देश के विकास के लिए मीडिया का ईमानदार होना बहुत जरुरी
चरण सिंह
गोदी मीडिया देश और समाज का कैसे बड़ा नुकसान कर रहा है। इसका एक बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता के पावर प्लांट में बॉयलर हादसे में 13 श्रमिकों के मरने और 21 के घायल होने की खबर को दबाना है। जानकारी मिल रही है कि इस हादसे के बाद मीडिया में वेदांता ग्रुप के विज्ञापन में बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। मतलब कोई मैरे, किसी के यहां डैकती पड़े, किसी का मर्डर हो। किसी के घर में आगजनी हो। किसी के साथ बलात्कार हो, कोई उद्योगपति किसी श्रमिक का कितना शोषण करे, दमन करे मीडिया को क्या ? उसे तो सत्ता और प्रभावशाली लोगों के लिए काम करना है। इसलिए आज के मीडिया को गोदी मीडिया की संज्ञा दी है। इसमें दो राय नहीं कुछ पत्रकार यूट्यूब चैनल चलाकर पत्रकारिता को जिन्दा रखने का प्रयास कर रहे हैं।
भाई मीडिया को तो पैसा चाहिए। वह विज्ञापन के रूप में हो या फिर रिश्वत के रूप में या फिर किसी ओर रूप में। जमीनी हकीकत तो यह है कि गोदी मीडिया विशुद्ध रूप से सत्ता और प्रभावशाली लोगों के लिए काम कर रहा है। देश और समाज का हित गोदी मीडिया से कोसो दूर है। बात छत्तीसगढ़ में बॉयलर हादसे की है नहीं है। देश में ऐसे कितने मामले होते हैं जिनको मीडिया को उठाने चाहिए पर मीडिया को सत्ता और प्रभावशाली लोगों की चाटुकारिता से फुरसत मिले तब न।
जानकारी मिल रही है कि इस हादसे के बाद विभिन्न न्यूज चैनलों पर वेदांता समूह के विज्ञापनों की संख्या बढ़ी हुई दिखाई दे रही है। मतलब मजदूरों के मरने की खबर नहीं चलानी है। ये मजदूर किसी ने किसी परिवार से जुड़े ही होंगे ? इनके मरने से लोग प्रभावित तो हुए ही होंगे पर किसी को क्या मतलब ? उनको पैसा तो मिल रहा है। समझ में जब आता है जब उनका खुद का इस तरह के हादसों का शिकार हो जाता है।
हमारे समाज में कोठे पर बैठने को गंदी नजर से देखा जाता है। यह माना जाता है कि कोठे पर बैठने वाली महिलाएं अपना शरीर बेचकर पैसा कमाती हैं। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है ये महिलाएं बलात्कार की घटनाएं रोकने में कारगर भूमिका निभाती हैं। कितने ऐसे मामले हैं जब देश के संकट में भी इन महिलाओं ने बड़ी जिम्मेदारी निभाई। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ के रेड लाइट एरिया में इन महिलाओं ने कोठे पर जाने वाले साहूकारों को दुत्कारा था और आज़ादी की लड़ाई में सहयोग देने का सुझाव दिया था। बंगाल में जब भुखमरी फैली तो कोठे पर काम काम करने वाली महिलाओं ने लोगों की आर्थिक मदद की थी। गंदा पेशा होने के बावजूद इन इन महिलाओं ने कई बार पुण्य का काम किया है।
पर जब किसी पेशे पर जिम्मेदारी हो पुण्य का काम करने की और काम करने लगे गंदा काम तो उस पेशे और उस पेशे से जुड़े लोगों के बारे में क्या कहेंगे ? देश में मीडिया ने देश और समाज के प्रति जो जिम्मेदारी और जवाबदेही निभाई है। उसी वजह से मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है।
क्या मीडिया आज की तारीख में चौथे खम्भे की जिम्मेदारी निभा रहा है ? इसमें दो राय नहीं देश में ऐसे भी पत्रकार हैं जो तमाम परेशानी झेलकर पत्रकारिता का धर्म निभा रहे हैं। पर बड़े स्तर पर मीडिया हाउस और उसमें काम करने वाले कितने पत्रकारों ने पत्रकारिता को कलंकित कर रखा है। जिसे गोदी मीडिया की संज्ञा दी है। ये लोग सत्ता के भोंपू बने हुए हैं।
मीडिया की क्या जिम्मेदारी और जवाबदेही है ? मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा क्यों माना जाता है ? इसलिए न कि मीडिया का काम देश कर समाज के लिए काम करना होता है। मीडिया का काम सत्ता को गलत करने से रोकना होता है। सरकारों को उनकी जिम्मेदारी व जवाबदेही का अहसास कराना होता है। क्या मीडिया इस काम को बखूबी निभा रहा है ? यदि कुछ यूटूबर चैनलों और कुछ छोटे अख़बारों को छोड़ दें तो अधिकतर मीडिया हॉउस सत्ता और प्रभावशाली लोगों के लिए काम कर रहे हैं। सत्ता का बचाव करते हुए जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं।
यह बात तो मानी जा सकती है कि रोजी रोटी का संकट जिन पत्रकारों पर है वे कुछ समझौते कर लें पर जो पत्रकार लखपति और करोड़पति हो गए हैं, उनके सामने क्या दिक्कत है ? वे तो पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए संघर्ष कर सकते है हैं। अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिए काम कर सकते हैं। मैं नाम लिखना पर सभी जानते हैं मैं किन चैनलों और पत्रकारों का जिक्र कर रहा हूं। जो अपना जमीर बेचकर सत्ता के लिए काम कर रहे हैं।
भाई पैसा ही कमाना है तो दूसरा पेशा पकड़ लो। रियल स्टेट, प्रॉपर्टी डीलिंग कर लो। कुछ और कारोबार कर लो। कोई और नौकरी कर लो। पत्रकारिता से खिलवाड़ क्यों कर रहे हो ? देश को गर्त में क्यों धकेल रहे हो। जमीनी हकीकत यह है कि मीडिया हाउस में जमीर बेचकर सत्ता और मालिकों के लिए काम करने वाले पत्रकारों की वजह से देश और समाज का बहुत नुकसान हो रहा है।
देश गर्त में जा रहा है। गलत लोग विभिन्न सदन में जा रहे हैं। गलत लोग आगे बढ़ रहे हैं और ईंमानदार आदमी का दम घुट रहा है। जो लोग देश के विकास में अहम रोल अदा कर सकते हैं वे पीछे धकेल दिए जा रहे हैं। जरा सोचो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितनी यातनाएं झेलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। गणेश शंकर विद्यार्थी, कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार आज के इन जमीर बेचकर कर काम करने वाले पत्रकारों की तरह काम करते तो क्या होता ? देश की आज़ादी में मीडिया का भी बड़ा योगदान है। आज का मीडिया किस बात पर गर्व कर सकता है ? जमीर बेचकर सत्ता के लिए काम करने के लिए ?
राजनीति के क्षेत्र में बैठे लोग भी समझें कि यदि समर्पण भाव और जज्बे के साथ आज़ादी की लड़ाई न लड़ी गई होती तो क्या कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या फिर कोई मंत्री बन पाता ? सांसद विधयक बन पाता ? ठंडे दिमाग से सोचिये कि देश की आज़ादी के लिए कितनी कुर्बानियां दी गई हैं ? क्यों देश और समाज के दुश्मन बने हुए हो ? न तो सत्ता के लिए काम करो और न ही विपक्ष के लिए।
देश और समाज के लिए काम करो। यदि सभी लोग जमीर बेचकर काम करने लगे तो देश के हालात इतने भयावह हो जाएंगे। कोई भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। आप लोग भी। देश में जिस तरह से किसी को कहीं पर भी मार दिया जा रहा है। सड़कों पर जरा ज़रा सी बात पर एक दूसरे की जान ले रहे हैं। कहीं किसी की कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो समझ लीजिये देश कहां जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में हमारे बच्चे क्या सुरक्षित रह पाएंगे ? क्या होगा बच्चों का भविष्य।
देश के विकास में मीडिया का ईमानदार होना बहुत जरूरी है। पत्रकार का सत्ता नहीं देश के लिए काम करना बहुत जरूरी है। जो मीडिया हाउस सत्ता के लिए काम कर रहे हैं उनका बहिष्कार होना बहुत जरूरी है। नहीं तो देश की बर्बादी के लिए नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स से अधिक जिम्मेदार गोदी मीडिया और उसमें काम करने वाले पत्रकार माने जाएंगे।








