कॉर्पोरेट पॉलिटिक्स का ये नया सेफ्टी वॉल्व सामाजिक न्याय की राजनिति पर पीछे से हमला है।

नीरज कुमार 
भारतीय राजनीति में कॉर्पोरेट का दखल हाल के दिनों में लगातार बढ़ रहा है। पहले मुख्यधारा की दोनों बड़ी पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस को इसने अपनी जद में लिया। उससे जी नहीं भरा तो दूसरी पार्टियों की तरफ रूख करना शुरू कर दिया। हालांकि स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों की वजह से कांग्रेस की मजबूरी है कि वो कॉर्पोरेट की गोद में उस तरह से नहीं खेल सकती, जिस तरह से बीजेपी खेलती है। लेकिन फिर भी ये सच है कि मौका मिलते ही कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रप कॉर्पोरेट के कैंपस में उसी तरह हाजिरी लगाते हैं जैसे भाजपाई।  इसके बाद आई उनकी बारी जो विकल्प की राजनीति की बात कर रहे थे। इसमें सबसे पहला नाम आया ‘आम आदमी पार्टी’ का। आम आदमी के नाम से शुरू हुई राजनीति ने देश की राजधानी दिल्ली और फिर बाकी प्रदेशों में धन का ऐसा जाल बुना कि उसके झांसे में कई बड़े-बड़े सूरमा आ गए।
अब इसी तरह के पूंजीवादी प्रयोग के जरिए बिहार में एक नई पार्टी का गठन किया गया जिसका नाम है जनसुराज। इलेक्शन मैनेजमेंट के जरिए करोड़ों-अरबों कमाने वाले प्रशांत किशोर पार्टी के सर्वे-सर्वा हैं। ज़ाहिर है कभी मोदी तो कभी ममता के बीच झूलने वाले प्रशांत किशोर की कोई विचारधारा नहीं है। और संभवतः वे मानते होंगे कि राजनीति में प्रबंधन के जरिए समीकरण बनाए-बिगाड़े जा सकते हैं। लेकिन खुद को पॉलिटिकल पंडित मानने वाले प्रशांत किशोर ये सियासी ककहरा भी नहीं जानते हैं कि बिना विचारधारा और प्रतिबद्धता के किसी तरह की राजनीति हो ही नहीं सकती।
या ये भी हो सकता है कि इस बात को जानते हुए प्रशांत किशोर बिना विचारधारा का एक मॉडल लेकर आए , जो बिहार के संपन्न मिडिल क्लास को सूट करता है। यानी वो तबका जिसके पास पूंजी और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ सामाजिक वर्चस्व भी है, लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति से टकराकर उन्हें बिहार में हर बार मुंह की खानी पड़ती है। इसलिए बहुत मुमकिन है कि जनसुराज बिहार की तीन बड़ी राजनीतिक पार्टियों आरजेडी, बीजेपी और जेडीयू की बीच जगह नहीं तलाश करेगा, बल्कि एक के साथ रहकर बाकी दो को कमजोर करने की कोशिश बाहर से करता रहेगा। इसका प्रमाण लोकसभा चुनाव के दौरान अलग-अलग टीवी चैनलों पर दिए गए प्रशांत किशोर के साक्षात्कार के जरिए लगाया जा सकता है। वह व्यक्ति जिसे देश के राजनीतिक मिजाज़ की समझ हो, जिसके पास अलग-अलग राज्यों को डेटा हो, जो वोटिंग पैटर्न से वाकिफ हो, वो अकारण बीजेपी के 300 से पार जाने की भविष्यवाणी नहीं करेगा। ज़ाहिर है ये सारा माहौल बीजेपी के पक्ष में हवा बनाने के लिए किया गया था। एक बात और है कि इस तरह की कोशिश कम से कम वो तो नहीं ही करेगा, जिसे 6 महीने के बाद अपनी पार्टी लॉन्च करनी हो। लेकिन फिर भी प्रशांत किशोर ने अगर ऐसा किया, तो इसके पीछे छिपी उनकी मंशा को साफ समझा जा सकता है।
जनसुराज और प्रशांत किशोर का प्रयास बिहार में 20 साल के एनडीए शासन से निराश उन लोगों को अपने साथ करना होगा, जो अगली बार बिहार में एनडीए की सरकार बनने से रोकने में बड़ा फैक्टर साबित हो सकते हैं। दरअसल इस तरह की सियासत वोट काटने वाली पार्टियों का बिजनेस मॉडल है, जिसे प्रशांत किशोर बखूबी समझते हैं। इसीलिए प्रशांत किशोर बिना विचारधारा की राजनीति तो कर सकते हैं, बिना मोटे मुनाफे का सियासी कारोबार नहीं कर सकते।
बात केवल राजनीतिक ईमानदारी की ही नहीं, कारोबार के सिद्धांतों की भी है। प्रशांत किशोर ने अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ काम कर अब अपनी नई पार्टी बनाई है। ज़ाहिर है कई राजनीतिक दलों ने पूर्व में उन्हें डेटा और आंकड़े उपलब्ध कराए होंगे। एक दूसरी की मजबूती और कमजोर पक्ष के बारे में भी जानकारी दी होगी, जिसका इस्तेमाल अब प्रशांत किशोर उन्हीं के खिलाफ कर सकते हैं और करेंगे। लेकिन पॉलिटिक्स के चाणक्य कहे जाने वाले पीके की ये चतुराई बिहार की उर्वर सियासी ज़मीन पर कितनी फलेगी-फूलेगी ये कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन बिहार की सामाजिक न्याय की राजनीति में यक़ीन रखने वाले हर नागरिक को प्रशांत किशोर की खुले बाजार की इस खुली चुनौती का जमकर विरोध करना चाहिए। वरना वो दिन दूर नहीं जब जनसुराज बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति को कमजोर करने के अपने मकसद में खुलकर सामने आ जाएगा।
पार्टी बनाने से पहले ही प्रशांत किशोर ने बिहार के एक बड़े हिस्से की यात्रा की है। लगभग  दो साल चली इस यात्रा में उनके भाषणों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि उन्हें 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज बीजेपी-जेडीयू से उतनी दिक्कत नहीं है जितनी आरजेडी से है। ज़ाहिर है बिहार में लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय और सेक्युलरिज्म की मजबूत दीवार को पीके कॉरपोरेट पॉलिटिक्स की राह में सबसे बड़ा रोड़ा मानते होंगे। दरअसल प्रशांत किशोर बिहार की समाजवादी राजनीति को पूंजीवादी पॉलिटिक्स के पहाड़ से धक्का देना चाहते हैं, और उनकी इस कोशिश में लालू प्रसाद चट्टान की तरह मजबूती से खड़े नजर आते हैं। इसलिए वर्तमान युग का ये  ‘चाणक्य’ सत्ता की बजाय जनता की ताक़त से ही टकरा रहा है, जिसका नतीजा पूरा बिहार जानता है।
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