अपराध की जड़ को समझना होगा — समाज और परिवार की भी है जिम्मेदारी

दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र में होली के दिन आपसी विवाद के कारण एक 26 वर्षीय युवक की दुखद मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद क्षेत्र में लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। कई स्थानों पर सड़क जाम, आगजनी और थाने के घेराव जैसी घटनाएँ सामने आईं। समाचारों के अनुसार अब तक 8 लोगों की गिरफ्तारी की जा चुकी है तथा जिस परिवार से विवाद हुआ था, उसके घर पर भी एमसीडी द्वारा कार्रवाई की गई है।

प्रशासन द्वारा की जा रही कानूनी कार्यवाही का स्वागत किया जाना चाहिए। कानून का मूल सिद्धांत है कि अपराधी को उसके अपराध के अनुसार सजा मिले, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म से संबंधित क्यों न हो। वास्तव में अपराध की कोई जाति या धर्म नहीं होता। अपराधी किसी भी समाज, किसी भी धर्म और किसी भी वर्ग से हो सकता है।

देश में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि अपराध का संबंध किसी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्म और परिस्थितियों से होता है। उत्तर प्रदेश में अतीक अहमद और उसके भाई गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित थे और उनकी हत्या अदालत परिसर में ही कर दी गई। वहीं दूसरी ओर विकास दुबे, जो ब्राह्मण समुदाय से था, वह भी एक कुख्यात अपराधी के रूप में सामने आया और पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। ये घटनाएँ यह संदेश देती हैं कि अपराध को किसी जाति या धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

यह भी विचार करने का विषय है कि क्या कोई व्यक्ति जन्म से ही अपराधी बनकर पैदा होता है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है। हर बच्चा इस दुनिया में एक मासूम शिशु के रूप में जन्म लेता है। उसके अंदर अपराध या बुराई का कोई भाव नहीं होता। लेकिन समय के साथ यदि उसे परिवार से उचित संस्कार नहीं मिलते और समाज का वातावरण भी सकारात्मक नहीं होता, तो कई बार वही बच्चा धीरे-धीरे गलत रास्ते की ओर बढ़ने लगता है।

अक्सर देखा जाता है कि जब बच्चे छोटी-मोटी गलतियाँ करते हैं, तो माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं होती। यदि पड़ोसी या समाज का कोई व्यक्ति इसकी शिकायत करता है, तो कई बार माता-पिता बच्चे को समझाने के बजाय शिकायत करने वाले से ही नाराज़ हो जाते हैं। परिणामस्वरूप समाज के लोग हस्तक्षेप करना बंद कर देते हैं और बच्चा बिना रोक-टोक के गलतियाँ करता रहता है। धीरे-धीरे वही छोटी गलतियाँ बड़ी आदतों में बदल जाती हैं और एक दिन गंभीर अपराध का रूप ले लेती हैं।

वर्तमान समय में युवाओं और किशोरों के बीच नशे की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। कई स्थानों पर किशोर समूह बनाकर नशा करते दिखाई देते हैं। यदि समाज का कोई जागरूक व्यक्ति उन्हें रोकने या समझाने का प्रयास करता है, तो कई बार उसका विरोध किया जाता है। ऐसे माहौल में समाज के लोग चुप रहना ही बेहतर समझते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है कि समाज की यही चुप्पी आगे चलकर बड़ी समस्याओं को जन्म देती है। यदि हर कॉलोनी, मोहल्ले और गांव में जागरूक लोग छोटी-छोटी गलत गतिविधियों पर सामूहिक रूप से रोक लगाने का प्रयास करें, तो कई युवाओं को गलत रास्ते पर जाने से बचाया जा सकता है।

अक्सर देखा जाता है कि किसी बड़ी घटना के बाद लोग आक्रोश में एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन करते हैं। यदि यही एकजुटता छोटी-छोटी गलतियों के समय भी दिखाई जाए, तो संभव है कि कई बड़ी घटनाओं को होने से पहले ही रोका जा सके।

समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास होने वाली गलत गतिविधियों पर नजर रखे और शांतिपूर्ण तरीके से उनका विरोध करे। सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस ही एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की नींव बन सकता है।

– दिनेश कुमार कुशवाहा
सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक एवं चिंतक।

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