किसान आंदोलन की राजनीति!

प्रेम सिंह

तीन कृषि कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के तत्वावधान में चले अभूतपूर्व किसान आंदोलन पर मैंने पांच-छह लेख लिखे हैं। दोहराव न हो, लिहाजा, यह संक्षिप्त टिप्पणी।
किसान आंदोलन को इस मायने में अराजनीतिक रखा गया था कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता को आंदोलन के मंच का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया। अलबत्ता, विपक्षी पार्टियों/नेताओं ने आंदोलन का समर्थन कर किसानों की सहानुभूति जीतने के प्रयास किए, ताकि सरकार/भाजपा के खिलाफ किसानों की नाराजगी का वे चुनावी फायदा उठा सकें। पांच राज्यों में एक साथ होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार ने कृषि कानूनों को, किसान नेताओं के साथ बिना आगे बात-चीत का दौर चलाए, अचानक वापस ले लिया। सरकार का यह कदम इसका प्रमाण है कि आंदोलन में सत्ता पक्ष के खिलाफ राजनीतिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता थी। खास कर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में।
उत्तर प्रदेश 403 विधानसभा क्षेत्रों का बड़ा राज्य है। उनमें पश्चिम उत्तर प्रदेश की 70 सीटों पर किसान आंदोलन के निर्णायक प्रभाव की बात की जाती है, पूरे राज्य में नहीं। पंजाब उत्तर प्रदेश के मुकाबले 117 विधानसभा सीटों वाला छोटा राज्य है। लेकिन किसान आंदोलन का प्रभाव राज्य-व्यापी है। किसान आंदोलन की उठान, संचालन और सफलता की दृष्टि से ही नहीं, नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, श्रम एवं कृषि-कानून जिनका परिणाम थे, की स्पष्ट समझ की दृष्टि से भी पंजाब के किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। दरअसल, पंजाब के छोटे-बड़े किसानों को यह विश्वास हो गया था कि इन कानूनों के बाद उनकी जमीन और खेती उनके हाथ से निकल कर कारपोरेट घरानों के पास चली जाएंगी। और वे मातहत बन कर रह जाएंगे। इस अंजाम से वे सचमुच डर गए थे। बच्चे, बड़े, महिलाएं – सभी। उन्होंने कानूनों और उन्हें लाने वाली सरकार के खिलाफ लंबे संघर्ष के लिए कमर कस कर दिल्ली कूच किया था।
पंजाब का चुनावी परिदृश्य लोगों के सामने है, जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के घटक रहे 28 किसान संगठन भी संयुक्त समाज मोर्चा के बैनर तले चुनावी मैदान में हैं। किसान संगठनों ने बिना तैयारी के देरी से चुनावों में उतरने का फैसला लिया है। किसान संगठनों का यह गठबंधन बहु-कोणीय चुनाव में कोई प्रभावी हस्तक्षेप कर पाएगा, इसकी संभावना कम ही लगती है। फिर भी, संयुक्त समाज मोर्चा के कुछ उम्मीदवार अगर जीतते हैं, तो वह नवउदारवादी नीतियों पर सीधी जीत मानी जाएगी।
यह किसी सी छिपा नहीं है कि पंजाब की कांग्रेस सरकार, कैप्टन अमरिंदर सिंह जिसके मुख्यमंत्री थे,  का किसान आंदोलन को सतत समर्थन था। अगर कैप्टन मुख्यमंत्री पद् से हटाए जाने के बाद कांग्रेस में ही रहते, और किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को होता, तो भविष्य में कांग्रेस पर नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ दबाव बनाया जा सकता था। किसान आंदोलन की वह कुछ हद तक लेकिन सही दिशा में उपलब्धि होती। लेकिन खुद को कांग्रेस हाई कमान से अपमानित बताने वाले 80 साल के कैप्टन नई पार्टी बना कर भाजपा के साथ चुनाव लड़ रहे हैं। अब नवजोत सिंह सिद्धू को विधानसभा चुनाव में हराना उनके लंबे राजनीतिक कैरियर का एकमात्र लक्ष्य है! कैप्टन की नवगठित पंजाब लोक कांग्रेस का तीन कृषि-कानून थोपने वाली भाजपा के साथ गठबंधन है। ऐसा करके कैप्टन किसान आंदोलन की मूल चेतना के खिलाफ खड़े हो गए हैं। अगर वे समझते हैं कि सरकार ने कृषि-कानून वापस लेकर उनके पीछे निहित नवउदारवादी नीतियों का परित्याग कर दिया है, तो ऐसा कतई नहीं है। कानून वापस लेने के कुछ ही दिन बाद सरकार कह चुकी है कि उसने हार नहीं मानी है। वह फिर कृषि-कानून लेकर आएगी। किसान आंदोलन के बाद आए बजट ने एक बार फिर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सरकार उदारीकरण-निजीकरण के रास्ते पर निर्द्वंद्वता के साथ  तेजी से बढ़ रही है।
पंजाब में भाजपा का कांग्रेस के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल के साथ लंबे अरसे तक गठबंधन रहा है। भाजपा चाहेगी कि कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल, जिसने कृषि-कानून संसद में पारित हो जाने के बाद भाजपानीत राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (राजग) छोड़ा, के बरक्स आम आदमी पार्टी (आप) को फायदा मिले। यह कहा जा रहा है कि शहरी मध्यवर्ग के भाजपा समर्थक मतदाता आप के साथ जुट गए हैं। पंजाब की राजनीति में अकाली-कांग्रेस वर्चस्व तोड़ने के लिए पंजाब और विदेशों में बसे रेडिकल सिखों का आप को शुरू से ही समर्थन है। किसान आंदोलन ने नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ चेतना फैलाने के साथ सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने का भी बड़ा काम किया है। जाहिर है, यह सब किसान आंदोलन की मूल चेतना के खिलाफ है। वैसे भी, कृषि-कानूनों की समर्थक रही आप ने नवंबर 2020 में दिल्ली सीमा पर पहुंचे आंदोलनकारी किसानों को रामलीला मैदान/जंतरमंतर जाने से रोक कर केंद्र सरकार के साथ बुराड़ी मैदान में घेर कर रखने की कोशिश की थी।
कहने का आशय है कि तमाम तरह की प्रेत बाधाओं का सामना करते हुए जो किसान आंदोलन साल भर से ज्यादा चला, उसकी कोख से अगर नवउदारवादी नीतियों की सरपरस्त राजनीति ही विजयी होकर निकलती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। किसान आंदोलन के नेतृत्व को ईमानदारी से नई राजनीति के निर्माण की दिशा में सोचना चाहिए। किसान आंदोलन की तरह वह एक लंबा अभियान होगा।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, के पूर्व फेलो हैं)

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