कभी भी ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका में आ सकती है सरकारी संसाधनों का फायदा उठा रही कंपनियां
देश के लिए घातक साबित हो सकता है रक्षा क्षेत्र को भी निजी कंपनी को सौंपना
चरण सिंह
केंद्र सरकार सब कुछ निजी हाथों को सौंपकर एक और ईस्ट इंडिया कंपनी बनने का मौका दे रही है। सरकार को कमजोर और निजी हाथों को मजबूत कर देश को गुलामी की ओर धकेल रही यही। शिक्षा, चिकित्सा, रेलवे और कई अन्य क्षेत्रों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा तो निजी हाथों में दे ही दिया है अब रक्षा क्षेत्र भी निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी है। अब सेना के हथियार भी निजी कंपनियां बनाएंगी।
अभी हाल ही में निजी हाथों में दी गई देश के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र से जुड़ी फाइलें डार्क वेब पर लीक होने का मामला सामने आया था कि अब सरकार सेना के लिए मिसाइल बनाने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंप रही है। खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल सिस्टम की सभी तकनीकों को निजी रक्षा उद्योग को सौंपने की मंजूरी दे दी है।
केंद्र सरकार को यह बात ज्ञात होनी चाहिए की उद्योगपति का मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है। क्या गारंटी है कि निजी कंपनियों द्वारा बनाए जाने वाले हथियार गलत हाथों में नहीं जाएंगे ? क्या गारंटी है कि ये कंपनियां दूसरे देशों के दबाव में आकर देश को धोखा नहीं देंगी ? दरअसल केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बचने के लिए सब कुछ निजी कंपनियों को सौंप देना चाहती है। सरकार ने एयर इंडिया में अपनी 100% हिस्सेदारी टाटा ग्रुप को बेच दी है। नीलांचल इस्पात निगम लिमिटेड कंपनी को टाटा स्टील लॉन्ग प्रोडक्ट्स को बेच दिया गया है। फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड कंपनी का निजीकरण कर इसे जापान की कंपनी को सौंप दिया गया है।
रानी कमलापति रेलवे स्टेशन जैसे आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट्स को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत निजी हाथों में सौंपा गया है। दिल्ली और मुंबई समेत कई प्रमुख हवाई अड्डों का संचालन पीपीपी मोड के जरिए निजी कंपनियों के पास है। हाल ही में वाराणसी व तिरुपति सहित 11 और एयरपोर्ट्स को इस मॉडल पर दिए जाने की योजना है। भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) के जरिए 10% हिस्सेदारी बेची गई है।
आईडीबीआई बैंक व अन्य वित्तीय संस्थानों में भी हिस्सेदारी कम की गई है। सरकार ने सड़कों, रेलवे, पावर और खदानों जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के संचालन का अधिकार एक निश्चित अवधि के लिए निजी कंपनियों को दिया है।
देखने की बात यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी व्यापार की आड़ में देश पर कब्जा किया था। 1600 ईस्वी में सिर्फ व्यापार करने आई यह निजी कंपनी धीरे-धीरे भारत की शासक बन बैठी।कंपनी ने भारत को गुलाम बनाने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित रणनीतियों और हथियारों का इस्तेमाल किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश की कमजोरी को भांपकर षड़यत्र रचा और देश को कब्ज़ा लिया।
दरअसल जब ईस्ट इंडिया कंपनी आई तो उस समय भारत छोटे-छोटे राज्यों और रियासतों में बंटा हुआ था। राजा और नवाब आपस में ही लड़ते रहते थे। अंग्रेजों ने इस कमजोरी को भांप लिया। वे एक राजा के खिलाफ दूसरे राजा की मदद करते थे और बदले में उनसे पैसे, जमीन या व्यापारिक अधिकार ऐंठ लेते थे। इससे भारतीय शासक आपस में ही लड़कर कमजोर होते चले गए। जिस तरह से सरकार सब कुछ निजी हाथों में सौंप रही है, ऐसे में क्या ये कंपनियां नेताओं की कमजोरी का फायदा उठाकर देश को गुलामी की ओर नहीं धकेल सकती हैं।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने सबसे पहले व्यापारिक कोठियों की सुरक्षा के नाम पर अपनी सेना रखनी शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने सीधे सैन्य हस्तक्षेप और गद्दारी के दम पर भारत के सबसे अमीर प्रांतों पर कब्जा किया था। 1757 में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और गद्दारी की वजह से यह प्लासी का युद्ध जीत लिया। आज क्या गद्दारों की कमी है ?
1764 में बक्सर का युद्ध में क्या हुआ था ? बक्सर की जीत के बाद 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई। मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से इस कंपनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा से टैक्स (राजस्व) वसूलने के ‘दीवानी अधिकार’ हासिल कर लिए। यहीं से एक व्यापारी कंपनी अधिकारिक तौर पर शासक बन गई।
सहायक संधि में क्या हुआ था ? लॉर्ड वेलेजली द्वारा शुरू की गई यह एक ऐसी चाल थी, जिसने भारतीय राजाओं की स्वतंत्रता पूरी तरह छीन ली थी। इस नीति के तहत भारतीय राजाओं को अपनी सेना भंग करनी पड़ती थी। सुरक्षा के नाम पर उनके राज्य में ब्रिटिश सेना तैनात की जाती थी, जिसका पूरा खर्च उस राजा को उठाना पड़ता था। खर्च न दे पाने की स्थिति में राजा के राज्य का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेज छीन लेते थे। ये लोकतंत्र के राजा भी तो ऐसे ही कर रहे हैं। जब ये कंपनियां सरकार से ज्यादा पावरफुल होंगी तो क्या ये देश पर कब्ज़ा नहीं करेंगी ?
हैदराबाद, मैसूर, अवध और तंजौर जैसे राज्यों के साथ क्या हुआ था ? हड़प नीति या व्यपगत के सिद्धांत के तहत तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने बड़ा खेल किया था। इस नीति के मुताबिक अगर किसी भारतीय शासक का अपना कोई जैविक (सगा) पुत्र या वारिस नहीं होता था, तो वह किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता था। राजा की मृत्यु के बाद उसका राज्य सीधे ब्रिटिश साम्राज्य यानी कि ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा बन जाता था। इसी नीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने झांसी, सतारा, नागपुर और संबलपुर जैसे कई राज्यों को जबरन हड़प लिया था। क्या कमजोर सरकार में यह सब नहीं हो सकता है ? ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश के कारोबार को बर्बाद कर ही तो व्यवस्था को कब्जाया था।
जैसे देश को मजबूत करने वाले उद्योग धंधों को ठप्प कर सब कुछ निजी हाथों को सौंपा जा रहा है। ऐसे ही अंग्रेजों ने भारत के समृद्ध कपड़ा और हस्तशिल्प उद्योगों को जानबूझकर बर्बाद किया था। वे भारत से बेहद सस्ते दामों पर कच्चा माल (जैसे कपास और नील) ब्रिटेन भेजते थे और वहां की मिलों में बना तैयार कपड़ा भारतीय बाजारों में लाकर महंगे दामों पर बेचते थे। इससे भारत का पैसा बाहर जाने लगा और देश आर्थिक रूप से पंगु हो गया। केंद्र सरकार भी तो अमेरिका से ट्रेड डील कर यही सब कुछ कर रही है।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने क्या किया था ? भारत से ही पैसा कमाकर उस पैसे से विशाल और आधुनिक सेना तैयार कर ली थी। इस सेना में ब्रिटिश अधिकारियों के अलावा भारी संख्या में भारतीय सैनिक (सिपाही) शामिल थे। इस सेना के बल पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिखों, मराठों और अन्य बची-कुची ताकतों को एक-एक कर हराया था। क्या गारंटी है ये निजी कंपनियां ईस्ट इंडिया कंपनी साबित नहीं होंगी ?







