उत्तर प्रदेश में अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती है सरकार बनाना!

अधिक सीटें आने पर भी करना पड़ सकता है 2002 के चुनाव जैसा सामना
भाजपा और योगी दोनों के लिए करो या मरो का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, अपनाये जाएंगे सभी हथकंडे 

चरण सिंह राजपूत
त्तर प्रदेश चुनाव के पहले चरण का मतदान कल होने जा रहा है। चुनाव प्रचार खत्म हो चुका है। मुख्य मुकाबला सपा-रालोद गठबंधन और भाजपा के बीच माना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बढ़त लेने वाली पार्टी की ही सरकार बनने का दावा किया जा रहा है। यही वजह रही कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने काफी समय पहले यहां पर आकर डेरा डाल दिया था। किसान आंदोलन की वजह से रालोद-सपा गठबंधन मजबूत स्थिति में माना जा रहा है पर कानून व्यवस्था को लेकर लोग योगी के गुणगान करते भी देखे जा रहेे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम को लेकर भी अच्छा खासा माहौल है। भले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी बनाकर आजाद समाज पार्टी बनाने वाले चंद्रशेखर आजाद का दलित युवाओं का प्रभाव माना जा रहा हो पर दलित वोटबैंक कर अभी भी मायावती की पकड़ से इनकार नहीं किया जा सकता है। कानून व्यवस्था को लेकर आज भी लोगों की पहली पसंद मायावती ही मानी जाती हैं। भले ही आज वह भाजपा के दबाव में बताई जा रही हों पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बोल्ङ बोलने और बोल्ड निर्णय लेने के मामले में मायावती का कोई जवाब नहीं है। राजनीतिक गलियारे में भले ही बसपा को अनदेखा किया जा रहा हो पर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मायावती की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है।
अखिलेश यादव और उनके समर्थकों को यह गांठ बांधकर चुनाव लड़ना होगा कि यदि अपने दम पर सपा की सीटें सरकार बनाने लायक न आ पाई तो जितने भी दल सपा के साथ गठबंधन किये हुए हैं वे भाजपा के पाले में दिखाई दे जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जगजाहिर है कि भाजपा के लिए यह चुनाव करो या मरो का है। भाजपा भी जानती है कि उत्तर प्रदेश के हाथ से निकलते ही केंद्र में भी हारने के आसार बनते देर न लगेगी। जहां तक योगी आदित्यनाथ की बात तो उनके समर्थक तो उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे हैं। यह भी जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री तब बनेंगे जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दोबारा बनेंगे। राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक सब उनके अपने हैं। वैसे भी इन चुनाव में सपा को २००२ का चुनाव याद कर लेना होगा। सपा की सीटें सबसे अधिक होने के बावजूद भाजपा ने माायावती को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। रालोद भी सरकार में शामिल हो गई थी। केंद्र अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री थे। इस बार उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल हैं। तब उदारवादी नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे जिन्होंने अमर सिंह के भाई की फैक्टरी पर छापे मारने प्रकरण में मायावती की कारस्तानी बताकर समर्थन वापस लेकर डेढ़ साल बाद सपा को सरकार बनाने का मौका दे दिया था। इस बार तो नरेंद्र मोदी अमित शाह के साथ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ हैं और बसपा की स्थिति में खुद भाजपा है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर बसपा का भी इस्तेमाल करने की नीयत से चुनाव लड़ रही भाजपा रालोद समेत सपा से गठबंधन करने वाले दूसरे दलों को पाला बदलनेे के लिए मजबूर कर सकती है। ऐसे में यह चुनाव अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौेती है। यदि किसी वजह से अखिलेश यादव सरकार बनाने में विफल साबित हो गये तो आने वाले पांच साल में भाजपा सपा के लिए बड़ी दिक्कतें खड़ी करने में समय नहीं लगाएगी। पहले चरण का चुनाव 10 फरवरी, दूसरे का 14 फरवरी, तीसरे का 20 फरवरी, चौथे का 23 फरवरी, पांचवें का 27 फरवरी, छठे का 3 मार्च और सातवें का 7 मार्च को मतदान होगा। 10 मार्च को चुनाव के नतीजे आएंगे।

पहले चरण यानि कल 58 और आखिरी चरण में 64 विधानसभा सीटों में वोटिंग होगी। 403 सीटों वाली 18वीं विधानसभा के लिए ये चुनाव हो रहे हैं। 17वीं विधानसभा का कार्यकाल  15 मई तक है। दरअसल इससे पहले 17वीं विधानसभा के लिए 403 सीटों पर चुनाव 11 फरवरी से 8 मार्च 2017 तक 7 चरणों में हुए थे। इनमें लगभग 61 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इनमें 63 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं थीं, जबकि पुरुषों का प्रतिशत करीब 60 फीसदी रहा। चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर पहली बार यूपी विधानसभा में तीन चौथाई बहुमत हासिल किया। वहीं अखिलेश यादव की अगुवाई में समाजवादी पार्टी  और कांग्रेस  गठबंधन 54 सीटें जीत सका। इसके अलावा प्रदेश में कई बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती  की बीएसपी 19 सीटों पर सिमट गई थी।  इस बार सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच है। बीजेपी योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ रही है तो सपा अखिलेश यादव के चेहरे पर।

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