जीवनदायीनी की उखड़ रही सांसें, घुट रहा दम

  मोहाने, पैमार, पंचाने और सकरी आदि नदियाँ हो गयी मृत

 गाद व गंदगी से मृतप्राय हो गयी नदियाँ

 जल संसाधन के वरीय अधिकारियों और पानी पंचायत के पंचों की बैठक भी असरहीन

राम विलास

राजगीर।करीब दो दसक पहले तक राजगीर अनुमंडल की सकरी, पंचाने, पैमार, मोहाने आदि नदियां कलकल – छलछल करती पूरे वेग के साथ बहती थी। पेयजल, स्नान, छठपूजा, सिंचाई के लिए लोग इसकी निर्मल धारा पर निर्भर थे। ये नदियाँ और इससे निकली नहरें अनुमंडल की आबादी के लिए लाइफलाइन थी।

लेकिन अब ये नदियाँ गाद, गंदगी और अतिक्रमण से कराह रही हैं। दूसरों को जीवन देने वाली ये नदियाँ खुद अपनी उद्धार के लिए करुण पुकार कर रही है। इन नदियों में लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर पक्के मकान – भवन बना लिया गया है। दसकों बित गये इन नदियों की उड़ाही नहीं हुई है। गाद और गंदगी ने एक तरफ नदियों को उथला बना दिया है, तो दूसरी तरफ अतिक्रमण ने इसे सकरी करते करते नाला जैसा बना दिया है।

सरकारी तंत्र और ग्रामीण आपाधापी से नदियों के अस्तित्व पर हमला बोल रहे हैं। अनेकों नगर पंचायत से जो कूड़ा कचरा एकत्र होता है उहसे नदियों की गोद भरी जा रही है। गाद गंदगी और अतिक्रमण ने नदियों का शक्ल ही बदल दिया है। उससे केवल उसके आकर प्रकार में ही बदलाव नहीं हुआ है बल्कि उसके वेग पर लगाम लगा दिया है।

इन नदियों को इस कदर जकड़ दिया गया है कि सांस लेने में परेशानी व छटपटाहट हो रही है। राजगीर अनुमंडल क्षेत्र की यह जीवनदायिनी नदियाँ अब नाम की रह गयी है। आदमी के स्नान, छठपूजा, सिंचाई की बात छोड़िये पशु-पक्षियों को भी प्यास बुझाने में ये नदियाँ पूरी तरह असमर्थ हैं। इन नदियों में अब बच्चे क्रिकेट और फुटबॉल आदि खेलते हैं।

ये नदियाँ झारखंड और गया से निकल कर नालंदा और मोकामा के टाल होते गंगा में समा जाती है। मोहाने नदी गया के फल्गु नदी से निकली है। वहीं गया जिले के शीर्ष से पैमार का उद्गम हुआ है। पंचाने और सकरी नदी झारखंड से आती है। जब ये नदियाँ वेग में बहती थी तब सिंचाई और पीने के पानी की कहीं कोई समस्या नहीं होती थी।

मानव और मवेशी उसकी धारा में स्नान करते और पशु- पक्षी अपनी प्यास बुझाते थे। छठपूजा के दौरान इन्हीं नदियों में अर्घ्यदान करते थे। लगभग सालों सूखी रहने वाली इन नदियों में अब अर्घ्यदान नहीं होता है। वर्षा ऋतु में इन नदियों में हर गांव के समीप नाव चलती थी। उसी के सहारे लोग हाट बाजार करने जाते और फिर लौट कर गांव घर आते थे।

इन नदियों के पानी से पहले लाखों करोड़ों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती थी। तब कम खर्च में किसान अधिक फसल उपजाते थे। अब अधिक खर्च कर भी पहले जैसा फसल किसान नहीं काटते हैं। पशुपालकों को भी आराम रहता था। वे अपनी मवेशी को घास चराने ले जाते थे नदी में पानी पिलाते थे। पक्षियां भी कलकल-छलछल करती नदियों के पानी पी कर खूब इतराते थे।

वे भी नदियों में स्नान करने से नहीं चूकते थे। गिरियक नदी पुल से लेकर नानंद तक केवल पंचाने नदी में करीब दो दर्जन सरकारी बोरिंग है। सड़क पुल के उत्तर में पीएचईडी और दक्षिण में आयुध निर्माणी की बोरिंग है। इन बोरिंग के पानी से को सिंचाई नहीं, बल्कि राजगीर ब्लॉक के पूर्वी और पश्चिमी भाग के ग्रामीणों की प्यास बुझाने का काम किया जाता है।

— जलपुरुष ने पंचाने नदी को पुनर्जीवित करने हेतु की है पहल

पंचाने नदी को पुनर्जीवित करने और अतिक्रमण मुक्त करने के लिए पानी पंचायत द्वारा पहल किया गया था। पिछले साल इसी महीने में पावाडीह में विशाल पानी पंचायत का आयोजन किया गया था। जल पुरुष डॉ राजेन्द्र सिंह उस में शामिल हुए थे। जलपुरुष द्वारा भी पंचाने नदी को पुनर्जीवित करने की पहल की गयी थी।
जल संसाधन विभाग के वरीय अधिकारियों और पानी पंचायत के पंचों की बैठक में भी अनेकों निर्णय लिये गये थे। लेकिन एक साल बाद भी एक भी निर्णय धरातल पर नहीं उतर सका है। पानी पंचायत के संयोजक नीरज कुमार और जलपुरुष डॉ राजेन्द्र सिंह का प्रयास सफल होता नहीं दिख रहा है।

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