चरण सिंह
कोई कितने भी बड़े दावे करता घूम रहा हो पर देश बहुत नाजुक दौर से गुजर रहा है। अनेकता में एकता जो देश की ताकत रही है वह बहुत प्रभावित हुई है। कहना गलत न होगा कि सरकार और उसके अंध समर्थक कितने भी बड़े-बड़े दावे करते घूम रहे हों पर देश की हालत अंग्रेजी शासन से भी बदतर हैं। गरीब और अमीर की खाई बढ़ती जा रही है। आंकड़े यह बता रहे हैं कि एक प्रतिशत लोगों के पास देश की सपंत्ति का 40 प्रतिशत है। 50 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 3 प्रतिशत सम्पत्ति है। क्या यह असमानता ब्रिटिश राज भी बदतर नहीं है ? गरीब दो वक्त की रोटी को तरस रहा है पर अरबपति लोगों की संपत्ति में छह गुना वृद्धि हुई है।
83 करोड़ लोगों की आय 171 रुपए प्रतिदिन से भी कम है। 62 करोड़ लोग 60 रुपए प्रति दिन के हिसाब से कमा पाते हैं। रोजगार पर कोई खास काम नहीं हो रहा है। सबसे अधिक भुखमरी हमारे देश में है फिर भी मोदी है तो मुमकिन है। यह सरकार का बनाया हुआ मायाजाल है कि सब कुछ बर्बाद होते देखकर भी आदमी नासमझ बना हुआ है। हां यह जरूर कहा जा सकता है कि इन हालात के लिए समाज को जागरूक करने वाले तंत्रों का उदासीन होना भी बड़ा कारण है। मीडिया इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार है।
यदि देश में भाईचारा खत्म होता जा रहा है। जाति और धर्म के आधार पर नफरत का माहौल व्याप्त है। हर तंत्र अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बच रहा है तो इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार मीडिया है। मीडिया अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही भूलकर प्रभावशाली लोगों का भोंपू बन कर रह गया है। हां कुछ जुनूनी पत्रकार तमाम परेशानियों के बावजूद पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं। मीडिया का देश और दुनिया में कितना बड़ा वजूद है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मीडिया की जिम्मेदारी कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायिका पर नजर रखने की है। मतलब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया की जिम्मेदारी और जवाबदेही और दूसरे तंत्रों से अधिक है।
दरअसल ब्रिटिश विचारक एवं सांसद एडमंड बर्क ने 1787 में ब्रिटिश संसद के समक्ष पहली बार प्रस्ताव रखा था कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका निरंकुश न हो जाएं, इसके लिए चौथे खंभे की स्थापना आवश्यक है। ब्रिटिश साम्राज्य के वैश्विक प्रभुत्व के दौर में यह विचार तुरंत स्वीकार्य हो गया, जिससे प्रेस को कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मान्यता मिली। कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका पर नजर रखने के लिए चौथे खंभे के रूप में प्रेस की स्थापना की गई थी।
भारत में पत्रकारिता की स्थापना आजादी की कोख से हुई है। आज़ादी की लड़ाई में दिन में पत्रकार सड़कों पर आजादी की लड़ाई लड़ते थे और रात में अखबार निकालते थे। उस समय अधिकतर स्वतंत्रता सेनानी किसी न किसी रूप से अख़बारों से जुड़े हुए थे। आज की तारीख में सबसे गैर जिम्मेदाराना रवैया मीडिया का ही है।







