“पिता का पस्त मन और पुत्रों की पश्चिमी व्यस्तता”

“एक पिता की विदाई, और समाज की परीक्षा”

 

लखनऊ के एक रिटायर्ड कर्नल ने अपने बेटों को एक मार्मिक पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली। दोनों बेटे अमेरिका में बसे थे और मां की मृत्यु पर भी पूरी संवेदनशीलता नहीं दिखा सके। पिता ने पत्र में लिखा कि उन्होंने देश को सम्मान दिया लेकिन समाज को असंवेदनशील पुत्र दे दिए। यह घटना केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक मूल्यों के पतन का आईना है। आधुनिकता के दौड़ में रिश्तों की संवेदना और बुजुर्गों का सम्मान कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

प्रियंका सौरभ

एक फौजी पिता की वर्दी सलामी के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और समर्पण के प्रतीक होती है। लेकिन जब वही पिता अपनी अंतिम सांस लेने से पहले अपनी ज़िंदगी के सबसे कड़वे शब्दों में पत्र लिखकर खुद को गोली मार ले, तो यह केवल आत्महत्या नहीं होती — यह एक सामाजिक मृत्यु होती है। लखनऊ की एक पॉश कॉलोनी में रहने वाले रिटायर्ड कर्नल ने ऐसा ही किया। दो बेटे, एक अमेरिका में कॉरपोरेट नौकरी में व्यस्त, दूसरा अपने परिवार के साथ जीवन में लीन। पिता और मां ने पूरी ज़िंदगी इन बेटों की परवरिश में बिता दी थी। ऊँची शिक्षा, बेहतर जीवन, विदेशी स्थायित्व, दुनिया की सुविधाएं — सब दिया, लेकिन आखिर में अकेलेपन का उत्तरदायित्व भी उन्हीं मां-बाप के हिस्से आया।

कहते हैं, हर पिता चाहता है कि बेटा उससे बड़ा बने, लेकिन शायद ही कोई पिता चाहता है कि बेटा उसे भूल जाए। जिस बेटे को कभी बुखार आने पर पिता रातभर सिरहाने बैठा रहा हो, वही बेटा मां की मौत पर कह दे कि “पापा की मौत में आ जाऊंगा” — तो वहां केवल संबंध नहीं टूटते, आत्मा टूट जाती है। उस पिता ने पत्र में कोई गाली नहीं दी, कोई ताना नहीं दिया, कोई आक्रोश नहीं दिखाया। उन्होंने बस यह कहा कि शायद मेरी परवरिश में कोई कमी रह गई, क्योंकि मैंने समाज को सभ्य नागरिक नहीं, असंवेदनशील संतति दी।

यह वाक्य जितना सीधा है, उतना ही खौफनाक है। यह एक पिता का नहीं, एक पीढ़ी का दुःख है। यह कहानी किसी एक कर्नल की नहीं है। यह हर उस मां-बाप की है, जो अपने बच्चों को उड़ान देना चाहते हैं, लेकिन बुढ़ापे में लौटती हुई परछाइयां भी नहीं देख पाते। यह उस भारतीय समाज की है, जो अमेरिका जाने वाले बेटे पर गर्व करता है, लेकिन वहीं मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ने पर खामोश हो जाता है। यह उस संवेदनहीनता का बयान है, जो आधुनिकता के मुखौटे के पीछे रिश्तों को घोंट रही है।

पिता की चिट्ठी ने लिखा कि अब उसकी लाश के पास भी कोई इंतज़ार नहीं करेगा, इसलिए वह खुद ही चला जाता है — ताकि कोई मजबूरी न हो, कोई बहाना न बने, कोई बेटा यूं न कह सके कि ‘फ्लाइट नहीं मिली’। यह वाक्य किसी खबर का हिस्सा नहीं, एक सांस्कृतिक हार का एलान है। वह पिता जिसने युद्ध में दुश्मनों से लड़ा, जिसने सेवा में राष्ट्र को प्राथमिकता दी, वह अपने ही घर में अकेलेपन से हार गया। उसकी आखिरी इच्छा थी कि उसके तमगे और तस्वीरें बटालियन को लौटा दी जाएं। शायद वो ये नहीं चाहता था कि उसके बच्चों के ड्राइंग रूम में झूठी स्मृति के रूप में उसकी तस्वीर टंगी रहे।

हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां हर त्योहार पर “परिवार के साथ समय बिताएं” जैसे विज्ञापन चलाए जाते हैं, लेकिन असल में माता-पिता के पास समय बिताने वाला कोई नहीं होता। वीडियो कॉल पर रिश्ता निभाया जाता है, जन्मदिन पर केक भेजकर ज़िम्मेदारी पूरी मानी जाती है, और अंत्येष्टि में आना ‘काम की व्यस्तता’ के आधार पर टाला जा सकता है। कर्नल साहब के बेटे के लिए यह सिर्फ ‘एक और दिन’ रहा होगा। लेकिन उस दिन ने एक पिता को चुपचाप शहीद कर दिया — इस बार बिना दुश्मन के, बिना युद्ध के, बिना आदेश के।

जिस समाज में माताएं बेटे को यह सिखाती थीं कि बुढ़ापे में मां-बाप भगवान होते हैं, उस समाज में बेटे मां के निधन पर आने से कतराने लगे हैं। यह संस्कारों की नहीं, अवसरवादिता की पीढ़ी है। जहां “हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं” जैसे वाक्य, रिश्तों की कब्र पर पत्थर बनकर रख दिए गए हैं। रिश्ते अब भावना से नहीं, सहूलियत से निभाए जाते हैं। कोई फ़ोन करेगा तो बात होगी। कोई कहेगा तो आऊंगा। कोई मरेगा तो सोचूंगा। यही हमारी आधुनिक संस्कृति है, जो रिटायरमेंट के बाद मां-बाप को केवल एक खर्च या बोझ समझती है।

क्या हम सोचते हैं कि हमारे बच्चों को हम जैसा ही व्यवहार मिलेगा? क्या जो आज बोया जा रहा है, वही कल काटा नहीं जाएगा? बेटों ने क्या सिर्फ इसलिए पढ़ाई की थी कि वे संवेदना से चूक जाएं? अगर शिक्षा केवल कैरियर और डॉलर कमाने तक सीमित रह जाए, तो वह एक आदर्श संतान नहीं, एक संवेदनहीन मशीन तैयार करती है।

कर्नल साहब ने खुद को गोली नहीं मारी — उन्होंने एक घोषणा की थी। कि वह एक असफल पिता थे, क्योंकि उन्होंने ऐसे बेटे पैदा किए जो शव देखने से डरते थे, लेकिन सेल्फी लेने में नहीं झिझकते। उन्होंने एक ऐसा समाज छोड़ा, जो बुजुर्गों की बातें ‘बोरिंग’ समझता है और बूढ़ों के आँसू सिर्फ ‘ग्लानि’ का विषय बनते हैं, करुणा का नहीं।

अब सवाल यह है कि हम इस पत्र को पढ़कर केवल अफसोस जताएं या आत्मपरीक्षण करें। हम क्या वाकई उस दिशा में जा रहे हैं, जहां रिश्तों का मूल्य डॉलर से कम है? क्या हम अपने बच्चों को यह शिक्षा दे रहे हैं कि सफलता का मतलब पीछे मुड़कर न देखना है? कर्नल साहब का पत्र चेतावनी है — उन सब के लिए जो सोचते हैं कि विदेश में बस जाने से जड़ें खत्म हो जाती हैं। नहीं, जड़ें हमेशा रहती हैं। सूखती हैं, तबाही लाती हैं।

यह समाज तब तक जीवित रहेगा, जब तक बुजुर्गों को सम्मान मिलेगा। जिस दिन मां की चिता को बेटे ‘इवेंट’ मानने लगेंगे, उस दिन से सभ्यता खत्म होनी शुरू हो जाएगी। आज जो कर्नल साहब के साथ हुआ, वह कल किसी और के साथ होगा। शायद आपके साथ। शायद मेरे साथ।

आख़िर में बस इतना कहना चाहूंगी — रिश्ते निभाइए। मां-बाप को समय दीजिए। अमेरिका जाकर सफलता अर्जित करना बुरा नहीं, पर उस उड़ान में अगर संवेदनाएं पीछे छूट जाएं तो वह उड़ान नहीं, विस्मृति बन जाती है।

कर्नल साहब की आत्महत्या, एक पिता का मर जाना नहीं है — यह हमारे समाज की आत्मा की पराजय है। और अगर अब भी हम नहीं चेते, तो अगली पीढ़ी हमें केवल बर्थडे कार्ड और अंत्येष्टि के टोल फ्री नंबर ही देगी।

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