वंशवादी नेतृत्व से अलग उभर कर आये तीन धुरंधर!

चरण सिंह 

इन चुनाव में एक बात तो यह दिलचस्प देखने को मिल रही है कि जनता किसी की सुन नहीं रही है जो उसके दिमाग में आ रहा है वह कर रही है। चुनाव में न तो धन बल चल रहा है और न ही बाहुबल। यही वजह ही कि कई निर्दलीयों को तो जनता अपने ही चंदे से चुनाव लड़ाई रही है। इन चुनाव में बिहार पूर्णिया से पप्पू यादव, राजस्थान बाड़मेर से रविन्द्र भाटी और नगीना से भले ही चंद्रशेखर आजाद अपनी आजाद समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों पर वह भी निर्दलीय की तरह ही हैं। इन तीनों नेताओं ने अपनी कार्यशैली और रैलियों में भीड़ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। चंद्रशेखर आजाद को इंडिया गठबंधन अंतिम समय तक टहलाता रहा और अंत समय में अखिलेश यादव ने पूर्व जज को अपना प्रत्याशी बना दिया। चंद्रशेखर आजाद को लोगों को सहानुभूति मिली और उनका मुकाबला बीजेपी प्रत्याशी ओम कुमार से बताया जा रहा है। वैसे चंद्रशेखर आजाद ने वोट देने के लिए नगीना की जनता का आभार भी व्यक्त कर दिया है। जिस प्रकार से उनकी भाषा देखी जा रही है उस हिसाब से तो वह नगीना से जीत रहे हैं।

ऐसे ही पूर्णिया से पप्पू यादव को आरजेडी मुखिया लालू प्रसाद ने कांग्रेस में जाकर पार्टी विलय की बात की और जब पप्पू यादव ने कांग्रेस में अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी का विलय कर दिया तो उन्होंने जदयू से आई विधायक बीमा भारती को पूर्णिया से चुनावी मैदान में उतार दिया। कांग्रेस ने भी कोई स्टैंड नहीं लिया। ऐसे में पप्पू यादव के पास कोई चारा नहीं बचा था। वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में आ डटे हैं। यह पूर्णिया में पप्पू यादव का वजूद ही है कि पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को पूर्णिया में यह कहना पड़ा कि पप्पू यादव को वोट मत देना चाहे एनडीए को दे देना। पप्पू यादव की भाषा शैली भी बड़ी सालीनता की है। वह जदय प्रत्याशी संतोष कुशवाहा को अपना छोटा भाई तो नीतीश कुमार को बड़ा भाई बताते हैं। तेजस्वी यादव के प्रति कोई टिप्पणी करने से इनकार दिया। पूर्णिया में पप्पू यादव बढ़त बनाए हैं। संतोष यादव और बीमा भारती की हालत पतली है। वैसे भी पूर्णिया मुस्लिम बहुत सीट है। पप्पू यादव जनहित में काम करते रहे हैं, जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिलता है।
ऐसे ही राजस्थान के बाड़मेर से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे रवीन्द्र भाटी की स्थिति है। रविन्द्र भाटी विधायक हैं और उनके पीछे इतनी बड़ी गैदरिंग है कि उनके रोड शो में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री से कहीं कम भीड़ नहीं रहंी। उनकी चुनावी सभा में बड़े स्तर पर हर समाज के लोग पहुंच रहे हैं। रविन्द्र भाटी निर्दलीय के रूप में राजपूत समाज से एक बड़ी ताकत के रूप में उभर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के नेता भी उनके मंच पर देखे जा रहे हैं। रविन्द्र भाटी ने तो गुजरात में भी बड़ा कार्यक्रम करके दिखा दिया। चंद्रशेखर आजाद, पप्पू यादव और रविन्द्र भाटी संघर्षशील नेताओं को एक उम्मीद की किरण जगा रहे हैं। ये तीनों देश में वंशवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेता हैं। इन तीनों की तरह यदि देश में और भी नेता उभर कर सामने आते हैं तो वंशवाद की राजनीति पर बड़ा अंकुश लगेगा। राजनीति में संघर्ष करने वाले नेता पहुंचेंगे। जो नेता संघर्ष नहीं करेगा उसे जनता के नकारने की आशंका रहेगी।

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