हरियाणा सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि शिक्षक ट्रांसफर नीति वास्तव में नीति है या एक राजनीतिक औजार, जिसे चुनावों या दबावों के अनुसार खोला और बंद किया जाता है। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि > शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ शिक्षक हैं, और रीढ़ को नजरअंदाज कर कोई भी सत्ता लंबे समय तक खड़ी नहीं रह सकती।

अब सरकार के पास दो ही रास्ते हैं:

1. पारदर्शिता और संवेदनशीलता से ट्रांसफर नीति लागू करे

2. या फिर इस उपेक्षा की राजनीति का सामना करे चुनावी असंतोष के रूप में।

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