भारतीय संस्कृति की धज्जियां उड़ा रहे टेलीविजन शो ?

एक औरत जो कि शादी शुदा है, लेकिन वह इस शादी से खुश नही, अक्सर ये अपने पति से परेशान रहती है, ऐसे में वह अपने पति का साथ छोड़ अपने शादीशुदा बॉस के साथ अपने आप को ज्यादा खुश पाती है, और उसी के साथ रिश्ता रखने बनाने का सोचती है, अभी जो कहानी हमने आपको बताई, ये किसी अखबार की कतरन नही, बल्कि 90’s में आने वाले एक टेलीविजन शो का थीम है, हो सकता है आज के समय के हिसाब से ये बात आपको सामान्य लगे लेकिन आज से 30 साल पहले हमारे सामाज के लिए ये इतनी आसान बात नही थी, इसके बाद भी टीवी पर आने वाले इस धारावाहिक को लोगों ने बड़े ही साकारात्मक ढंग से देखा, इसे अपना सपोर्ट दिया, क्योंकि इस कहानी को बताने वालों ने काफी संजीदगी से अपनी बात रखी, एक समय था जब टेलीविजन में समाज के प्रोग्रेसिव विचार धारा पर आधारित सीरियल आया करते थे, भारत के धनी साहित्य, पौराणिक कथांए या जीवन में सीख देने वाले कंटेट देखने को मिलते थे, इसके बावजूद की उस समय टेलीविजन स्क्रीन का विकास इतना नही हुआ था और हम आर्थिक रुप से भी उतने सक्षम भी नही थे,
और धूम तनना वाले music का अविष्कार भी होना बाकी था, धीरे धीरे बड़े बड़े सेट और लाइटिंग का इस्तेमाल बड़े पर्दे के बाद छोटे पर्दे पर भी होना शुरु हुआ, TV serials  कों भी उतना ही Attractive बनाया जाने लगा लेकिन आज इन सभी कयासों का क्या नचीजा आया? टेलीविजन पर अंधविश्वास, साज़िश, कुप्रथाएओ की मानो भरमार लग गई, शो का शुरुआती थीम तो बहुत अच्छा बनाया जाता है लेकिन देर सबेर सभी शो एक ही ढर्रे पर आ जाते है। हमने अपने कहानी बताने के ढंग को तो बेहतर किया लेकिन उसे अंधविश्वास औऱ पाखण्ड को intresting बनाने में लगा दिया, ये एक सोचने की बात है? तो इस वीडियो में हम बात करेंगे कि हमारा टेलीविजन सालों की मेहनत से विकसित हुई हमारी समझ पर किस तरह पानी फेर रहा है। किस तरह हम एक पोस्ट इलेट्रेट एरा में जा रहे है मानो हमने विज्ञान कभी पढा ही न हो।

1950 का दशक जब अमेरिका में टेलीविजन को IDIOT BOX कहा जाने लगा, इसके साथ ये एक non-interactive medium बताया गया इसके अलावा बच्चों बड़ो सभी में टेलीविजन के प्रभाव देखने को मिलने लगे
इसके बाद साल 1959 में हमारे भारत में पहली बार टेलीविजवन का उदय हुआ, और साल 2021 में इस industry का आकार 720 billion के आसपास का हो चुका है कुल जमा बात भारत की टेलीविजन Indrustry का आकार काफी बड़ा हो चुका है, इसके बाबजूद की आजादी के 75वें साल में आप उपलब्धि के नाम पर ISRO के लांच किये गए सेटेलाइट का ही नाम लेते होंगे औऱ इन रिसर्च पर साल में कितना खर्च किया जाता है बताने कि जरुरत नही आप जानते ही होंगे। वापस चलते है अपनी बात पर,

पहले के समय भारत में एकमात्र सरकारी चैनल, दुरदर्शन का राज हुआ करता था, जिसे सरकार नियंत्रित करती थी, इसके बावजूद टेलीविजन पर हमें भारत की साहित्यिक धरोहर का भरपूर प्रयोग हमें देखने को मिलता था, उदाहरण के लिए प्रेमचन्द्र की कहानियां, मालगुड़ी डेज, रामायण, महाभारत औऱ मिर्जागालिब शो जो कि एक प्रकार की positivity, Constructive values  से भरी होती थी लेकिन इसका एक औऱ पहलू भी था जिसने हमें बताया कि मीडिया जनता को कंट्रोल करने बहकाने का अच्छा साधन है,
ये वही दौर है जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री ने अटल बिहारी बाजपेयी के रैली को विफल बनाने के लिए दूरदर्शन पर उस समय की चर्चित फिल्म बांबी फिल्म दिखाए जाने का आदेश दिया था, लेकिन तमाम दुशवारियों के बावजूद टेलीविजन ने अपनी बांतो को बड़े ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया, अपने सीमित संसाधनों होने के बाद भी बड़ी और मारक बाते भी कहीं, जैसा कि हमने शुरु में बताया धूम तनना Sound के बिना, साल 1991 के बाद Private चैनल मार्केट में आने लगे, धीरे धीरे टेलीवजन सेट के कंटेट में VFX, सेट और लाइटिंग पर खासा काम हुआ और छोटे पर्दे के शो भी फिल्मों जैसे भव्य और सुंदर दिखने लगे।
लेकिन हमने ये कैसा मजाक बना दिया अपने इस विकास का?
शुरुआत तो बच्चों के आने वाले जादुई नाटकों तक सीमित थी जैसे शकालका बूम बूम, करिश्मा का करिश्मा टाइप के नाटक यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन इसके बाद ये नाटक बड़ो के Space में भी जगह लेते है, और लोगों को अंधविश्वास, Horror, पाखण्ड से भर देते है,
नागिन, ससुराल सिमर का, नजर, कवच लम्बी लिस्ट है इन सीरियल के लिए इंटरनेट पर मीम की बाढ़ आई हुई है लेकिन मजाल ये सीरियल अपने कंटेट में सुधार कर ले, इसके अलावा सास बहु वाले सीरियलों ने अलग ही मुकाम हासिल किया है, 10 बार तक हर किरदार के रिएक्शन लेना, पुनर्जन्म का होना, प्लास्टिक सर्जरी हो जाना ये सारी बांते आम है। इन सभी में Reality Show भी कम बदनाम नहीं ।
आप कहेंगे कि ये सब बस entertaintment के लिए है लेकिन वास्तविकता से दुरृ जाते और अंधविश्वासों से भरे इन सीरियल का भारत में इंपैक्ट काफी बुरा है, अगर ऐसा न होता तो भारत में जगह जगह नामर्दी का इलाज और भविष्य बता देने वाले बाबाओं का बिजनेस कब का बंद हो चुका होता, ऐसा नहीं है कि लोग अंधविश्वास ही देखना चाहते है लेकिन अंधविश्वास को इतने Effort और संसाधन लगा कर घर घर तक पहुंचाना, टेलीविजन के माध्यम से पेश करना ,ये किस तरह कि समझदारी है आप ही बताइए?
हमने टेलीविजन के presentation में हुए सुधार की तो बात कि लेकिन जरा उन बच्चों का भी सोचिए जिनकी किताब का सलेबस उस Speed से नहीं बदला जिस Speed से उनकी टेलीविजन का कंटेट, नतीजन उन्हें अंधविश्वास परोस देने वाले शो ज्यादा अच्छे और सीख देने वाले लगते है।
हमारा विरोध किसी टेलीविजन सीरियल से नहीं लेकिन अलौकिकता, काला जादू, अंधविश्वास दिखाने वाले सीरियल से है, ऐसा नहीं है कि हर जगह केवल अंधविश्वास पसरा है, कई अच्छे और प्रगतिशील काम भी टेलीविजन पर किये जा रहे लेकिन मेन स्ट्रीम से दूर, एक खाना पूर्ति के तौर पर आपके अच्छे कंटेट देखने से उन्हे भी बढ़ावा मिलेगा अब कमान आपके हाथ में है आप क्या देखना चाहते है.

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