भारत में लोकतंत्र की सबसे मज़बूत संस्थाओं में से एक चुनाव आयोग रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में आम जनता का भरोसा इस संस्था से भी धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है। सीएसडीएस-लोकनीति के हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक, पिछले पांच सालों में चुनाव आयोग के साथ-साथ एग्जिट पोल्स पर भी लोगों का विश्वास तेजी से घटा है।
दरअसल, हर चुनाव के बाद टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल्स धूमधाम से सामने आते हैं। सीटों का अनुमान, प्रतिशत का विश्लेषण और संभावित विजेताओं की सूची — सबकुछ तैयार रहता है। लेकिन जैसे ही असली नतीजे आते हैं, एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणियां धड़ाम से गिर जाती हैं। बीते कई चुनावों में एग्जिट पोल्स का सक्सेस रेट लगातार नीचे गया है। आंकड़े कुछ और बताते हैं, और जनता के फैसले कुछ और।
आज स्थिति यह हो गई है कि एग्जिट पोल अब लोकतंत्र के मिज़ाज का आईना कम और शेयर बाजारों में “माल काटने” का जरिया ज़्यादा बन गए हैं। चुनाव परिणाम से पहले बनाए गए कृत्रिम रुझानों से बाजारों को ऊपर-नीचे किया जाता है — जिससे बड़े खिलाड़ी मोटा मुनाफ़ा कमा लेते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव को ही लें — लगभग सभी बड़े एग्जिट पोल एकतरफा रुझान दिखा रहे हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन यानी राजग फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर हुआ मतदान सिर्फ बीस वर्षों से सत्तारूढ़ गठबंधन को एक और मौका देने के लिए था? आम तौर पर लोकतंत्र का स्वभाव सत्ता परिवर्तन का होता है, न कि निरंतर सत्ता विस्तार का।
यह भी याद रखना चाहिए कि पिछले लोकसभा चुनाव में किसी भी प्रमुख पोल्स्टर ने यह नहीं बताया था कि भाजपा 240 सीटों पर सिमट जाएगी। सभी ने “भक्तिभाव” से राजग को बहुमत से बहुत आगे दिखाया था। बाद में जब नतीजे आए तो सच्चाई सामने थी — पोल्स्टरों के अनुमान और जनता के निर्णय के बीच गहरी खाई। इससे यह शंका और गहरी होती है कि इन पोल्स का उद्देश्य निष्पक्ष विश्लेषण नहीं, बल्कि किसी तय एजेंडे को साधना है — चाहे वह राजनीतिक लाभ के लिए हो या आर्थिक मुनाफे के लिए।
इस बार भी वही खेल चलता दिख रहा है। एक तरफ एग्जिट पोल्स के जरिए माहौल बनाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ शेयर बाजारों में हलचल तेज़ है। कुछ लोगों का मानना है कि यह “वोट चोरी” की संभावनाओं को वैचारिक वैधता देने की तैयारी भी हो सकती है।
हालांकि, डीबी लाइव के हमारे अपने एग्जिट पोल्स इस एकतरफा माहौल से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। हमारे सर्वे के मुताबिक, महागठबंधन स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहा है।
लोकतंत्र की असली ताकत जनता होती है — और जनता का फैसला कभी भी एग्जिट पोल्स या चैनलों की डिबेट से तय नहीं होता। अब देखना यह है कि इस बार सच्चाई किसके पक्ष में खड़ी होती है — जनता के या चैनलों के?
नीरज कुमार








