उत्तर प्रदेश पुलिस तेजी से अपनी विश्वसनीयता खो रही है

7 अक्टूबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की स्थिति अस्त-व्यस्त है और अधिकारियों को लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। दीपक नामक एक व्यक्ति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने गौतम बुद्ध नगर के सहायक पुलिस आयुक्त और थाना प्रभारी से कहा कि उन्हें इस बात पर शर्म आनी चाहिए कि उन्होंने आरोपी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत उस समय नोटिस जारी किया, जब आरोपी पहले से ही पुलिस हिरासत में था और बाद में प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद उसे गिरफ्तार दिखाया गया। इस प्रकार, एक अवैध गिरफ्तारी को बाद में जारी किए गए रिमांड आदेश के जरिए वैध ठहराने का प्रयास किया गया।

1 अक्टूबर को न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। इस मामले में एक मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़ा गया था, फिर भी प्राथमिकी अज्ञात व्यक्ति के नाम से दर्ज की गई। अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस का कोई अपना निहित स्वार्थ या एजेंडा प्रतीत होता है और पूछा कि यदि पुलिस इस तरह काम करेगी तो लोग उस पर भरोसा कैसे करेंगे? अदालत ने यहां तक कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस को भंग कर देना चाहिए और सभी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप देनी चाहिए। खुर्जा, बुलंदशहर के क्षेत्राधिकारी शोभित कुमार को अगली सुनवाई की तारीख पर उपस्थित रहने और प्राथमिकी दर्ज किए जाने की परिस्थितियों की व्याख्या करने के लिए कहा गया।

उसी दिन उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने कहा कि किसी आरोपी पर आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से उसके परिवार के किसी सदस्य को हिरासत में लेना उस परिवार के सदस्य को उसकी स्वतंत्रता से गैरकानूनी रूप से वंचित करने के समान है। अदालत ने परिवार के उस सदस्य को 40,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से की जानी थी। एक व्यक्ति को प्रयागराज के एक पुलिस थाने में चार दिनों तक इसलिए रखा गया था ताकि हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी का भाई आत्मसमर्पण कर दे। न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि संबंधित पुलिसकर्मियों के सेवा अभिलेखों में अदालत की नाराजगी दर्ज की जानी चाहिए।

8 सितंबर को आकृति चैधरी, जो दिल्ली विश्वविद्यालय की विधि की छात्रा हैं, के खिलाफ इस वर्ष अप्रैल में नोएडा में बेहतर मजदूरी की मांग को लेकर हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन में उनकी भूमिका के संबंध में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लगाया गया था के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने इस कार्रवाई को तानाशाही अधिकारियों द्वारा किया गया निरंकुश आचरण बताया, जो उत्तर प्रदेश को अराजकता की ओर ले जा सकता है। अदालत ने  राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसकी वसूली गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम से लेकर थानाध्यक्ष के वेतन से की जानी थी। अदालत ने जिलाधिकारी को सोच-विचार किए बिना निर्णय लेने और अपनी निष्ठा की शपथ का उल्लंघन करने के लिए दोषी ठहराया। अदालत ने यह भी कहा कि जिम्मेदार अधिकारियों के सेवा अभिलेखों में उसकी नाराजगी दर्ज की जाए। बाद में 23 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों पर लगाए गए जुर्माने पर रोक लगा दी, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम को रद्द किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।

29 सितंबर को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कारोबारी मुल्ला अफरोज को हिरासत में रखने के लिए लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम को रद्द कर दिया। नवंबर 2024 के शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर सर्वे से संबंधित संभल हिंसा मामले में उनके खिलाफ दर्ज छह प्राथमिकी में उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद भी उन्हें हिरासत में रखा गया था। उन्हें उस हिंसा का कथित मास्टरमाइंड बताया गया था। अदालत ने पुलिस हिरासत के दौरान मुल्ला अफरोज से कथित रूप से लिए गए न्यायेतर इकबालिया बयान को उनके खिलाफ 13 अक्टूबर, 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम लगाने के आधार के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यह उस समय हुआ जब संभल हिंसा से संबंधित प्रमुख मामलों में से एक में उन्हें जमानत मिले 34 दिन बीत चुके थे। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक महीने के भीतर मुल्ला अफरोज को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया और उनकी निवारक हिरासत को दंडात्मक प्रकृति की बताया।

जून में उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर ने पुलिस की उस प्रवृत्ति की आलोचना की, जिसमें पुलिस की लोकप्रिय भाषा में ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ कहे जाने वाले तथाकथित अर्द्ध मुठभेड़ किए जाते हैं। इनमें आरोपी को पैर में गोली मार दी जाती है या तो अपने प्रशासनिक अथवा राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए या समय से पहले पदोन्नति पाने के लिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि पुलिस को किसी भी व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि अधिकारी संविधान के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति अधिक वफादार हैं और अधिकारी तथा राजनेता असुविधाजनक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट का इस्तेमाल सामंती मानसिकता के साथ कर रहे हैं। ये टिप्पणियां गाजियाबाद के एक मामले में की गईं, जिसमें बिना किसी सबूत के एक परिवार को संगठित गिरोह के रूप में पेश किया गया था।दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रत्येक एनकाउंटर के बाद प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए और जांच राज्य की अपराध शाखा-आपराधिक जांच विभाग द्वारा की जानी चाहिए। जांच पूरी होने तक मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों को किसी भी प्रकार से पुरस्कृत नहीं किया जा सकता।

मई में उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने पुलिस की भूमिका पर असंतोष व्यक्त किया और कहा कि राज्य को केवल हत्यारों को न्याय के कटघरे में लाने के बजाय लोगों के जीवन की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया है और टिप्पणी की है कि यदि प्रमुख आलोचकों को आधिकारिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी तो वे ‘भीगी बिल्ली’ बन जाएंगे। बेशक, हम सभी ने उस समय उनकी दयनीय स्थिति देखी थी जब मुख्यमंत्री पद के साथ मिलने वाली राज्य सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध होने से पहले, सांसद रहते हुए उन्हें अपनी जान को खतरा महसूस हुआ था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सार्वजनिक मंचों से अपराधियों को ‘ठोक दो’ या ‘राम नाम सत्य कर देते हैं’ जैसे वाक्यों का इस्तेमाल करते हुए धमकाया है, यहां तक कि उनके अपराध सिद्ध होने से पहले भी। हमने अनेक आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई भी देखी है। इनमें से कम-से-कम एक, अयोध्या के मोईद खान, को बाद में सामूहिक बलात्कार के एक मामले में बरी कर दिया गया। अपराध और अपराधियों के प्रति शून्य-सहिष्णुता की योगी आदित्यनाथ की अति-उत्साही नीति ने कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाओं का घाल-मेल कर दिया है। उनके उत्तेजक बयानों ने आरोपियों के खिलाफ पुलिस द्वारा की जाने वाली दंडात्मक कार्रवाई को अप्रत्यक्ष रूप से उचित ठहराने का काम किया है। पिछले छह महीनों में विभिन्न मामलों में विभिन्न अदालतों और न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों से, जैसा कि इस लेख में विस्तार से बताया गया है, यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश में आपराधिक जांच और पुलिस व्यवस्था की स्थिति में गिरावट के लिए वे विशेष रूप से जिम्मेदार हैं।

उत्तर प्रदेश में पुलिस को गैरकानूनी कार्रवाइयों से तभी रोका जा सकता है जब कोई मुख्यमंत्री को यह बताए कि कार्यपालिका के प्रमुख के रूप में आरोपित अपराधियों के खिलाफ धमकी भरे बयान देना उनकी भूमिका नहीं है और सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका को है। इसके अलावा, उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से काम करना बंद करना होगा, जो उनकी ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए भले ही अनुकूल हो, लेकिन निश्चित रूप से कानून के खिलाफ है जैसा कि ऊपर उल्लिखित मामलों में न्यायाधीशों ने इंगित किया है।

 – संदीप पांडेय और शशांक सिंह

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