चिंताजनक है अखबारों और लेखकों की स्थिति

समाचार पत्र और यहां तक कि लेखकों को भी अस्तित्व बचाने के लिए गूगल व फे़सबुक को मात देना होगा। बदहाल होती स्थिति पर सवाल यह है- वे ऐसा कैसे करेंगे? सबसे महत्वपूर्ण कारक है न्यूज़ कैरियर की बढ़ोत्तरी- गूगल, फे़सबुक और बाकी दूसरे। एक तरफ वे किसी अन्य द्वारा उत्पादित समाचार ले लेते हैं और दूसरी तरफ वे समाचार पत्रों की आजीविका-राजस्व को हड़प लेते हैं। इनसे ज्यादा बदतर स्थिति में अखबारों के लिए लिखने वाले लेखक है जो आए दिन पूरी मेहनत करते है लेकिन मेहनताना देखे तो समुंदर में मोती मिल जाए मगर लेखकीय सहयोग नहीं। कारण इंटरनेट पर सामग्री की भरमार के फलस्वरूप अखबार कहीं से भी कुछ उठाते है और चस्पा कर देते है। ऐसे में न लेखक की जरूरत और न ही लेखकीय सहयोग का झंझट। इसी के चलते पत्रकारिता आज शातिर दिमाग वालों के लिए धंधा बन गई है जो पच्चास सौ कॉपी छपवाते है या डिजिटल एडिशन निकालते है और बदले में विज्ञापनों से पैसा बनाते है। यहीं नहीं ऐसे लोग लेखकों को लेखकीय सहयोग देने की बजाय लेखकों से लेख छपवाने के लिए पैसे की मांग भी करते है। शर्मसार है ऐसे में पत्रकारिता।

 

 डॉ. सत्यवान सौरभ

 

समाज में जागरूकता लाने में अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह भूमिका किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, विश्व के तमाम प्रगतिशील विचारों वाले देशों में समाचार पत्रों की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। मीडिया में और विशेष तौर पर प्रिंट मीडिया में जनमत बनाने की अद्भुत शक्ति होती है। नीति निर्धारण में जनता की राय जानने में और नीति निर्धारकों तक जनता की बात पहुंचाने में समाचारपत्र एक सेतु की तरह काम करते हैं। भारत में समाचार पत्रों द्वारा परोसी जाने वाली परंपरागत पत्रकारिता ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। वो चाहे अंग्रेज़ी भाषा का पहला समाचार पत्र- जेम्स हिकी द्वारा 1779 में प्रकाशित बंगाल गजट हो या 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारतीय भाषाओं में छपना शुरू हुए समाचार पत्र हों।

 

सरकारी पाबंदी, आर्थिक मंदी और टेलीविज़न के विस्तार ने समाचार पत्र उद्योग को पहले भी झकझोरा था, लेकिन इससे पहले कभी यह सवाल नहीं पूछा गया कि भारत में प्रिंट मीडिया जिंदा रहेगा या नहीं। लेकिन आज समाचार पत्र और यहां तक कि लेखकों को भी अस्तित्व बचाने के लिए गूगल व फे़सबुक को मात देना होगा। बदहाल होती स्थिति पर सवाल यह है, वे ऐसा कैसे करेंगे? सबसे महत्वपूर्ण कारक है न्यूज़ कैरियर की बढ़ोत्तरी- गूगल, फे़सबुक और बाकी दूसरे। एक तरफ वे किसी अन्य द्वारा उत्पादित समाचार ले लेते हैं और दूसरी तरफ वे समाचार पत्रों की आजीविका-राजस्व को हड़प लेते हैं।

 

इनसे ज्यादा बदतर स्थिति में अखबारों के लिए लिखने वाले लेखक है जो आए दिन पूरी मेहनत करते है लेकिन मेहनताना देखे तो समुंदर में मोती मिल जाए मगर लेखकीय सहयोग नहीं। कारण इंटरनेट पर सामग्री की भरमार के फलस्वरूप अखबार कहीं से भी कुछ उठाते है और चस्पा कर देते है। ऐसे में न लेखक की जरूरत और न ही लेखकीय सहयोग का झंझट। इसी के चलते पत्रकारिता आज शातिर दिमाग वालों के लिए धंधा बन गई है जो पच्चास सौ कॉपी छपवाते है या डिजिटल एडिशन निकालते है और बदले में विज्ञापनों से पैसा बनाते है यहीं नहीं ऐसे लोग लेखकों को लेखकीय सहयोग देने की बजाय लेखकों से लेख छपवाने के लिए पैसे की मांग भी करते है। शर्मसार है ऐसे में पत्रकारिता।

 

यह चिंताजनक स्थिति है क्योंकि अपने स्वरूप के कारण, जो फिक्स है, समाचार पत्र अभी भी भरोसेमंद हैं। एक अखबार पूर्ण है। यह अंतिम रूप से तैयार है, अपने आप में पक्का है, निश्चित है। इसके उलट डिजिटल समाचार को लगातार अपडेट किया जाता है, सुधारा जाता है, बदला जाता है। यह “पूर्णता” अखबारों की ताकत है। एक बार कुछ छप जाने के बाद, इसे टेलीविज़न या डिजिटल प्लेटफॉर्म की तरह बदला नहीं जा सकता है। लेकिन इस नियत प्रारूप के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। एक बड़ी दुविधा यह है कि क्या भारतीय पाठक गुणवत्तापूर्ण सामग्री के लिए भुगतान करने में रुचि रखते हैं, जबकि मुफ्त सामग्री हर जगह उपलब्ध है? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है।

 

पाठक भुगतान नहीं करते तो परिणामस्वरूप अखबार भी अपने लेखकों से भुगतान के नाम पर कन्नी काट रहें है। लेकिन अगर लेखक ही नहीं रहें तो अखबार मर ही जायेंगे। इसलिए अखबारों की जिम्मेवारी बनती है कि वो लेखकों को जिंदा रखे। अखबारों के साथ एक बात यह भी सोचने की है, लेखकों की आर्थिक स्थिति कैसी है ? मुझे ज्यादा पता नहीं है, पर कुछ बड़े लेखकों-पत्रकारों को छोड़ दें तो सिर्फ लिखकर अपने परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल है । दो लाख रुपये एक मुश्त देखना तो सपना ही है । क्यूँ कोई लेखक इतने रुपये एक साथ देख भाव विह्वल हो जाता है ?

 

समाचार पत्र की सबसे बड़ी पूंजी इसका बुनियादी ढांचा है, जो इसकी समस्या भी है। यह बहुत बड़ा है, क्योंकि उद्योग बड़ी संपादकीय टीम, प्रिंटिंग प्रेस, सर्कुलेशन और मार्केटिंग नेटवर्क के कारण बड़ी संख्या में मानव श्रम पर निर्भर है। अधिकांश समाचार पत्र उत्पादन की लागत पर अपने राजस्व से सब्सिडी देते हैं। सर्कुलेशन दिनोंदिन कम हो रहा है क्योंकि सरकार की ओर से कोई समर्थन हासिल नहीं है। यही कहानी लगभग सभी अखबारों की है। फंड की कमी के कारण ये बंद होते जा रहे हैं। अखबार अभी तक केवल इनको चलाने वालों की प्रतिब्धता के कारण ही जीवित हैं।

 

समाचार पत्र या गंभीर समाचार उद्योग अब सिर्फ एक काम समाचार-संग्रह- करता नहीं रह सकता है- उसे डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र की बेहतर समझ के साथ तकनीक को अपनाने से लेकर छोटे-छोटे संस्थानों और व्यक्तियों के संग काम करना, लेखकों को उचित पारिश्रमिक देकर कई फ़ॉर्मेट में स्टोरी को पेश करने से लेकर नए तरीके की मार्केटिंग रणनीति का पता लगाना होगा। उम्मीद है, समाचार पत्र इन हकीकतों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

 

अंत में, व्यक्तिगत रूप से संचालित वीडियो ब्लॉग, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, मैसेजिंग ग्रुप और एप्लिकेशन भी बड़ा आकर्षण रखते हैं, साथ ही अखबारों के पोर्टल से ट्रैफ़िक को दूर ले जा रहे हैं क्योंकि उपभोक्ता समझ रहे हैं कि सोशल मीडिया पर उनके संदेश तेजी से असर कर सकते हैं। इस तरह स्वाभाविक रूप से उपभोक्ता दुनिया भर में परंपरागत मीडिया से दूर जा रहे हैं। गंभीर समाचार उद्योग उच्च गुणवत्तापूर्ण सामग्री पेश करके अभी भी जीवित रह सकता है, क्योंकि इसमें अभी भी पुराने दौर के ठोस संपादकों की निगरानी में एक दमदार रिपोर्टिंग टीम है, जो तकनीक की विरोधी नहीं है और तेज़तर्रार नई पीढ़ी के साथ काम करने को तैयार है।

 

(लेखक हैं कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी हैं)

  • Related Posts

    वीरता-सेवा पदक का ऐलान, पैरामिलिट्री फोर्स में सबसे ज्यादा CRPF को मिले
    • TN15TN15
    • August 14, 2026

    15 अगस्त 2026 को देश आजादी के 80…

    Continue reading
    किसानों ने दिया देशभक्ति का संदेश, भारत-पाक सीमा से सटे इलाकों में निकाली तिरंगा रैली
    • TN15TN15
    • August 14, 2026

    भारत के 80 में स्वतंत्रता दिवस की धूम…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    वीरता-सेवा पदक का ऐलान, पैरामिलिट्री फोर्स में सबसे ज्यादा CRPF को मिले

    • By TN15
    • August 14, 2026
    वीरता-सेवा पदक का ऐलान, पैरामिलिट्री फोर्स में सबसे ज्यादा CRPF को मिले

    जवाबदेह सरकार के लिए पूर्वांचल यात्रा आजमगढ़ पहुंची

    • By TN15
    • August 14, 2026
    जवाबदेह सरकार के लिए पूर्वांचल यात्रा आजमगढ़ पहुंची

    वो दर्दनाक दौर जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता: विभाजन विभीषिका में बिछड़े लाखों परिवारों को कोटि-कोटि नमन

    • By TN15
    • August 14, 2026
    वो दर्दनाक दौर जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता: विभाजन विभीषिका में बिछड़े लाखों परिवारों को कोटि-कोटि नमन

    ‘भारत की सहनशीलता को न समझें…’, डोभाल ने दिलाई ऑपरेशन सिंदूर की याद

    • By TN15
    • August 14, 2026
    ‘भारत की सहनशीलता को न समझें…’, डोभाल ने दिलाई ऑपरेशन सिंदूर की याद

    अभिजीत दीपके का बड़ा बयान, ‘सौरव के एक वीडियो की वजह से…’

    • By TN15
    • August 14, 2026
    अभिजीत दीपके का बड़ा बयान, ‘सौरव के एक वीडियो की वजह से…’

    ‘संदीप दीक्षित का बयान..’: पहली बार कांग्रेस से दूर हुई RJD, पार्टी MP बोले- सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष की बात नहीं है

    • By TN15
    • August 14, 2026
    ‘संदीप दीक्षित का बयान..’: पहली बार कांग्रेस से दूर हुई RJD, पार्टी MP बोले- सिर्फ राष्ट्राध्यक्ष की बात नहीं है