“दीपावली पर उकियारी भांजने की परंपरा: एक सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर”

 दीपक कुमार तिवारी 

दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है, जो न केवल रोशनी और सजावट का प्रतीक है, बल्कि इसके साथ कई प्राचीन और गहरे अर्थों वाले पारंपरिक अनुष्ठान भी जुड़े हुए हैं। इन अनुष्ठानों में से एक है उकियारी भांजने की परंपरा, जिसका गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह परंपरा विशेष रूप से ग्रामीण और परंपरागत भारतीय समाजों में प्रचलित है, जहां इसे परिवार और समाज के लिए सुख-समृद्धि लाने का प्रतीक माना जाता है।

उकियारी भांजने की परंपरा:

उकियारी भांजना एक विशेष प्रक्रिया है, जिसमें घर के सबसे बड़े बुजुर्ग द्वारा खड़ और सन की तिलाठि से बनी उकियारी का उपयोग किया जाता है। उकियारी को एक प्रतीकात्मक वस्त्र माना जाता है, जो परिवार के सभी सदस्यों को सात बंधनों के साथ जोड़ती है। इन बंधनों का उद्देश्य परिवार में एकता बनाए रखना है। यह प्रतीकात्मक क्रिया दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से की जाती है, क्योंकि इस दिन को देवी लक्ष्मी के आगमन के रूप में मनाया जाता है। उकियारी भांजने के दौरान लोग अपने घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य के आगमन की कामना करते हैं।

सात बंधनों का प्रतीकात्मक महत्व:

उकियारी में बनाए गए सात बंधनों का एक विशेष धार्मिक महत्व है। इन बंधनों का उद्देश्य परिवार को एकजुट रखना, एक-दूसरे के प्रति विश्वास को बनाए रखना और कठिन परिस्थितियों में साथ देने का संकल्प करना है। ये बंधन एक प्रकार से उन रिश्तों को मजबूत करते हैं, जो परिवार के सदस्यों के बीच होते हैं। प्राचीन मान्यता के अनुसार, सात बंधनों का उपयोग न केवल व्यक्ति के भीतर आत्मिक शक्ति को बढ़ाता है, बल्कि पूरे परिवार को भी मजबूती प्रदान करता है।

अन्न-धन और लक्ष्मी के आगमन की मान्यता:

दीपावली के समय अन्न और धन की पूर्ति के लिए देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। उकियारी भांजने की परंपरा में अन्न-धन के आगमन के लिए देवी लक्ष्मी को आमंत्रित करने की प्रक्रिया होती है। परिवार के सभी सदस्य इस प्रक्रिया में सम्मिलित होते हैं, और बुजुर्ग सदस्य उकियारी को धारण कर इस बात का आह्वान करते हैं कि देवी लक्ष्मी घर में स्थायी रूप से निवास करें। इस क्रिया में खड़ और सन की तिलाठि का उपयोग होता है, जो प्राकृतिक तत्वों को सम्मिलित कर परिवार में सकारात्मक ऊर्जा लाने का प्रतीक है।

तिलाठि और डगहर का महत्व:

उकियारी में उपयोग की जाने वाली तिलाठि एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो उकियारी भांजने के बाद पास के चौराहे पर जलाया जाता है। यह जलाने की प्रक्रिया को बुरी शक्तियों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है। वहीं, एक तिलाठि को जलाने के बजाय बचाकर रखा जाता है। इस तिलाठि का उपयोग उसी रात भोर में डगहर (या डगरा) पीटने के लिए किया जाता है। डगहर पीटने की प्रक्रिया परिवार और समाज को किसी भी प्रकार के संकट से बचाने के उद्देश्य से की जाती है। इस परंपरा का यह भी मानना है कि डगहर पीटने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

आधुनिक समाज और परंपरागत मान्यताओं के बीच द्वंद्व:

समय के साथ आधुनिकता और शहरीकरण ने इन परंपराओं को बहुत हद तक बदल दिया है। आज के युवा और शहरी समाज में उकियारी भांजने जैसी परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं। लोगों की व्यस्त जीवनशैली और पारंपरिक मान्यताओं के प्रति कम होती रुचि ने इस प्रक्रिया को सीमित कर दिया है। खासकर बड़े शहरों में, जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं और संयुक्त परिवारों का चलन कम हो रहा है, वहां इन पारंपरिक अनुष्ठानों का संरक्षण कठिन हो गया है।

हालांकि, कुछ परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। वे मानते हैं कि इस परंपरा को बनाए रखना उनके पूर्वजों और संस्कृति का सम्मान है। अनेक परिवार अपने बच्चों को इन परंपराओं के महत्व से अवगत कराने का प्रयास करते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन्हें समझे और आगे बढ़ाए।

सांस्कृतिक संरक्षण और भावी पीढ़ी का योगदान:

उकियारी भांजने जैसे अनुष्ठानों को संजोए रखना हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण कदम है। यह केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो परिवार और समाज के बीच के संबंधों को सुदृढ़ करता है। आने वाली पीढ़ी को इस परंपरा से अवगत कराना आवश्यक है ताकि वे अपने मूल्यों और संस्कृति का सम्मान कर सकें।

इस प्रकार की परंपराएं केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं होतीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रतिबिंब होती हैं। परिवार में एकता, प्रेम, और समर्पण को बढ़ावा देने के लिए इस प्रकार की परंपराओं का योगदान महत्वपूर्ण है। अगर हम इन पारंपरिक अनुष्ठानों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सके, तो न केवल हमारा सांस्कृतिक धरोहर संरक्षित रहेगा, बल्कि हमारी पहचान भी मजबूत होगी।

निष्कर्ष:

उकियारी भांजने की परंपरा दीपावली के पर्व का एक अभिन्न हिस्सा है। इसके माध्यम से न केवल देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है, बल्कि यह परिवार और समाज के बंधनों को भी मजबूत करती है। वर्तमान समाज में इस परंपरा का संरक्षण चुनौतीपूर्ण हो सकता है, परंतु इसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। यह आवश्यक है कि हम इस परंपरा के महत्व को समझें और उसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखें ताकि वे भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रह सकें और इस परंपरा को सजीव रख सकें।

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