बिहार के चुनावी दंगल‌ में बदजुबानी की‌ ‌ कोई हद ही नहीं !

प्रोफेसर राजकुमार जैन

बिहार का चुनावी दंगल पूरे जोश खरोश के साथ उफ़ान पर है। इसके मुतालिक जो खबरें या भविष्यवाणी ‌ हो रही है, उसमें दो तरह की रपट पढ़ने को मिल रही है। एक तबका उनका है जो ताल ठोक, साफगोई से इंडिया गठबंधन या एनडीए की तरफदारी करते हुए उसका परचम लहराने की मुनादी कर रहे हैं। दूसरा ऐसा वर्ग भी है जो अखबार नवीस, ‌ सरकारी टेलीविजनो, ‌ एनजीओ, निजी चैनल, एजेंसी चलाने वालों का है जो जाहिरा तौर पर अपने को तटस्थ तथा हकीकत बयां करने का दावा करके दबी, किंतु परंतु लगाकर अपने आका अथवा अपने मन की बात को घुमा फिरा कर लिख अथवा दिखा रहे हैं। इसमें ऐसे भी बुद्धिजीवी ‌ शामिल हैं जो अपने को मुल्क के हित चिंतक, सच के अलम्बरदार, आम मतदाताओं का प्रतिनिधि मानकर ज्ञान के कुल्ले कर रहे हैं।
मोदी – योगी की जोड़ी सड़क छाप, छिछोरी‌, मवालियों द्वारा‌ इस्तेमाल की ‌ जानेवाली जुबान का इस्तेमाल‌ बिहार में‌ चुनाव जीतने के लिए अपने मुख़ालिफ़ों के खिलाफ‌ बिना अपने पद की मर्यादा का ख्याल रखें ‌ जोरावर के रूप में ‌ सरेआम कर रही हैं।
मेरे जैसा इंसान जो साफ तौर पर भाजपा की ‌ शिकस्त देखना चाहता है, ‌ परंतु संयुक्त मोर्चे की जीत को ‌ चाहते हुए भी इनकी भी कारगुजारियों से मायूस है। चुनाव में टिकट बांटने में धन, मसल पावर, और जात के इस तिगड़े से ‌ एनडीए एलाइंस से कम नहीं। मैंने अपनी जिंदगी में बेहिसाब चुनाव देखें और हिस्सा लिया है, परंतु ‌ आज के चुनावी गणित में ‌ सिर्फ और सिर्फ किस जात के, मजहब के कितने वोट हैं, वह किसको मिल सकते हैं या मिल रहे हैं, इससे बाहर किसी भी‌ प्रकार के विमर्श को न सुना और न पढ़ा।
भाजपा इस ‌ संदर्भ में एकदम खुली और सीधी सपाट अपनी हिंदू मुस्लिम रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसी तरह ‌ ऑल इंडिया मजलिस,- ए इत्तोहादुल मुस्लिमीन का असदुद्दीन ओवैसी जैसा नेता‌ जिसको ‌ सरकारी भोपू बने तमाम चैनल ‌ बड़ी प्रमुखता के साथ तेजस्वी यादव पर तोहमत लगाते हुए‌‌ मुसलसल दिखला रहे हैं। ओवैसी भाजपा से ज्यादा तेजस्वी पर हमला करते हुए ललकार रहे है, कि 3% प्रतिशत वालों को उपमुख्यमंत्री पद देने की गारंटी दे दी गई और‌ अकलियत के‌ 17% प्रतिशत वोट होने के बावजूद हमारी कुछ भी पूछ नहीं। इसलिए मुसलमानों मेरे झंडे के नीचे आकर अब उपमुख्यमंत्री नहीं, मुख्यमंत्री बनाओ। ‌ हालांकि उनके कितने एमएलए बनेंगे ‌ यह अलग बात है, परंतु उन्होंने खतरे की घंटी तो बजा ही दी।
प्रधानमंत्री और उनके दूसरे सुबे के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री जिस तरह की ओछी जबान, मुहावरों का इस्तेमाल कर रहे हैं वह भी हिंदुस्तान देख रहा है। भाजपा‌ मुखालिफ‌ होने के कारण उसके सुधार को लेकर मैं‌ माथा पच्ची क्यों करूं। मेरा रोष उनके लिए है जिनको मैं चुनाव में जीतता देखना चाहता हूं।
सोशलिस्ट होने के नाते बिहार को मैं अपना मजबूत किला मानता रहा हूं। यहां पर जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर, लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी,‌ भूपेंद्र नारायण मंडल,‌ जैसे अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जमीनी संघर्ष तथा वैचारिक घुट्टी का शिक्षण गांव स्तर पर किया था। बिहार से चार बार संसद सदस्य चुने गए महान समाजवादी नेता मधु लिमए ने‌
अपनी विद्वत्ता, ‌ त्याग, ‌ ईमानदारी, सादगी, संघर्ष‌ से आदर्श प्रस्तुत कर ‌‌ बिहार के ‌ सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं को आदर्श की ‌ लीक पर चलने ‌ की प्रेरणा प्रदान की थी। 1963 में जब वह पहली बार मुंगेर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे तो कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता पैदल और साइकिल पर गांव गांव जाकर उनका चुनाव प्रचार कर रहे थे। सोशलिस्ट पार्टी‌ के ऐसे भी उम्मीदवार ‌ बनाए जाते थे ‌ जिनके पास जमानत भरने के भी पैसे नहीं होते थे। कार्यकर्ता और उम्मीदवार केवल एक ही मांग करते थे कि नेता हमारे इलाके में ज्यादा से ज्यादा जनसभा ‌ कर दे।
1952 के चुनाव से लेकर आज तक पक्ष या विपक्ष में सोशलिस्टों की मौजूदगी हमेशा बनी रही, जो अब धूमिल होती दिख रही है।
कहने को सोशलिस्ट तहरीक ‌ के प्रतीक तेजस्वी यादव बने हैं परंतु उनका समाजवाद में कितना‌ यकीन‌ या रुझान है‌,? अगर लालू या तेजस्वी यादव डॉक्टर लोहिया की उदार हिंदू बनाम कट्टर हिंदू, हिंदू मुसलमान की ‌ वैचारिकता, सिद्धांत पर नवयुवको को शिक्षित करते तो ओवैसी जैसे मजहबी ठेकेदार नेता से क्या कोई खतरा पैदा हो सकता था,? समाजवादी विचार दर्शन, सिद्धांतों, नीतियों, कार्यक्रम का शिक्षण प्रशिक्षण, संघर्ष की तालीम दी जाती तो चुनाव के मोके पर मतदाता के खिसकने का सवाल ही‌ पैदा नहीं होता। परंतु सत्ता के मद में डूबे नेता सिद्धांत फिदानंत, नीति फीती कहकर इसका मजाक उड़ाते देखे जा सकते हैं।
बिहार में अगर संयुक्त मोर्चे का विशाल बहुमत नहीं आया तो किसी भी कीमत पर भाजपा ‌ तेजस्वी की सरकार बनने नहीं देगी, गोवा, ‌ मध्य प्रदेश, ‌ महाराष्ट्र की नज़ीर हमारे सामने है। भाजपा जैसी पार्टी अपनी सत्ता, संगठन,‌ मसल पावर, धनबल पर विपक्ष के खेमे से जीते हुए विधायकों को एक रात में ही तोड़कर अपने पाले में शामिल कर लेगी। गुंडागर्दी, पैसे ‌ से टिकट पाकर बने यह दलबदलू विधायक कहेंगे हम अपने दम पर चुनाव जीते हैं, हमारी जात वालों ने हमें जिताया है उनकी‌ ख्वाहिश की मुताबिक हम यह फैसला कर रहे हैं।

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